बेरहाम ठग


18वीं सदी खत्म होने को थी, मुगल साम्राज्य खत्म हो चला था, ईस्ट इंडिया कंपनी ने देश में अपनी जड़े जमा ली थीं। ब्रिटिश-पुलिस देश में कानून व्यवस्था दुरूस्त करने में जुटी थी। लेकिन दिल्ली से जबलपुर के रास्ते में पड़ने वाले थानों मे कोई सा दिन ऐसा गुजरता था जब कोई पीड़ित आदमी अपने किसी करीबी की गुमशुदगी की रिपोर्ट दर्ज ना कराने आता हो। अंग्रेज अफसर परेशान थे कि इतनी बड़ी तादाद में लोग कैसे गायब हो रहे थे। कराची, लाहौर, मंदसौर, मारवाड़, काठियावाड़, मुर्शिदाबाद के व्यापारी बड़ी तादाद में रहस्यमय परिस्थितियो में अपने पूरे की पूरे काफिलों के साथ गायब थे। तिजारत करने जाते इन व्यापारियों के मुनीम और कारिंदे भी रास्ते से गायब हो जाते। लखनऊ की खूबसूरत तवायफ हों, डोली में बैठकर ससुराल जाती नई नवेली दुल्हनें या फिर बंगाल से इलाहाबाद और बनारस की तीर्थयात्रा पर आने वाले दल, सभी रास्ते से गायब हो रहे थे। छुट्टी से घर लौट रहे ईस्ट इंडिया कंपनी के सिपाहियों की टोली भी अपनी ड्यूटी पर नहीं लौट रही थीं। व्यापारी हो या फिर तीर्थयात्रा पर निकले श्रद्धालु या फिर चार धाम के यात्रा करने जा रहे परिवार, सभी निकलते तो अपने-अपने घरों से लेकिन ना जाने कहां गायब हो जाते, ये एक रहस्य ही था। काफिले में चलने वाले लोगों को जमीन खा जाती है या आसमां निगल जाता है, किसी को कुछ समझ नहीं आ रहा था। लेकिन सबसे हैरानी की बात ये थी कि पुलिस को इन लगातार गायब हो रहे लोगों की लाश तक नहीं मिलती थी। लाश मिलने के बाद पुलिस की तफ्तीश आगे बढ़ सकती थी। आखिर कैसे गायब हो रही थी लाशें। उनका भी कही कोई अता-पता नहीं था। पुलिस की फाइले लगातार गायब हो रहे लोगो की शिकायतों से बढ़ती जा रही थीं। लेकिन अंग्रेज अफसर चाहकर भी कुछ नहीं कर पा रहे थे। आलम ये हो गया कि ईस्ट इंडिया कंपनी को एक फरमान जारी करना पड़ा। फरमान के मुताबिक कंपनी-बहादुर का कोई भी सिपाही या सैनिक इक्का-दुक्का यात्रा नहीं करेगा। यात्रा करते वक्त सभी सैनिक बड़े झुंड में चले और अपनी साथ ज्यादा नकदी ना लेकर चले। इनसे निपटने के लिए अंग्रेजों को एक अलग डिपार्टमेंट बनाना पड़ा था। यही विभाग आगे चलकर इंटेलिजेंस ब्यूरो या आईबी के नाम से जाना गया।सन् 1809 मे इंग्लैंड से भारत आने वाले अंग्रेज अफसर कैप्टन विलियम स्लीमैन को ईस्ट इंडिया कंपनी ने लगातार गायब हो रहे लोगों के रहस्य का पता लगाने की जिम्मेदारी सौपी। थोड़े ही दिनों मे कैप्टन स्लीमैन को पता चल गया कि इन लोगों के गायब होने के पीछे थे ठगों के अनेक गिरोह। 17वीं और 18वीं में अंग्रेजी हुकूमत के दौरान बुंदेलखंड से विदर्भ और उत्तर भारत के कुछ हिस्सों में इन ठगों का राज चलता था। जो ठगी को अपना व्यवसाय मानते थे। ठग गिरोह जो करता था लूटपाट के लिये हत्या। इस गिरोह में करीब 200 सदस्य थे। इस गिरोह का मुखिया था बेरहाम ठग नाम का एक क्रूर इंसान, जो हाईवे और जंगलों पर अपने साथियों के साथ घोड़ों पर घूमता रहता। उसके निशाने पर होते थे तिजारत करने जाने वाले व्यापारी, अमीर सेठ और वेश्याएं। हर वो शख्स जिसके पास धन-दौलत होती थी वो बन जाता था ठगों का शिकार। जिसका मुखिया बेहराम नाम का ठग था। लोगों के गायब होने के पीछे इन ठगों का ही हाथ था। दो शताब्दी तक रहा खूनी ठगों का साम्राज्य....