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बच्चों के सामने माता-पिता भी संयमित रहे

दुनिया में सभी को अपना बच्चा बहुत प्यारा होता है वह चाहें इंसान हो या जानवर। फर्क सिर्फ इतना ही है कि जानवर कुछ समय पश्चात् अपने बच्चों को छोड़ देता है क्यों कि उसके पास इंसान की तरह का दिमाग जो नहीं है। हर माता-पिता के लिए बच्चे आँखों के तारे होते है। बच्चों की किलकारियों से ही घर रोशन होता है। उक्त बातें सिर्फ बातें ही नहीं है, बल्कि सच्ची कहावते है। आधुनिक युग में बच्चों और माता-पिता के सम्बन्धों में ठनी रहती है क्योंकि ऐसा इसलिए होता है क्योंकि जब बच्चे माता-पिता की बातों का अनुसरण नहीं करते है और अपने आस-पास जो देखते है उन पर अमल करना शुरू कर देते है। बच्चे नाजुक होते है और ऐसे समय में माता-पिता का कर्तव्य होता है कि वे बच्चों की भावनाओं को समझें और उनकी कद्र करें। उन पर अपने विचार जबरदस्ती मत थोपें। ऐसा करके ही बच्चों का प्यार, इज्जत और सद्व्यवहार पाया जा सकता है। वैसे तो षुरू से ही यही माना जाता है कि बच्चे की प्रथम पाठशाला बच्चे का घर ही होता है जो व्यवहार वह घर में देखता है वही ग्रहण करता है, यदि कभी कमी रह जाए तो माता-पिता को उन कमियों को सलीके से संवारना चाहिये। बच्चों की जिज्ञासा को षान्त करना माता पिता का काम है उनके प्रश्नों का उत्तर देकर उनको सन्तुष्ट किया जा सकता है। आपा खोने के बजाए धैर्य रखें। बचपन से ही बच्चों को शिष्टाचार सिखायें, यही उनको जीवन में अच्छे आचरण के योग्य बनाएगा। बड़ांे की इज्जत करना, झूठ नहीं बोलना, ज्यादा बहस न करने की आदतों को शुरूआत से ही बतलायें। बच्चों के साथ उन शब्दों का प्रयोग करें जो शालीन और शिष्टाचार के दायरे में हो। बच्चों में खराब आदत देखने के लिए लापरवाही कदापि न करें। पहले प्यार से उसे समझायें और ना मानने पर थोड़ी सख्ती दिखायें ताकि बच्चे के जेहन में यह बात बैठ जाए कि मैने जो किया वो गलत है, उसे माता-पिता स्वीकार नहीं करेगें। बच्चों को ऐसे उपनाम मत दें जिससे बच्चे चिढ़कर जिद्दी बन जाऐं और उन पर डाट, प्यार का कुछ असर ही न पड़े। यदि बच्चा धीरे-धीरे काम करता है या सीखने में कमज़ोर है तो उसे आगे बढ़ाने के लिए उत्साहित करें। बच्चों के लिए जो नियम बनायें उन पर सख्ती से पेश ना आयें। संतुलित रहें जिससे बच्चे उन नियमों पर चलने से झिझकें नहीं। बच्चों की जिद करने की आदतों पर विराम लगाने की कोशिश करें। बच्चे के साथ दिन में कुछ समय अवष्य बितायें। स्कूल में क्या हुआ, ये सब जरूर पंूछे। सत्ताह के अंत में उन्हें धुमाने ले जायें ताकि घर के बाहर के वातावरण का मजा ले सकें। कभी-कभी बच्चों को शांपिग पर ले जायें ताकि प्यार बना रहे। बच्चों की गलत हरकतों को कभी नजर अंदाज न करें। उन्हें प्यार पूर्वक समझायें बच्चों को हर हालात में प्यार दें पर गलती करने पर उत्साहित न करें। उन्हें बतायें कि हम आपसे बहुत प्यार करते है लेकिन आपकी हरकतों को पंसद नहीं करते हैं। बच्चों के सामने माता-पिता भी संयमित रहे। आपस में बुरे वचनों का प्रयोग न करें, ना ही बच्चों के सामने झूठ का सहारा लें। ये सब बातें बच्चे जल्दी ग्रहण करते है और उन्हें समझाने पर वे हम पर ही वार करने की कोशिश करते हैं कि फलां समय आपने भी तो ऐसा किया था। बच्चों को प्यार से छोटे-छोटे काम करने के लिए एवं अपने काम में मदद करने के लिये प्रोत्साहित करें। अच्छे काम के लिए प्रशंसा करें, शब्दों में कंजूसी मत बरतें। हर काम के लिये बच्चों को लालच न दें। खेल तमाशे के रूप में तो ठीक है पर उनकी आदत न बिगाड़े। अच्छे कामों के लिए उनकी प्रशसा जरूर करें। कभी-कभार माता-पिता से कुछ गलती हो जाए तो बच्चों को साॅरी कहने से मत कतरायें। इस व्यवहार को देखकर बच्चे भी अपनी गलतियों को दुबारा नहीं दोहरायेगें। उनकी कमियों को बार-बार उजागर मत करें। माता-पिता अपने बच्चों से रिष्ता की गरिमा को बनाकर रखे। उन पर हुक्म नहीं चलाकर उनके सरंक्षक और निर्देशक बनकर मार्गदर्शन करें। अतः बच्चों को बचपन से ही पैसे, समय और मेहनत की कीमत के बारे बतायें कि ज़िन्दगी में अगर आगे बढ़ना है तो समय की इज्जत करना सीखो। समय बर्बाद नहीं करना चाहिए नहीं तो एक दिन यही समय हमें बर्बाद कर देता है, दूसरा मेहनत उस ताले की चाभी का नाम है जिससे जिंदगी के सभी ताले खुल जाते हैं, यह बात उनके मन में बचपन से बिठा देनी चाहिए, तीसरा पैसे की कीमत समझना आना चाहिए क्योंकि पैसे को प्राप्त करने में कमाने में बहुत वक्त लगता है बर्बाद करने में कुछ सेकेन्ड। तो इस प्रकार आप अपने बच्चों को संवारिये मगर सलीके से।


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