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राष्ट्र की सही रक्षा कैसे की जानी चाहिए

अरे चन्द्रगुप्त! अब तुम सचमुच ही सम्राट चन्द्रगुप्त बन चुके हो! आज तुम मेरी एक इच्छा पूरी करो! चाणक्य ने अपनी लम्बी चोटी की गाँठ संभालते हुए कहा। गुरूदेव! आप भी बहुत मीठी चुटकी लेते हैं। सारा सामाज्य आपके इशारे पर नाचता है। हम आपके आधीन हैं! कहिए, क्या आज्ञा है! हमें उसे पूरा करने पर गर्व होगा।
चन्द्रगुप्त ने नम्रतापूर्वक निवेदन किया!
अरे चन्द्रगुप्त! नहीं, महाराज चन्द्रगुप्त!
आज तुम्हें मेरी एक इच्छा ईमानदारी से पूरी करनी होगी। मुझे आश्वासन दो कि मेरी इच्छा सचमुच पूरी करोगे। वैसे भी मेरा हक है मैंने तुम्हारी सभी इच्छायें पूरी कीं। गिनाना तो नहीं चाहिए पर याद तो दिला ही देता हूँ कि सम्राट के पद का हकदार बनाया, विश्व-विजेता सेल्यूकस पर भी तुम्हारी विजय पताका फहरायी। उसकी विश्व सुंदरी पुत्री हेलेन को तुम्हारी पत्नी बनाया। अमात्य राक्षस को तुम्हारे महामंत्री के रूप में कार्य करने को लगया। राज्य का क्षेत्रफल बढ़ाने का हर एक अभियान सफल बनाया। कहने का मतलब यह है कि इस गरीब ब्राह्मण से जो तुमने मांगा उसे जुटाने के लिए स्वयं को झोंका। तुम्हारी सभी इच्छायें पूरी कीं। तब क्या तुम मेरी एक आकांक्षा पूरी नहीं करोगे। तुम नहीं करोगे, यह मैं नहीं सोच रहा। परन्तु तुम क्या मेरी इच्छा पूरी करने का वायदा नहीं कर सकते? मैं गरीब ब्राह्मण आज्ञा नहीं दे रहा, सिर्फ अपने नरेश से आश्वासन चाह रहा हूँ। चाणक्य चोटी को खुलने लगी गांठ को बांधते हुए कहा।
इधर सम्राट चन्द्रगुप्त चाणक्य के इस अजीब व्यवहार से चकित थे। जिसका सब कुछ है, यह आश्वासन क्यों मांग रहा है। तभी चाणक्य की आवाज फिर गूंजी, चन्द्रगुप्त! क्या सोच रहे हो! क्या मुझे आश्वासन देने में कोई हिचक है तुम्हें? न
नहीं गुरूदेव! वैसे तो आपकी हर आज्ञा इस राज्य के लिए ब्रह्मा की लकीर है। फिर भी आप आश्वासन ही चाहते है तो ठीक है! जैसी आपकी इच्छा होगी उसे करके मुझे प्रसन्नता होगी! सम्राट चन्द्रगुप्त कह गये।
वत्स चन्द्रगुप्त! तुम्हारा सितारा बुलंद रहे! आज तुम इस देश के शिखर पर हो पर मेरे जीवन की सार्थकता तुम्हारे इस राजमहल में नहीं किसी सरिता, सरोवर, वन या निर्जन में मेरी पर्ण कुटिया में है। कदाचित् तुम्हे यह स्मरण ही होगा कि मैं जब तुम्हारे यहाँ था तब अपना मृग चर्म, कम्बल, लोटा और डण्डा यहाँ पर जमा करवा दिया था मुझे अब वह अमानत वापस करा दो और मुझे विदा करो ताकि मैं अपनी कुटिया आबाद कर सकूं। चाणक्य ने गम्भीरता से कहा!
यह क्या गुरूदेव?
अपना आश्वासन भूल गये क्या?
नहीं गुरूदेव!
तो फिर......?
और अब सम्राट चन्द्रगुप्त के पास कोई उत्तर नहीं था। तन पर विभूति लपेटे चाणक्य डण्डा फटकारते आये थे, वैसे ही राजमहहल से लौट गये अपनी कुटिया की दिशा में तेजी से।
एक दिन युनानी शासक सेल्युकश के दरबार में किसी अनुभवी दरबारी ने पूछा
सम्राट सिकंदर तो कहीं परास्त नहीं हुए। वे भारत की शक्ति देखकर सिंधुतट से वापस हुए थे! पर आप कैसे हार गये?
सेल्यूकस ने कहा, यह सब हमारे जामाता चन्द्रगुप्त के अप्रतिम शौर्य के कारण हुआ।
तुम्हारा सोचना सही नहीं है, सेल्यूकस!