दो शताब्दी तक रहा खूनी ठगों का साम्राज्यठगी का यह पेशा कोई नया नहीं है। मध्यकालीन भारत में तो यह धंधा एक प्रथा के रूप में प्रचलित था, जिसमें ठग लोग भोले-भाले यात्रियों को जहर आदि के प्रभाव से मूर्छित करके अथवा उनकी हत्या करके उनका धन छीन लेते थे। ठगी प्रथा का समय मुख्य रूप से 17 वीं शताब्दी के शुरू से 19वीं शताब्दी अंत। तक माना जाता है। मध्य भारत में प्रकोप की तरह फैले, रुमाल में सिक्कों की गांठ लगा कर रुपये-पैसे और धन के लिए यात्रियों के सिर पर चोट करके लूटने वाले ठग और पिंडारियों का आतंक 19वीं सदी के प्रारंभ तक इतना बढ़ गया कि ब्रिटिश सरकार को इसके लिए विशेष व्यवस्था करनी पड़ी। ठगी प्रथा के कारण मुगल काल में नागपुर से उत्तर प्रदेश के शहर मिर्जापुर तक बनी सडक पर यात्रियों का चलना मुश्किल हो गया था। इस ऑफिस का मुख्यालय स्लीमैन ने जबलपुर में बनाया। स्लीमैन जानते थे कि जबलपुर और ग्वालियर के आस-पास ही ठग गिरोह सक्रिय है। ये दोनों ऐसी जगह थी जहां से देश के किसी भी कोने में जाने के लिये गुजरना पड़ता था। साथ ही साथ इस इलाके की सड़कें घने जंगल से होकर गुजरती थी। इसका फायदा ठग बडे आराम से उठाते थे। एक तो इन सुनसान जंगलों में किसी को भी निशाना बनाना आसान होता था साथ ही साथ अपने शिकार का काम तमाम करने के बाद यहां छिपना भी आसान था। विलियम स्लीमैन ने जबलपुर में अपना मुख्यालय बनाने के बाद सबसे पहले दिल्ली से लेकर ग्वालियर और जबलपुर तक के हाईवे के किनारे जंगल का सफाया कर दिया। इसके बाद स्लीमैन ने गुप्तचरों का एक बडा जाल बिछाया। कहते हैं कि भारत में इंटेलिजेंस ब्यूरो (आईबी) की नींव तभी की रखी हुई है। गुप्तचरों की मदद से स्लीमैन ने पहले तो ठगों की भाषा को समझने की कोशिश की। ठग अपनी इस विशेष भाषा को 'रामोसी' कहते थे। रामोसी एक सांकेतिक भाषा थी जिसे ठग अपने शिकार को खत्म करते वक्त इस्तेमाल करते थे।
1. पक्के ठग को कहते थे बोरा या औला
2. ठगों के गिरोह के सरगना को कहते थे जमादार
3. अशर्फी को कहते थे गान या खार
4. जिस जगह सारे ठग इकठ्ठा होते थे उसे कहते थे बाग या फूर
5. शिकार के आस-पास मंडराने वाले को कहते थे सोथा
6. जो ठग सोथा की मदद करता था उसे कहते थे दक्ष
7. पुलिस को वो बुलाते थे डानकी के नाम से
8. जो ठग शिकार को फांसी लगता था उसे फांसीगीर के नाम से जाना जाता था।
9. जिस जगह शिकार को दफनाया जाता था उसे तपोनी कहते थे।
 1935 मे उन्होने मशहूर ठग सैययद अमीर अली उर्फ फिरंगिया को गिरफतार किया था उसके गिरफ्तार होने के बाद खुला उत्तर भारत मे लगातार हो रहे हजारों लोगों के गायब होने का राज। एक ऐसा राज जो सिर्फ उस बेरहम गिरोह को मालूम था। गिरफ्तार होने के बाद बेहराम ठग ने बताया कि उसके गिरोह के कुछ सदस्य व्यापारियों का भेष बनाकर जंगलों में घूमते रहते थे। व्यापारियों के भेष में इन ठगों का पीछा बाकी गिरोह करता रहता था। रात के अंधेरे में जो भी व्यापारियों का काफिला जंगल से गुजरता था, नकली भेष धारण करने वाले ठग उनके काफिले में शामिल हो जाते थे। ठगों का ये गिरोह धर्मशाला और बाबड़ी (पुराने जमाने के कुएं) इत्यादि के आस-पास भी बेहद सक्रिय रहता था। ठग कोई मामूली लोग नहीं थे। भारत में अवध, बनारस से लेकर दक्कन तक ठगों का जाल फैला था। इन्हें पकडना इसलिए मुश्किल था क्योंकि यह खुफिया तरीके से काम करते थे। ये ठग योजनाएं बनाकर बड़ी चालाकी से अपना काम करते थे, ताकि किसी को शक ना हो। इन ठगों का गिरोह 20 से 50 तक का होता था। आमतौर पर यह तीन दलों में बंटे होते थे। इन तीनों दलों में तालमेल बनाने के लिए हर टोली