मास्टर साहब को देखकर ही घिग्घी बंध जाया करती थी

रैंक, डिवीजन, क्लास में स्थान, अंकों का बेहतरीन प्रतिशत... आधुनिक समय में शिक्षा के यही मायने हैं। नालेज क्या है, हो या न हो, इसका कोई मतलब नहीं है। क्यों कि छात्र एवं माता-पिता तो सिर्फ अपने सुपुत्रों को नौकरी करते और अकूत पैसा कमाते हुए देखना चाहते हैं। आखिरकार आज की किसी भी पढ़ाई में बच्चों की आधे से अधिक का सिरदर्द जो अपने जिम्मे रखे हैं। उनकी मंशा और मनोदशा अपने स्टेटस को बढ़ाना मात्र है। इसीलिए इतनी बड़ी रैंकों और डिवीजनों के बावजूद भी सामाजिक व्यवहारिक और वास्तविक जीवन पटल पर धराशाही हो रहे हैं।
यही वो भारत के कर्णधार हैं जब कहीं सेटेल हो जाते हैं। तो गार्जियन माता-पिता को ऐसा नकारते हैं, जैसे कि ये बेवजह के भार हों। क्यों कि शिक्षा तो मात्र नौकरी और पैसा मात्र निमित्त रही है।
मैं जा रहा हूँ आज के चार दशक पहले... जब हम तख्ती और बुदिक्का एक बस्ते में एक हिन्दी प्रवेशिका की पुस्तक लेकर स्कूल जाते थे। मास्टर साहब को देखकर ही घिग्घी बंध जाया करती थी, कि न जाने कब हमारा छड़ियों से स्वागत होने लगे और रातभर से लेकर पछिलहरा तक का पढ़ा-लिखा बिलाप करता रहा। तखतियों पर बार-बार लिखना, लिखकर बिगाड़ना मानों मस्तिष्क में पेवस्त किये जाने का काम था। एक दिन की पिटाई जाने कितने दिन याद रहती थी, मगर पिटाई की किश्तें अनवरत चलती रहती थी। कक्षा छःह से अंग्रेजी पढ़नी सीखी, मगर कभी भारी-भरकम किताबों की लड़ाई नहीं आड़े आई। दशहरा, दीवाली और होली आदि में लम्बी छट्टी की इतनी खुशी होती थी, जितनी तो आज किसी को जेल से छूटने पर भी नहीं होती होगी। दस पैसे रोज खर्च में मिलते थे, और अपनी चटोरी जबान तथा और भावनाओं पर अंकुश लगाकर अगर एक सप्ताह भी पैसे बचा ले गये तो पूरे क्लास मैं बार-बार जेब से दस के सात सिक्के निकालकर अमीर होने के गौरव झाड़ते रहते थे।
मगर भइया अब तो स्वच्छ भारत में उज्ज्वला है, आधार कार्ड से जुड़ी हुई गैस है, सुलभ शौचालय है, कालेधन की वापसी है, वैट है, मंहगाईयां है, वादे है, विदेश घूमने के इरादे है, विदेशी व्यापार, विदेशी नीति व निवेश है। जुगाड़ व कम्प्रोमाइज है। आतंक और वादी है, एक दूसरे पर लांछन है, साम्प्रदायिक झगड़ों का पुलिन्दा है... और इन सब अच्छे दिनों के बीच में जनता जिन्दा है। पूरी दुनिया को यही सब बाते खल रही है कि इतनी दिक्कतों के बाद भी भारत की जनता सीधी कैसे चल रही है इन्ही सबके बीच, अब स्कूल चलो। मगर स्कूल वालों और उनकी पढ़ाई खुद ही मालिक है। स्कूल एक बिजनेस है, शिक्षा माफियाओं को शह मिल रहीहै। गरीब व मध्यमवर्गीय जनता का आज आधे से ज्यादा पैसा शिक्षा और चिकित्सा में जाया हो रहा है। स्कूल विद्यालयों में मानकों से काम नहीं हो रहा है। कितने बच्चों पर कितने शिक्षक और टीचर की सैलरी कितनी। कितने बच्चे निशुल्क पढ़ाये जा रहे है। कुछ नही पता। योजनाओं की धज्जियां उड़ी पड़ी हैं। न पूंछने वाला कोई न जांचने वाला कोई... बस स्कूल चलो। अगर आज के टीचरों को एक सही मायनों में इमला बोल दिया जाये तो हालत व हालात दोनों ही खराब हो जायेंगे। फिर भी इस अंधा-धुन्ध दरबार मे कहा जा रहा है कि.... अच्छे दिन आयेंगे। आयेंगे... शब्द... क्या कभी आयेगा। इसका जवाब तो दशकों बाद भी मिल जायेगा। सम्भव तो नहीं है बस... स्कूल चलो, और कागजी स्टेटस बढ़ायेंगे। धैर्य रखो... अच्छे दिन आयेगे!