इस हार का कारण था वहाँ का महामंत्री चाणक्य! उस त्यागी, तपस्वी, तेजस्वी ब्राह्मण ने सारे भारतवर्ष को संगठित करके विभिन्न मोर्चो पर लगा रखा था। वह राष्ट्र का वेतन भोगी रक्षक नहीं, बल्कि समर्पित भाव से जीने वाली असली रक्षक है।
तो फिर हमें उस महापुरूष के दर्शन अवश्य करने चाहिए।
हाँ करने ही चाहिए! फिर आपको तो उनकी दर्शन यात्रा से कई लाभ होंगे।
तो फिर तैयारी कीजिए!
देखते ही देखते सेल्यूकस का दल भारत यात्रा पर चल दिया। पर्यटन महत्व के स्थानों को देखते हुए जब वे पाटिलपुत्र पहुंचे तब हेलेन और चन्द्रगुप्त ने उनका शाही ढंग से स्वागत किया। पर वे चकित थे कि अधिकारियों में चाणक्य कौन है? हम उनके दर्शन के लिए ही इस यात्रा पर निकले है।
चन्द्रगुप्त बोले महाराज, आप तो मेरे पिता तुल्य हैं। आप से क्या छिपाऊँ! यह शायद संभव हो। कारण यह है कि अब तो वे अपनी कुटिया में जा चुके हैं। उनकी पूर्व अनुमति के बिना कोई भी वहाँ नहीं जा सकता। राजा भी नही!
तो अनुमति मंगवा लीजिए!
यही तो परेशानी है। उन्होंने अनुमति नहीं दी तो फिर स्थिति अजीब हो जोयेगी। एक बार प्रस्ताव अस्वीकार हो जाने पर फिर अनुमति नहीं मांगी जा सकती। हाँ दोबारा अनुमति का मैं आग्रह कर सकता हूँ। यह अपवाद है! चन्द्रगुप्त ने अपनी परेशानी विस्तार से बताई।
ठीक है आप परेशान क्यों होते हैं। जो कुछ भी स्थिति बनेगी उससे निपट लेंगे। वह इंकार करेंगे नहीं। यदि कर दिया तो हम अपमानित नहीं महसूस करेंगे।
अंत में भारत सम्राट और सेल्यूकस दोनों रथ पर सवार होकर चले। गुरूजी की पर्ण कुटिया से कोई आधा फर्लांग दूर रथ रोक दिया ताकि उसकी गड़गडाहट उनकी कूटिया तक नहीं पहुँचे। चाणक्य को सूचना भेजी गई.... और अनुमति भी मिल गई। सेल्यूकस चकित था कि यह कैसा सम्राट है और यह कैसा महामंत्री। पर सेल्यूकस को मिलना था इसलिए क्या कहते पर।
कुटिया में चाणक्य और सेल्यूकस का आत्मीयता भरे वातावरण में अभिनन्दन किया। उनका कुशल क्षेम पूछा, यूनान सम्राट, आपने कैसे इस गरीब ब्राह्माण की कुटिया पर इतनी दूर से पधार कर इसे पवित्र किया?
सेल्यूकस ने अपनी यात्रा का उद्देश्य बताया तो प्रसन्न होकर चाणक्य बोले, आप हमारे अतिथि हैं। भारत में तो अतिथि देवता ही होते हैं। आपने सही-सही बात कहकर मुझ गरीब ब्राह्मण की आत्मा प्रसन्न कर दी। वैसे यात्रा के दौरान आप जहाँ भी ठहरे उसकी मुझे पूरी जानकारी है। महामंत्री चाणक्य से यात्रा के दौरान हुई घटनाओं, चर्चाओं, भोजन, शयन आदि की व्यवस्था का पूरा विवरण सुनकर सेल्यूकस चकित रह गये।
उसे चकित देखकर चाणक्य बोले, आप हमारे अतिथि है, इसलिए पूज्यनीय भी! पर सेल्यूकस, हैं तो आप हमारे देश के लिए विदेशी ही।
सेल्यूकस ने चन्द्रगुप्त से कहा, मैं गुरू चाणक्य के दर्शन से धन्य हो गया अब शेष ही क्या रहा और समझने के लिए। जिस विरक्त मनीषी की खुली निगाहें राष्ट्र के चप्पे-चप्पे पर लगी हो, वह राष्ट्र एकता के धागे में बंधा कैसे नहीं रहेगा।
सेल्यूकस ने आचार्य को साष्टांग प्रणाम करके उनकी पग धूलि को ललाट पर लगाकर विदा ली। चाणक्य उन्हे विदा करके कुटिया में लौट गये तो सेल्यूकस प्रसन्न मन से बोले, सम्राट आपका अहो भाग्य कि ऐसा त्यागी, तपस्वी, विवेकी और चैकन्ना अप्रतिम देशभक्त आपका रक्षक है।
दरबारी अपनी सत्य धारणा पर प्रसन्न था। सेल्यूकस ने उसे पुरस्कार देकर कहा, तुम्हारे कारण ही मैं आचार्य चाणक्य के दर्शन कर पाया। राष्ट्र की सही रक्षा कैसे की जानी चाहिए यह भी सीख पाया। सेल्यूकस प्रसन्न था सही रक्षक के दर्शक करके।


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