में एक-दो लोग होते थे जो एक कड़ी का काम करते थे। ये लोग अपनी चाल धीमी या तेज करके इनके साथ आ सकते थे। ज्यादातर ठग कई भाषाएं बोलने, भजन-कीर्तन, नात-कव्वाली और गाना-बजाना में माहिर थे। ठगों की इन टोली में हिंदू-मुसलमान दोनों धर्मों के लोग थे। जरूरत के हिसाब ये जायरीन, बाराती, तीर्थयात्री या फिर नकली शवयात्रा निकालने वाले बन जाते थे। रास्ते में यह कई बार अपना रूप बदल लेते थे। धीरज से काम लेने वाले यह ठग भेष बदलने में बहुत माहिर थे। शिकार को बिना भनक लगे बड़ी चालाकी से दबोच लेते थे। ये ठग कभी मौलवी, सेठ या तीर्थयात्रियों का नेतृत्व कर रहे पंडित की तरह बन जाते थे। ये लोग शिकार की ताक में अक्सर सरायों के आस-पास मंडराते थे। माल-असबाब और हैसियत का अंदाजा लगाकर ही यह शिकार को अपने जाल में फंसाते थे। उसके निशाने पर होते थे तिजारत करने जाने वाले व्यापारी, अमीर सेठ और वेश्याएं। हर वो शख्स जिसके पास धन-दौलत होती थी वो बन जाता था ठगों का शिकार। शिकार की पहचान करने के बाद रास्ते भर धीरे-धीरे ठग एकत्र होने लगते लेकिन वह ऐसा दिखाते थे जैसे एक दूसरे को पहचानते तक नहीं हैं। अपने ही जत्थे में शामिल होने से रोकने का नाटक करते थे, जिससे लोगों को शक तक ना हो। बहुत धैर्य से काम लेते थे, हड़बड़ी की गुंजाइश तनिक भी नहीं थी। कभी-कभी सही मौके की तलाश में हफ्ते-दस दिन तक इंतजार करना पड़ता था।।.उस जमाने के ये ठग चार चरणों में ठगी को अंजाम देते थे। पहले चरण में ठगों की एक टोली जंगलों में छिपकर यात्रियों के समूहों का जायजा लेने की कोशिश करती थी कि किन यात्रियों के पास माल है। यह सुनिश्चित होने के बाद ये जानवारों की आवाज में (जिसे ये अपना कोड-वर्ड या ठगी जुबान कहते थे) अपनी दूसरी टोली को इसकी सूचना देते थे। दूसरे टोली यात्रियों के साथ उनके सहयात्रियों की तरह घुल-मिल जाते थे। साथ में भोजन पकाते थे, सोते थे और यात्रा करते थे। दूसरी टोली उन यात्रियों की एक अलग टोली बना लेती थी जिनके पास धन, सोने-चाँदी होते थे। फिर वे धोखे से उन्हें जहर खिलाकर या तो मार देते थे या बेहोश कर देते थे। लेकिन ये टोली उनसे धन लूटने का काम न करके अपनी तीसरी टोली को अपनी जुबान में बताकर अन्य यात्रियों के साथ लग जाती थी। तीसरी टोली आकर उन यात्रियों को पूरी तरह से लूट लेती थी। इस टोली के ठग साथ में खाकी या पीले रंग का रुमाल रखते थे, जिससे ये यात्रियों का गरौटा (गला) भी दबाते थे और सोने-चाँदी बाँध ले जाते थे। जाते-जाते ये अपनी चैथी टीम को सूचना दे जाते थे जो यात्रियों की लाशों को या तो कुएं में फेंक देती थी या पहले से तैयार कब्रों में दफन कर देती थी ठगों में भी चाहे जिसका जो धार्मिक विश्वास हो, भवानी के सिवा उनका कोई कारोबारी देवता नहीं. ठग भवानी को चार नामों से जानते हैं। देवी, काली, दुर्गा और भवानी और इस देवी का मंदिर विंध्याचल में मौजूद है, गंगा के किनारे मिर्जापुर से कुछ किलोमीटर दूर. इस मंदिर में हिंदुस्तान के कोने-कोने से ठग पहुंचते हैं और यहां अपनी लूट का एक हिस्सा चढ़ावे के बतौर चढ़ाते हैं, ठगों के अपने नियम कानून होते थे. ठग मानते थे कि उन्हें माता काली द्वारा धरती में लोगों का संहार  करने भेजा गया है. कोई भी मिशन शुरू होने या उसके फेल या पास होने दोनों पर गिरोह के सदस्य मां काली की पूजा करते थे और उन्हें बलि चढ़ाते थे. उनका मानना था कि मां काली ने उन्हें खून न गिराने की जगह रुमाल से हत्या करने