भारत माता की जय!

भारत की कालजयी-मृत्युंजयी सनातन वैदिक संस्कृति सर्वस्पर्शी-सर्वसमावेशी है। यह प्रकृति के साथ एकात्मता, सहअस्तित्व एवं समन्वय की पक्षधर है एवं यहां सभी मत-संप्रदायों का समान रूप से आदर है। अतः भारतमाता के उपासक होने पर हम अत्यन्त गर्वित हैं ..! भारत माँ की जय कहना, मातृभूमि की वन्दना है ! वन्दना से शक्ति मिलती है, यही है, देश की पूजा, यही है, देशभक्ति। अथर्ववेद में कहा गया है कि माता भूमिरू, पुत्रो अहं पृथिव्यारू। अर्थात, भूमि मेरी माता है और मैं उसका पुत्र हूँ। यजुर्वेद में भी कहा गया है, नमो मात्रे पृथिव्ये, नमो मात्रे पृथिव्यारू। अर्थात, माता पृथ्वी (मातृभूमि) को नमस्कार है, मातृभूमि को नमस्कार है। वाल्मीकि रामायण में उल्लेख है, जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी ... (जननी और जन्मभूमि का स्थान स्वर्ग से भी ऊपर है।) भूमि सूक्त के दसवें मंत्र में मातृभूमि की धारणा को स्पष्टतः इन शब्दों में व्यक्त किया गया है, सा नौ भूमिविर्सजतां माता पुत्राय मे पयरू। यानी, मातृभूमि मुझ पुत्र के लिए दूध आदि शक्ति प्रदायी पदार्थ प्रदान करे। आदिकाल से ही पृथ्वी को मातृभूमि की संज्ञा दी गई है। अतः भारतीय अनुभूति में पृथ्वी आदरणीय बताई गई है, इसीलिए पृथ्वी को माता कहा गया।
भारत माता की जय के बिना राष्ट्रीय पर्व का उद्दघोष पूरा नहीं होता है। भारत माता की जय भारतीय सेना का ध्‍येय वाक्‍य है। भारतभूमि को जीवन का पालन करने वाली माता के रूप में रूपायित कर उसकी मुक्ति के लिए की किये गए प्रयासों में उसकी संतानों ने इस नारे का बार-बार प्रयोग किया है। भारतमाता की वंदना करने वाली यह उक्ति हर उद्दघोष के साथ स्वाधीनता संग्राम के सिपाहियों में नए उत्साह का संचार करती है। इसलिए आज भी इस नारे का प्रयोग राष्ट्रप्रेम या राष्ट्र निर्माण से जुड़े अवसरों, कार्यक्रमों एवं आंदोलनों में किया जाता है। भारत माता की जय भारतीय स्वाधीनता संग्राम के दौरान सर्वाधिक प्रयुक्त होने वाला यह नारा, हर भारतीय के जीवन का पोषण करने वाली भारतभूमि की मुक्ति के लिए की गई कोशिशों में उसकी संतानों के हृदय से किया गया एक उद्घोष था। उत्साह का संचार करने वाली भारतमाता की वंदना करती यह उक्ति, स्वाधीनता संग्राम के सिपाहियों में नयी ऊर्जा और साहस का दम भर देती थी। यह केवल नारा नहीं है, यह राष्ट्रप्रेम से जुड़ी एक भावना है, जिसे राष्ट्र निर्माण से जुड़े अवसरों, कार्यक्रमों, आंदोलनों में उद्घोषित करने से मन को अदभुत शक्ति और शांति मिलती है। मानों हमने अपनी धरती माँ की वन्दना की हो और प्रतिफल में हमें एक आत्मबल मिला हो, जो हमें विश्व से प्रतिस्पर्धा के लिए प्रेरित कर, हमारा विजय मार्ग प्रशस्त कर रहा है ...।
भारत देश एक नारी की प्रतिमा मात्र नहीं है, न ही यह कोई मूर्ति है जो किसी देवी-देवता की परिचायक होकर किसी धार्मिक भावना को प्रकट करती होय वास्तव में भारत का हर कोना, हर भाग मिलकर ही भारतमाता के स्वरुप को दर्शाता है। इसलिए जब आप “भारत माता की जय” कहते हैं, तो याद रखिए कि आप भारत के हर किसानों, मजदूरों, दूकानदारों, उद्योगपतियों, संत-महात्माओं, खिलाड़ियों, कलाकारों, वैज्ञानिकों, सेना के जवानों, जनसेवकों, महिलाओं, बच्चों, बुजुर्गों सभी की जय कहते होय जिन्होंने इस देश को अतुल्य, समृद्ध और शक्तिशाली बनाने में अपना अमूल्य योगदान दिया है। हमारे पहाड़, नदियाँ, जंगल, जमीन, वन-संपदा, खनिज आदि हमारे प्राकृतिक संसाधन यही तो है, भारतमाता। हम जिस धरती पर रहते हैं, जिस देश ने हमें इतना कुछ दिया है, जिस धरती पर हमारी आने वाली पीढ़ी जन्म लेंगी, उस धरती माँ की वन्दना करने में हम सब को गर्व होना चाहिए इसके लिए हमें किसी पर्व, त्यौहार या अवसर की आवश्यकता नहीं है। अतः भारत माता की जय हम हमेशा कह सकते हैं, हर स्थान पर, हर व्यक्ति से कह सकते हैं ...। “भारत माता की जय ... जय हिंद ! ... जय भारत वंदेमातरम !


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