भाई नौकरी क्या मृतक आश्रित कोटे से विरासत में मिली है

एक शाम मैं मौसम के बदलते मिजाज को देखते हुए रूमानी सर्द हवाओं का आनंद लेने के लिए नवाबों के शहर लखनऊ (जहां की तहजीब, मेहमान नवाजी और नज़ाकत के चर्चे दूर-दूर तक है) चलते-चलते राह में एक नवाब भाई के चीखने-चिलाने की आवाज़ सुन मेरे मन में एक हरकत सी हुई, कि देखा जाए क्या माज़रा है?
नवाब साहब काले रंग की लक्जरी गाड़ी के पीछे खड़े एक रिक्शे वाले भाई पर कुछ इस तरह बरस रहे थे मानो, उसने उनकी संपत्ति पर कब्जा कर लिया हो। मैं खुद को रोक नहीं पाया और पूंछ बैठा, क्या बात है भाई क्यों इतना नाराज हो रहे हैं? नवाब साहब तो शांत रहे, परन्तु रिक्शे वाले भाई खुद को शांत न रख पाये और बोल बैठे, भैय्या ! साहब अपनी गाड़ी पीछे कर रहे थे और मेरे रिक्शे से उनकी गाड़ी में जरा सी खरौच आ गयी, भैय्या मैंने ध्यान नहीं दिया की बाबूजी गाड़ी ले जा रहे हैं, नही तो तो रिक्शा पीछे कर लेता। इतना सुनकर नवाब साहब अपनी चुप्पी तोड़ते हुए बोले, ओय ये क्या तेरा मामा लगता है? जो इसको कहानी सुना रहा है? ये सड़क क्या तेरे बाप की है? तुम लोग साले जहां चाहोगे वहीं अपना डेरा जमा लोगे?
रिक्शे वाले भाई गलती हो गई साहब! मुझसे भी बर्दास्त नहीं हुआ और पूछ लिया साहब से, भाई क्या ये सड़क आपके पिताजी की है? नवाब साहब झुझलाते हुए, साले तू क्यूं बड़ी वकालत कर रहा है? हां हैं तो? जानता नहीं है मैं कौन हूँ? मैं भी बड़े चंचल मूड में था, गुस्ताखी कर बैठा, भाई अब इतनी बातचीत हो ही गई है तो जान-पहचान भी कर लेते है, बता ही दीजिये की कौन हैं आप? शायद कभी कोई काम पड़ ही जाए, नवाब जी उबलते हुए, सचिवालय में हूं मैं, चेहरे पर बादामी मुस्कान लिए मेरा अगला सवाल भाई क्या नौकरी मृतक आश्रित कोटे में विरासत में मिली है? मेरे पूछने का आश्रय भाई का दिल दुखाना नही, सिर्फ इतना था कि मैं उनको सच्चाई से उन्हें रूबरू करा सकूं, जो वो भूल रहे थे, क्योंकि जहां तक मेरी जानकारी हैं मेहनत से मिली नौकरी में इतनी अकड़ नहीं होती है। साहबजादे शर्म से नज़र न मिला सके, नज़रे झुकी रही और वो चुपचाप अपनी लक्जरी गाड़ी में बैठे और चले गये। उम्मीद है कि ये वाकिया उन्हें जिन्दगी भर याद रहेगा और वो इस कदर किसी और पर नहीं बिफरेंगे।


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