को भेजा है जो वो यात्रियों की हत्या के बाद लूटते हैं। ज्यादातर ये यात्राएं ठग बरसात के मौसम के बाद करते हैं और जब वो अपने घरों से मंदिर की यात्रा कर रहे होते हैं तो इस बीच वो किसी की हत्या या लूटपाट नहीं करते, चाहे जितना हालात उनके हक में क्यों न हों देवी की पूजा का काम खत्म हो जाता है तो इसके बाद अगले अभियान पर निकलने से पहले एक खास दिन गैंग के सभी सदस्य अपने नेता यानी जमादार के नेतृत्व में अपने गांव में इकट्ठे होते हैं. यहां वो अपनी कुदाली यानी कब्र खोदने के हथियार की पूजा करते हैं. उनका मानना है कि अगर वो अपनी इस कुदाली से किसी शिकार के लिए कब्र खोदेंगे तो कोई भी आत्मा उनके काम में अड़ंगा नही लगा सकती. इसलिए इस हथियार को वो बहुत ही पवित्र मानते हैं और उसकी अवज्ञा किसी बड़े से बड़े अपराध से कम नहीं मानी जाती. इसी कुदाली से एक बकरी की बलि दी जाती है और फिर उसे नारियल के साथ भवानी पर चढ़ाया जाता है। इसके बाद वो सिंदूर और चंदन का एक घोल बनाते हैं और उसे दूसरी कई पवित्र चीजों के साथ उबालते हैं. कुदाली को उबालने के बाद उसे सूखने के लिए खास ढंग से रखा जाता है. इससे पहले कुदाली को रखे जाने की जगह गोबर से लिपाई की जाती है और फिर कुछ खास प्रार्थनाएं और मंत्र पढ़े जाते हैं, इसके बाद कुदाली को एक सफेद कपड़े में बांधकर रख दिया जाता है, इसके बाद पुजारी के आदेश पर पूरा गैंग उस दिशा में निकलता है जिधर उन्हें जाना है, कुछ दूर रुककर रास्ते में फिर मंत्र पढ़े जाते हैं और शगुन निकाले जाते हैं. अगर सारे शगुन पक्ष में हों तो ठग अपने अभियान पर आगे निकल पड़ते, ठगों की भाषा रामासी थी. जो गुप्त और सांकेतिक थी. इनके पास तपौनी का गुड़, रूमाल और कुदाली प्रमुख होता था. ठग अपने शिकार को बनिज कहते थे, जिनका रूमाल से गला घोंट दिया जाता था. ठग काली के उपासक थे,े महान ठग खुद को काली का भक्त बताते थे, फिर वे चाहे हिन्दू-ठग हों, सिख-ठग हों या फिर मुसलमान-ठग। मध्य भारत के ठगों द्वारा ठगी की घटना को अंजाम देना कुशल संचालन, बेहतर समय-प्रबंधन और उत्तम टीम-वर्क के बेहतरीन उदाहरण के तौर पर भी याद किया जाता है। उस जमाने के ये ठग चार चरणों में ठगी को अंजाम देते थे। पहले चरण में ठगों की एक टोली जंगलों में छिपकर यात्रियों के समूहों का जायजा लेने की कोशिश करती थी कि किन यात्रियों के पास माल है। यह सुनिश्चित होने के बाद ये जानवारों की आवाज में (जिसे ये अपना कोड-वर्ड या ठगी जुबान कहते थे) अपनी दूसरी टोली को इसकी सूचना देते थे। दूसरे टोली यात्रियों के साथ उनके सहयात्रियों की तरह घुल-मिल जाते थे। साथ में भोजन पकाते थे, सोते थे और यात्रा करते थे। दूसरी टोली उन यात्रियों की एक अलग टोली बना लेती थी जिनके पास धन, सोने-चाँदी होते थे। फिर वे धोखे से उन्हें जहर खिलाकर या तो मार देते थे या बेहोश कर देते थे। लेकिन ये टोली उनसे धन लूटने का काम न करके अपनी तीसरी टोली को अपनी जुबान में बताकर अन्य यात्रियों के साथ लग जाती थी। तीसरी टोली आकर उन यात्रियों को पूरी तरह से लूट लेती थी। इस टोली के ठग साथ में खाकी या पीले रंग का रुमाल रखते थे, जिससे ये यात्रियों का गरौटा (गला) भी दबाते थे और सोने-चाँदी बाँध ले जाते थे। जाते-जाते ये अपनी चैथी टीम को सूचना दे जाते थे जो यात्रियों की लाशों को या तो कुएँ में फेंक देती थी या पहले से तैयार कब्रों में दफन कर देती थी। कर्नल स्लीमन ने करीब 1400 ठगों को फांसी दी थी।