रक्षा बंधन का महत्व

भारत विभिन्न धर्म, संस्कृति, सभ्यता का देश है। यहाँ पर हर रिश्ते को भी बड़ा मान-सम्मान मिला है और हर रिश्ते में एक प्रेम भी छुपा रहता है। इस समय सावन का महीना है रिमझिम फुँहारें शीतल, मन्द, सुगन्ध पवन चलती रहती है। ऐसे रिमझिम मौसम में सावन की पूर्णिमा का दिन आता है। इस दिन का बहुत महत्व होता है, इसी दिन भाई-बहन के पवित्र प्रेम का दिन है क्योंकि इसी दिन रक्षा बन्धन का त्योहार मनाया जाता है।
 रक्षा बंधन कब से शुरू हुआ कोई नहीं जानता है। लेकिन पौराणिक मान्यता है रक्षा बंधन (राखी) देव और दानवों में जब युद्ध शुरू हुआ तब दानव हावी होते नजर आने लगे। भगवान इन्द्र घबरा कर बृहस्पति के पास गये। वहां बैठी इन्द्र की पत्नी इंद्राणी सब सुन रही थी। उन्होंने रेशम का धागा मन्त्रों की शक्ति से पवित्र करके अपने पति के हाथ पर बाँध दिया। संयोग से वह श्रावण पूर्णिमा का दिन था। लोगों का विश्वास है कि इन्द्र इस लड़ाई में इसी धागे की मन्त्र शक्ति से ही विजयी हुए थे। उसी दिन से श्रावण पूर्णिमा के दिन यह धागा बाँधने की प्रथा चली आ रही है। यह धागा धन, शक्ति, हर्ष और विजय देने में पूरी तरह समर्थ माना जाता है। अमरनाथ की अतिविख्यात धार्मिक यात्रा गुरू पूर्णिमा से प्रारम्भ होकर रक्षा बन्धन के दिन सम्पूर्ण होती है। कहते हैं इसी दिन यहाँ का हिमानी शिवलिंग भी अपने पूर्ण आकार को प्राप्त होता है। इस उपलक्ष्य में इस दिन अमरनाथ गुफा में प्रत्येक वर्ष मेले का आयोजन भी होता है। ऐसी भी मान्यता है कि जब राजा बलि अपना सौंवा अश्वमेघ यज्ञ कर रहे थे और भगवान विष्णु उनके समक्ष वामन का रूप बनाकर ब्राह्मण वेश धारण करके याचक बनकर उसका सारा गर्व व अभिमान खत्म कर देते है। भगवान राजा बलि से अति प्रसन्न हुए और उनसे वरदान मांगने को कहा। राजा बलि ने कहा भगवान आप हम पर प्रसन्न है तो पातालपुरी में आप मेरे महल के द्वारपाल बनकर हमेशा रहेंगे। भगवान ने तथास्तु कहा। इधर बैकुण्ठ में बहुत दिनों तक लक्ष्मी जी व्याकुल होने लगी तभी नारद जी वहाँ पहुँचे और माँ को सारा वृतान्त बताया। फिर माँ ने पूछा भगवान वापस कैसे आयें। राजा बलि बहुत दानी थे उनके द्वार से कोई खाली नहीं लौटता था, उनके गुरू शुक्राचार्य ने उन्हें विष्णु भगवान से सावधान किया था। फिर भी जब राजा बलि वामन भगवान से दान मांगने को कहा तब भगवान ने कहा, मैं ब्राह्मण हूँ, धन, राज्य और हाथी-घोड़े और सम्पदायें मुझे नहीं चाहिए। मुझे तो बस अपने लिए तीन पग भूमि की आवश्यकता है। राजा बलि ने सोचा ये खुद इतने छोटे है और मांगा भी तो सिर्फ तीन पग भूमि उन्होंने फिर से आग्रह किया कुछ और भी मांगने को लेकिन भगवान ने कहा बस इतना ही मुझे चाहिए। तब राजा बलि ने कहा अपने पग से तीन पग भूमि ले लें। जब भगवान ने अपने चरण उठाये तो एक पग में आकाश लोक दूसरे पग में पृथ्वी लोक को नाप लिया। राजा बलि को ज्ञात हुआ कि स्वयं नारायण ही है जो कि सर्व सामथ्र्यवान है। भगवान ने पूछा कि तीसरा पग कहा पर रखू तो बलि ने उत्तर दिया कि तीसरा पैर आप मेरे मस्तक पर रख दें। भागवान ने तीसरा पैर बलि के मस्तक पर रख दिया।
 पौराणिक मान्यता है कि माँ लक्ष्मी से नारद जी ने कहा, सावन की पूर्णिमा के दिन रक्षा बन्धन का त्योहार आता है। उस दिन बहन भाई को रक्षा सूत्र में बांधती है और भाई बहन को उपहार देता है, उस समय आप भगवान को माँग सकती है। माँ लक्ष्मी ने वैसा ही किया। सावन की पूर्णिमा के दिन पातालपुरी पहुँची और बलि की कलाई पर रक्षा सूत्र बांधा और बलि ने उनसे कुछ मांगने को कहा तब माँ ने कहा ये आपका जो द्वारपाल है मुझे दे दें। तब बलि समझ गये ये लक्ष्मी जी ही हो सकती हे। तब बलि ने माँ से कहा आप इन्हें ले जा सकती है पर आप एक वचन दें कि आप आज के दिन हर साल यहाँ आयेंगी। ऐसी मान्यता है कि तब से रक्षा बन्धन का त्योहार मनाया जाता हैं।     
 ऐतिहासिक रूप से रक्षा बंधन का महत्व राजपूत जब लड़ाई पर जाते थे तब महिलायें उनको माथे पर कुमकुम तिलक लगाने के साथ साथ हाथ में रेशमी धागा भी बाँधती थी। इस विश्वास के साथ कि यह धागा उन्हे विजयश्री के साथ वापस ले आयेगा। आज के आधुनिक तकनीकी युग एवं सूचना सम्प्रेषण युग का प्रभाव राखी जैसे त्योहार पर भी पड़ा है। बहुत सारे भारतीय आजकल विदेश में रहते हैं एवं उनके परिवार वाले (भाई एवं बहन) अभी भी भारत या अन्य देशों में हैं। इण्टरनेट के आने के बाद कई सारी ई-काॅमर्स साइट खुल गयी हैं जो आॅनलाइन आर्डर लेकर राखी दिये गये पते पर पहुँचाती है।


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