तुलसी में औषधि के साथ आस्था भी है

आकाल मृत्यु हरणं सर्व व्याधि विनाशनम्! चरणामृत देते हुए पुजारी आज भी उपरोक्त मंत्र पढ़ते है कि तुलसी दल के सम्मिशरण से चुल्लूभर चरणामृत ही (अकाल) असमय की मृत्यु से रक्षा करता है और प्राणिमात्र के नर-नारियों की व्याधियों का विनाश कर देता है। भारत के विद्वान मनिषियों ने जड़ी-बुटियों के महत्व को समझा और मनीषियों ने तुलसी में रोगों को उखाड़ फेंकने की द्विव्य शक्ति देखी प्रत्येक स्त्री-पुरूष इसका लाभ उठा सके, स्वस्थ और निरोगी रहकर शतायु हो इसलिए वे हमारे पूज्यनीय संत-मनीष्यिों ने स्वद से जोड़ते हुए रसोई में ले आए और उन्होंने धार्मिक सोच दिया हमारे आदिपूर्वज मनीषियों ने प्रकृति को अपने अस्तित्व के साथ जोड़कर देखा था। भारत के मनीषियों ने प्रकृति प्रदत्त वनस्पतियों को जड़ रूप नहीं माना, मनुष्य के जीवन में प्रकृति का क्या और कैसा सम्बन्ध है। इसका वृहत् विवेचन हमारे प्राचीन ग्रंथों में मिलता है आयुर्वेद का तो आधार ही प्रकृति के संतुलन को बनाये हुए शरीर को इतना सक्षम बनाना है कि वह अपने जीवन के सभी पुरूषार्थी को भलि-भांति साध सके।
तुलसी के पौधे प्रायः भारत के हिन्दू परिवारों के घरों में अपाये जाते है। आज भी अधिकतर हिन्दू परिवार के लोग बड़ी श्रद्धा के साथ तुलसी की पूजा करते हैं। आप सम्पूर्ण भारत में पूरब से पश्चिम तक देख सकते हैं। चाहे वह मराठी हो, बंगाली हो आप उनके घरों में श्यामा, काली तुलसी और सफेद तुलसी की पूजा विधिवत् देख सकते हैं।
तुलसी के गुण:- स्वद में चरपरी, कड़वी, अग्नि दीपक, ह्दय के लिए हितकारी, गरम, दाह, पित्त, वृद्धिकर, मूत्रकृच्छ, कोढ़, रक्त विकार, पसली पीड़ तथा कफ नाशक होती है।
- सफेद तुलसी उष्म, पाचक एवं श्याम व कफ रोगों में गुणकारी मानी जाती है।
- काली तुलसी (श्याम तुलसी) शीत, रिग्घ, कफ एवं ज्वार नाशक है।
सम्पूर्ण विश्व में एव भारत के वनस्पति औषधि शोध अनुसंधानकर्ता वैज्ञानिकों, डाक्टरों, वैद्यों, हकीमों ने तुलसी के बारे में गहन अध्यन करके अनुभवों को दर्शाया है। तुलसी का तेल में क्षयरोग (टी.बी.) के कीटाणुओं को नष्ट करने की अद्भुत शक्ति रखता है। और मलेरिया को भी तुलसी द्वारा जड़ से समाप्त किया जा सकता है।
मैं अपने जीवन के 88 वर्षो के अनुभवों के आधार पर गर्व और दावे से कह सकता हूँ, कि तुलसी दल (तुलसी पत्ती) को चबाकर खाने से आंतों की सफााई का सर्वश्रेष्ठ गुण पाया जाता है। जैसे ही तुलसी दल का रस आँतों तक पहुँचता है, आंतों में जमे तत्व उनसे अलग हो जाते हैं।
स्त्री रोगों में भी तुलसी का सेवन बहुत ही गुणकारी प्रभाव से चर्मरोग, सीने में दर्द, स्तन पीड़ा, प्रदर एवं योनि के समस्त रोगों पर राम बाण औषधि तुलसी है। भगोष्ठ को लटकने नहीं देता, प्रजनन तथा मूत्र की सुरक्षा करता है। इसके अतिरिक्त आपको जानकर आश्चर्य होगा कि तुलसी की गन्ध (खुसबू) से मृत शरीर तीन-चार दिनों तक बिना सड़े-गले सुरक्षित रहता है।
तुलसी से यमदूत भी भाग जाते हैं, सांप, कन, खजूरा, मच्छर और बिच्छू के विष (जहर) से मौत हो जाती है। आप किसी धर्म में आस्था और विश्वास रखते हों फिर भी आप तुलसी को अपने घर-आंगन, सड़क किनारे या लाॅन, बाग-बगीचे में लगा के देखें तो तुलसी की गंध से सांप बिच्छू वहां से भाग जाते है इसी कारण धर्म शास्त्रों में तुलसी वाले घर-अंगन को तीर्थ के समान माना जाता है। क्योंकि वहां रोग-शोक, वहम्-बीमारी टिकती ही नहीं। शास्त्रों में तुलसी के पत्ते-पत्ते और रेशे-रेशे में देवता (सदगुण) निवास करते है। इसलिए देवताओं की उपासना (सदगुण ग्रहण) करने के लिए हमें आप सभी को तुलसी का दैनिक उपयोग जीवन में स्वस्थ और निरोगी रहने के लिए करना चाहिए, जो किसान या मनुष्य तुलसी पौधों की निराई-मढाई करने के दौरान जो मिट्टी हाथ-मुंह माथे या शरीर मे लग जाती है वो तुलसी त्वचा के सारे रोगों को काट देती है।
