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आज को बेटा

बदलते महौल में बच्चों में अपने माता-पिता का अनादर करने की प्रवृत्ति निरन्तर बढ़ती जा रही है, हालात् इतने बिगड़ रहे की बच्चें अपने माता-पिता का तिरस्कार कर रहे हैं। जिन्होने अपने बच्चों के पालन-पोषण के लिए त्याग किया कभी स्वयं भूखे रहकर अपने बच्चों के खुशी के लिए कर्ज में भी डूब गये। ऐसे माता-पिता को उस समय अत्यन्त कष्ट होता है, जब वही बच्चें अपने माता-पिता से कठोर स्वर में बात करते है, उन पर हाथ उठाते है, उनकी सम्पत्ति के बटंवारे के लिए उन्हें बांटते है, क्या यही है आज की पीढ़ी? बच्चों के वजूद में माँ की अहम् भूमिका रहती है। माँ के बिना हमारे जीवन का अस्तित्व नहीं रह जाता। माँ ही हमारे जीवन की मार्ग दर्शक है, वही माँ जो हमारे लिए रातों को जागा करती है, स्वयं भूखी सो जाती है? बच्चों को बिना खाना खिलाए नहीं सोती, वही माँ स्वयं धूप, गर्मी, सर्दी, बरसात हर दुःख झेलती है, परन्तु बच्चे को सुख देने का भरसक प्रयास करती है, खुशी देने के लिए अपनी खुशियाँ कुरबान कर देती है, परन्तु जब बच्चे कहते है कि आपने हमारे लिए क्या किया है? खिलाया, पढ़ाया, पहनाया ये तो आपका फर्ज था। क्या बच्चों का माता-पिता के लिए कोई भी कर्तव्य नहीं है? बदलते हालातों उनको जन्म देकर कोई अपराध किया है।
आज को बेटा अपने सुख-सुविधा के लिए अपने ही परिवार की आहूति क्यों दे रहा है, उसे माता-पिता क्यों बोझ लग रहे हैं? क्या उनका भी बुढ़ापा नहीं आयेगा। आज का युवा वर्ग में ऐसा महौल क्यों पनपता जा रहा है कि अपने माता-पिता को सिर छुपाने के लिए छत और रोटी देने से क्यों भाग रहे हैं। जिसे हमारे घर के पूर्वज कुल का दीपक कहते है, अगर बेटा नहीं तो वंश आगे कैसे बढ़ेगा, क्योंकि बेटियाँ को तो पराया धन कहा जाता है, उनसे तो वंश बढ़ता नहीं है। माता-पिता भी पुत्र पाने की लालसा लिए कोई भी मन्दिर, मस्जिद या अन्य धार्मिक स्थल नहीं छोड़ते, चाहे फिर वो कोई भी धर्म का क्यों न हो, बेटे है तो वो बुढ़ापे की लाठी है, चाहे भले ही वही लाठी उन्हें बेसहारा क्यों न करदे, माँ-पिता बेटे के लिए अपनी सारी पूँजी सब कुछ अपने पुत्र के लिए एकत्रित करते हैं, बाद में वही बेटा सम्पत्ति के कारण अपने ही माता-पिता से दुव्र्यव्हार करते है। अनेकों ऐसी भी घटनाये सुनने मिल जाती है कि सम्पत्ति के लिए पुत्र ने माँ या पिता की हत्या कर दी। कहीं ऐसा तो नहीं बेटा यानि कुल का दीपक कहीं हमारे संस्कारों की गलती तो नहीं हैं अथवा संस्कृति बदलते समाज के कारण तो नहीं हैं। आज का युवा आने कल पर क्यों विचार नहीं कर रहा है। आवश्यकता ही नहीं सभी का कर्तव्य है कि आज के युवाओं की सोच बदलने की, अगर युवाओं की सोंच में कोई परिर्वतन नहीं आया तो आने वाले समय में बेटे की चाहत करने वाला समाज बेटे की कल्पना से भी घबरायेंगे, और अभी बेटों की अपेक्षा बेटियों की संख्या कम है। यदि बेटों की सोंच में कोई ठोस परिर्वतन नहीं आया तो आने वाले वर्षो में लड़कों की संख्या कम होने लगेगी।
काश कि हम सब एकजुट होकर ये प्रण ले कि जो माता-पिता हमें फूलों के सेज में पालते हैं, उन्हें हम कांटों की सेज न दें, उन माता-पिता को हम सुख-शांन्ति दे ताकि उन्हें हम पर गौरव प्राप्त हो, ताकि बेटों जन्म देने में शर्मिन्दगी की अनुभूति न हो।


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