विश्वकर्मा का सम्बन्ध किसी जाति विशेष न होकर शिल्प के सम्पूर्ण परिवेश से है

अनेकों वर्षो से मेरे मन में एक प्रश्न कौंध रहा है कि विश्वकर्मा कौन, शाब्दिक अर्थो में विश्व के सभी कर्मो को व कार्यो को करने वाला विश्वकर्मा होता है। या यह भी कह सकते है कि जितने भी कलाकृतियों, निमाणों, खोजो, अविष्कारों, उद्योगों आदि सभी विभिन्न रूपों में जुड़े वर्ग के व्यक्ति विश्वकर्मा है। इसलिए हम कह सकते है कि विश्वकर्मा का सम्बन्ध किसी जाति विशेष न होकर शिल्प के सम्पूर्ण परिवेश से है। वैदिक युग से आज तक विश्वकर्मा की महत्ता समाज के समग्र क्षेत्रों में इतनी बढ़ी, कि मानव की समस्त आवश्यकताओं व व्यवस्थाओं में अनिवार्यता स्थापित हो गयी है। वेदों में भी विश्वकर्मा शब्द का वर्णन सर्वत्र मिलता है। इस दृष्टि से भी विश्वकर्मा शब्द अत्यन्त ही प्राचीन है। विश्वकर्मा व्यापक स्वरूप है।
 ये पाश्च शिव पांचालः मनु, मय, त्वष्टा, शिल्पी, दैवज्ञ है, जो क्रमशः लौहकार, काष्ठकार, ताम्रकार, पाषाणकार तथा स्वर्णकार कहे गये है। भगवान के पंचमुखों को पांचाल कहा गया, इन पांच मुखों को क्रमशः पृथ्वी, जल, तेज, वायु और आकाश माना गया। जो मनुष्य की रचना के आवश्यक तत्व हैं। विश्वकर्मा के पांच मुखों को पंचब्रह्म कहा गया है। जिनमें ओउम् बना। इसलिए सम्पूर्ण सृष्टि रचना करने वाले भगवान विश्वकर्मा शिल्पों के आचार्य व प्रजापति कहलाते हैं ओउम् शब्द परमपिता का सबसे प्रिय नाम है इसी में सारी सृष्टि समाई हुई है। प्रारम्भ और निर्वाण ओउम् है। इसलिए सतत् ज्ञान के प्रवाहन के लिए विश्व निर्माता भगवान विश्वकर्मा ने ओउम् शब्द की उत्पत्ति की। साथ ही पंचमुखी विश्वकर्मा के पाँच मुखों से पाँच वेद आदि का निर्माण हुआ। जिसमें सम्पूर्ण विश्वजन व जीव का कल्याण हुआ। ऋग्वेद में भगवान विश्वकर्मा के महाम्त्य का बयान विस्तार से है। जिनमें उन्हें एक भाग स्वामी कहे गये। विश्वकर्मा सर्वकालिक व सार्वभौगिक हैं। जो अतीत में थे, वर्तमान में हैं, और भविष्य में रहेंगे। यजुर्वेद अध्याय 1/4 में उल्लेख है कि 'सा विश्वायुः सा विश्वकर्मा सा विश्वधाया' अर्थाथ विश्वकर्मा  पूर्ण आयु देने वाली वाणी का व सारे विश्वी समस्त विद्या व गुणों का धारक है।
 भगवान विश्वकर्मा को ब्राहमणों का उत्पादक पिता कहा गया है- 'स्वष्टेद विश्वं भुवनं जजान'। विश्वकर्मा में निर्गुण व सगुण दोनों रूप हैं। सारे गुण समाहित हैं। जो स्वर्ग से ऊपर पृथ्वी से परे, देवता व असुरों द्वारा दुर्विज्ञेय है, जिसके शरीर में देवता सभी लोकों को पाते हैं। और जिसे समझ पाना सम्भव नहीं है, वह विश्वकर्मा सभी तरह से स्तुति किए जाने योग्य है। 


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