सम्पूर्ण विश्व एवं भारत के निवासी तुलसी को विभिन्न नामों से जानते है। तुलसी के गुणों के इतिहास के आधार पर वेदों, औषधि विज्ञान ग्रन्थों और पुराणों में तुलसी के प्रमुख नाम, गुण निम्न तरह हैः-
1. कायस्था:- क्योंकि यह काया को स्थित रखती है।
2. तीव्रा:- यह तीव्रता से असर करती है।
3. देव दुन्दुमि:- क्योंकि इसमें देवों के गुणों का निवास रहता है।
4. दैत्याधि:- रोग रूपी दैत्यों का संहार करती है।
5. पावनी:- मन, वाणी और कर्म से पवित्र कराती है।
6. सरला:- हर कोई आसानी से प्राप्त कर सकता है।
7. सुभगा:- महिलाओं के यौनांग को निर्मल-पुष्ट बनाती है।
8. सुरसा:- रस (लाल रस) ग्रन्थियों को सचेतन करती है।
9. शोभा सुगन्धि और पवित्रता की प्रतीक है।
तुलसी का पौधा जिस आंगन में लहलहाता है, उसकी शोभा और सुगन्धि में पवित्रता होती है हमारे भारत की नारियां अपने जीवन को तुलसी जैसा बनाने के लिए अपने विनम्र भावों से ही कहती है कि मैं तुलसी तेरे आंगन की।
तुलसी का जीवन में महत्व:-
- यह मन में बुरे विचार नहीं आने देती।
- तुलसी रक्त विकार शान्त करती है।
- तुलसी की कंठी-माला कंठ रोगों से बचाती है।
- कामोत्तेजना नहीं होने देती है और नपुंसक भी नहीं बनाती।
- तुलसी दल चबाने वालों के दाँतों में कीड़ा नहीं लगता है।
- तुलसी के सेवक को क्रोध कम आता है।
- तुलसी की माला, कंठी और करधनी पहनने से शरीर निर्मल और रोगमुक्त और सात्विक बना रहता है।
- कार्तिक माह में जो प्राणी तुलसी का सेवन है, उसको साल तक डाक्टर, वैद्य और हकीम के पास जाने की आवश्यकता नहीं पड़ती है।
विशेष ध्यान रखें:- तुलसी को अंधेरे में नहीं तोड़ना चाहिए, क्योंकि अंधेरे में तोड़ने से नाना प्रकार के विकार आ सकते है। अंधकार में तुलसी की लहरे प्रखर हो जाती है।
- तुलसी के सेवन करने के बाद दूध नहीं पीना चाहिए, इससे चर्म रोग हो जाते है।
- कार्तिक महीने में यदि तुलसी का रस ले चुकें हो तो उसके बाद पान का सेवन न करें। यह दोनों गर्म है, क्योंकि कार्तिक महीने में रक्त संचार भी प्रबलता से होता है। इसलिए तुलसी खाने के बाद पान खाने से अनेकों शरीरिक व्याधियां आ जाती है।
1. तुलसी दल के जल से स्नान करने पर चर्म रोग (कोढ़) नहीं होता है।
2. सूर्य या चन्द्र ग्रहण के दौरान अन्न में तुलसी दल इसलिए रख दिया जाता है कि सौरमण्डल की विनाशक किरणों से खाद्यान्य पदार्थ दूषित न हो।
3. जीरे के स्थान पर पुलाव आदि में तुलसी रस के छींटे देने से पौष्टिकता और महक के दस गुना वृद्धि हो जाती है।
4. दतेजपत्र की जगह शाक-सब्जी में तुलसी दल डालने से मुखड़े पर निखार आंखों में रोशनी और वाणी में तेजस्विता आती है।
5. तेल, साबुन, क्रीम और उबटन में तुलसी रस का उपयोग तन-बदन को निरोगी चैतन्य और कांतिवान बना देता है।
6. स्वभाव में सात्विकता लाने वाला केवल एक मात्र पौधा तुलसी है।
7. तुलसीके समक्ष खड़े होकर पढ़ने अथवा विचारने, दीप जलाने और तुलसी पौधों की परिक्रमा करने से दसों इन्द्रियाँ के विकार दूर होकर मानसिक चेतना प्राप्त होती है।
इस तरह तुलसी में ऐसे अनेकों गुण है, जिन्हें इतनी सूक्षमता से नहीं बताया जा सकता, हमारे पाढ़कों से अनुरोध है कि तुलसी दल के बारे में अधिक से अधिक अध्ययन करें और तुलसी के महत्व को समझें और दूसरों को भी उसकी जानकारी देकर समाज में परोपकार का कार्य करें। क्योंकि लोगों की तुलसी में औषधि के साथ आस्था भी है।


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