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मनुष्य के दैनिक क्रिया पर कुछ ग्रामीण कहावते

सौन्दर्यता के लिए महत्वपूर्ण है मनुष्य को स्वस्थ रहना। हमारे देश में अधिकतर गांवों में आज भी अस्पतालों का अभाव होने के साथ ही अच्छे डाक्टरों का भी अभाव रहता है। जहाँ तक बड़े-बड़े जटिल रोगों का सवाल है, विश्व भर अधिकांश रोगों पर नियंत्रण करने के लिए विभिन्न तरह की औषधियों का अविष्कार किया जा रहा है। लेकिन हमारा ग्रामीण क्षेत्र अभी भी इन औषधियों से वंचित रह जाता है। ग्रामीण क्षेत्रों में साधारण सर्दी-बुखार तक की औषधियों का अभाव रहता हैं। परन्तु ग्रामीण क्षेत्र के लोग अपने निजी ज्ञान के आधार पर अपने आस-पास मिलने वाली जड़ी-बूटियों से ही उपचार कर लेते हैं। उदाहरण के तौर पर घर-घर तुलसी का पेड़ लगते देखे जा सकते हैं। इस दौर में भी लोग ग्रामीण चिकित्सा पद्धति अधिक प्रचलित हो रही है। स्वस्थ रहने के संदर्भ में कम खाना स्वास्थ के लिए अधिक लाभदायक होता है। मनुष्य के दैनिक क्रिया पर कुछ ग्रामीण कहावते दिये जो रहे जो स्वस्थ रखने मे सहायक हो सकती है।
एक बुन्देली कहावत हैः-
सांझा ब्यालु, सवेरे कलेऊ, अर्थात् संध्या के समय भोजन और प्रातःकाल नाश्ता स्वास्थ के लिए अति आवश्यक है। इसी प्रकार किस मास में कितना भोजन करना चाहिए, इसका भी विधान है।
अगहन मास के दो पखवारे,
खूब जतन से काटो प्यारे।
कार्तिक मास में होय दीवाली,
भर-भर थाली करो ब्याली।।
अर्थात् अगहन मास में कम और कार्तिक में पेट भर खाना चाहिए। लोक साहित्य में कम आहार के संदर्भ के अनेकों कहावते है-
आहार मरे, या भार मारे
अर्थात जिस तरह भारी बोझ मारता है, उसी तरह अधिक भोजन भी मारता है। इसी तरह-
खाये के भूते, सूते घाव,
काहे नई बैद्य बिसावे जाव।
अर्थात अगर अत्याधिक भोजन करोगे तो बैद्य की आवश्यकता पड़ेगी ही, कुछ लोगों की आदत होती कि बकरी की तरह हमेषा कुछ न कुछ खाते रहते हैं, ऐसे लोगों के बारे में कहा गया है-
खाये बकरी की तरह,
तो सूखे लकड़ी की तरह।
यही नही कहावते में यह भी बताया गया है कि कैसा और कौन सा अन्न, कब खाना चाहिए। कहा जाता है
जैसा खाये अन्न, वैसा रहे मन। यहां तक कि-
दाँतों सा आंतर
यानि दांतों से जैसी चीच खाओं वैसी ही आंतों से होगी। किस मास में कैसा भोजन होना चाहिए, इसका भी एक विधान किया गया-
चैत्र चना, बैसाखे बेल,
ज्येष्ठ शयन, असाढ़े खेल
सवन हर्र, भादों तित्त
क्वार मास गुड़ सेवे निस
कार्तिक मूली अगहन तेल
पूस करे दूध से मेल
माघ मास में घी-खिचड़ी खाये
फागुन उठि नित प्रातः नहाय
इन बारह तो करे मिताई
ततो काहे घर बैद्य बुलाई।
इसी तरह किस मास में कौन सी चीज वर्जित है यह भी कहावते द्वारा कहा गया है-
चैत्र गुड़, बैसाख दही
ज्येष्ठ पंथ (महुआ)
असाढ़े बेल, सावन सब्जी
भाद्र मही (मठ्ठा)
क्वार करेला, कार्तिक दही
अगहन मिश्री, फागुन चना
इसी तरह कहा गया है कि-
जो घर हींग, हड़दा,
ता घर जावे विरदा।
अर्थात जिस घर में हींग और हल्दी का प्रयोग नही होता उस घर के लोगों को रोज अस्पताल जाना पड़ता है। इसी तरह के अनेको उपाय स्वस्थ रहने के है जो आज भी गांव में तो प्रयोग किया जाता है है, अब इनका प्रचार और प्रयोग नगरों में भी होने के कारण वहां भी प्रचलित होने लगा है। स्वस्थ रखने मे इस तरह के प्रयोग लाभकारी हो तो निश्चित उसका प्रयोग कर लाभ उठाया जाना चाहिए।


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