सपनों पर टैक्स जरूरी है

आज के समय में हम मौज की जिन्दगी जी रहे हैं। कोई समस्या नही है, मगर जबरदस्ती लोगों ने प्रोपोगन्डा कर रखा है कि बड़ी समस्या है। आखिर जो आदत सी पड़ गई है बेवजह शगूफा छोड़ने की। अगर देखा जाये तो पुराने समय से लेकर आजादी के बाद से आम जनता कितनी सुकून से रह रही है। यह तो हम लोग अपने आपको हल्के में लेते थे। मगर एक दशक से हम महसूस कर रहे है कि हमारी भी औकात किसी से कम नहीं हैं। आखिर हम किस मायने में बड़े वालों से कमजोर हैं। जिस भाव से उद्योगपति, नेता और अधिकारी आलू, घुइयाँ, सोना, कपड़ा, गाड़ी और नशे के सामान खरीदते है उसी कीमत में जनता भी खरीद रही है। गाड़ी के टैक्स, वैट वगैरह बराबर-बराबर दे रहे हैं। बच्चों को भी अच्छे स्कूलों में पढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं। भले ही अपना पेट काटें या एक टाइम खायें। बस हमारे में व बड़े वालों में एक ही दूरी है, उन्हें बिना मिलावट का समान मिल जाता है, और हमें भुगतान के बाद भी सोर्स न होने के कारण मिलावटी आइटम मिलता है। मगर हमें इसका कतई मलाल नहीं है। आखिरकर बड़े-छोटे में अन्तर भी तो जरूरी है। ऐसा न होता तो फिर राजा और प्रजा 'शब्द' क्यों बनते। वैसे भी बिना मिलावट के सामान के हम आदी नहीं है। इसलिए जो है सो हमारे मुतालिक वाजिब हैं। 
 हमारा देश नियम व कानूनों को ठीक से बनाया गया है, बस ठीक से पूर्णतया पालन नहीं हो पा रहे है। इसमें सत्ता, सरकार, नेता और उच्चाध्किारियों की गलती नही है। सारी गलती आम जनता की ही है, आखिर क्यों सपने देखती है। सपने देखने का राइट सिर्फ बड़े लोगों को ही है। अभी सरकार का ध्यान इस तरफ नहीं गया है नहीं तो सपनों पर टैक्स जरूरी है। क्योंकि आखिर गरीब की खाई मेंन्टेन रहनी चाहिए। आम जनता को क्या राइट है कि वह व उसके परिवार का कोई भी सत्ता में जाने व नेतागिरी करने की सोंचे। 'दायरे में रहो' आखिर मँहगाई के तोहफों ने वैसे भी बराबरी पर लाकर सबको बड़ा कर दिया है। इतने नियम लागू हो गये है, व संभावित प्रस्तावित है, कि आम जनता  उन्हीं में फँसी रहेगी। शिक्षा और चिकित्सा पर अपनी कमाई का आधे से ज्यादा पैसा खर्च हो रहा है। शेष में जरूरतें भी जुम्बिश हालात में इकनोमिक्स के हिसाब से कशमकश पूरी हो रही है। तो फिर और क्या चाहते हो, घर लेना, हवाई यात्रा करना, बड़ी गाड़ी लेना, बड़े होटल में जाना, विदेश यात्रा करना, अच्छी-अच्छी चीजे लेना व खरीदना इस तरह के ख्वाब देखना बन्द करिए जनाब। शान से सीधे तरीके से रहिये क्योंकि दिन तो अच्छे है ही, बची-खुची रातों को सवारिये न जाने कब कोई कानून आ जाये कि सोने पर भी टैक्स देना होगा। शुरू हो जाओ हवा-हवाई इसलिए बापू से पूछिए कि जय माँ मँहगाई।        


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