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भक्तों का घमंड

एक बार एक जिज्ञासु श्री विवेकानन्द जी के पास गया और प्रश्न किया, कृपया भगवान के बारे में बताइये विवेकानन्द जी ने कहा तुम फुटबाल खेला करो इस कमजोर शरीर से भगवान श्री कृष्ण के ओजस रुप को नही समझ सकते उत्तर सुनकर वह लौट गया, इसी तरह अपात्र लोग संसार के जंगल में भटकते रहते हैं यह ज्यों का त्यो सत्य है कि कोई सफलता संभव नही है लेकिन सावधानी से ध्यातव्य यह है विवेकानन्द जी का संकेत सार्थक शुद्ध परिश्रम से है। जिसमें पसीने की कमाई खाकर व्यायाम करें छल धोखा अन्याय से अर्जित धन द्वारा पोषित शरीर को लेकर कोई तेज नही जगा सकता इसके लिये सतत् तपस्या भरी संयम पूर्ण सनातन पद्धति की जीवन शैली अपना कर सदाचार के मार्ग में आरुढ हो उस आभा को जगाया जा सक है। जिसमे चलकर सांसारिक सफलता को छुद्र मानकर दाये-वाये छोड़ता हुआ अभीष्ट लक्ष्य की ओर निष्कंटक पथ में बढ़ जाता है। आज के पतित चरित्र के युग मे छुद्र मनुष्य जरा सी ताकत वह तन, धन पद किसी भी प्रकार की पा कर छलकने लगता है यद्यपि इस श्रेणी के लोग केवल पागल या अन्धे कहे जायेगें। जिन्हे सच्चाई के बारे मे कुछ भी पता नही है इस धरती को हिला देने वाले भी पराक्रमी शौर्यवान हुऐ है लेकिन उनका भी दर्प (अहंकार) खा लिया गया है ऐसे में आज के मानवीय मच्छरों की क्या विशात। इस अहंकार को सीधे निगल लेने वाला भगवान का स्वरुप श्री बल के अवतार प्रभु श्री बजरंग बली के रुप में है। जिनको समझना संसारी दलदल मे डूबते उतराते लोगों के लिये स्वप्न ही है संसार की पूरी ताकत बटोर कर भी शक्ति-समृद्धि का आखरी प्रदर्शन अस्पतालों मे पैसा बरसाने तक की सीमा पर जाकर रुक जाता है फिर दैवी व्यवस्था देखते-देखते कुत्ते की तरह खीच कर ले जाती है। प्रभुता धरी रह जाती है। भगवान स्वयं अपने भक्तों का भी घमंड बर्दाश्त नही करते क्यो कि उनकी कुशल-क्षेम के लिये कृत संकल्प है जब कि घमंड़ की दशा मे कुशल क्षेम का स्थान नही है। बल्कि भक्त-अभक्त के घमंड़ दूर करने का अलग-अलग फर्क है। जहाँ भक्त कोई कभी लहर की चपेट मे आ गया उसे सहज रास्ते से रोक लेते है। जब कि अभागे लोगों का घमंड़ चूर-चूर कर देते है। एक बार भगवान श्री कृष्ण के औतार के समय परम निकटस्थ भगवान के तीन अभिन्न अंग अहम की चपेट मे आ गये प्रभू समझ गये और निश्चय किया कि जल्दी इस महारोग को निकाल फेकना है। गरुण जी को घमंड़ हो गया कि मुझसे वेगवान कोई नही है रुकमणी को घमंड़ हो गया कि मुझसे सुन्दर कोई नहीं है तथा भगवान के चक्र को इस बात का घमंड़ हो गया की मैं ही सब को काटता हूँ सारे काम भगवान के मैं ही करने वाला हूँ, यहाँ सबसे बडी ध्यातव्य बात धरती व स्वर्गादि लोको के लिये भी है गली कूचो मे कहानियो के आधार पर बकवास करने वालो की क्या विसात सबसे बड़ी समझ लेने वाली मरम की बात यह है कि बजरंगबली भगवान श्री राम बल के औतार है क्यो कि बल से ही किसी का घमंड़ दूर किया जाता है इस कार्य के लिये हनुमान जी ही इस कार्य के लिये अखिल बम्ह्याड़ के दर्प को चूर करते है इस तथ्य पर कोई जरा सी भी उगली नही उठा सकता।      
भगवान श्री कृष्ण जी ने सोचा की इन तीनो भक्तो का घमंड़ कैसे एक साथ दूर करु इसी समय प्रभू को युक्ती सूझी कि बजरंग बली का यही काम है अतः इनही के द्वारा सबका घमंड़ एक साथ दूर करवा दूँ। श्री हनुमान जी को बुलाकर कहा कि गरुण को बुला लाओ चक्र से कहा कि कोई अन्दर न आने पाये तुम दरवाजे मे तैनात हो जाओ और रुकमणि जी से कहा कि श्री सीता जी का रुप लो हनुमान जी मिलने आ रहे है। गरुण जी के पास पहुँचकर श्री बजरंगबली ने प्रभु का आदेश बताया तो गरुण जी ने कहा तुम चलो मैं तुरन्त पहुँच जाँऊगा श्री हनुमान जी ने कहा मेरा काम हो गया तुम जाओ मैं यही हूँ। गरुण चले गये उधर रुकमणि जी सीता बनने के प्रयास में सब उपक्रम कर डाले साज-श्रंगार भी आजमाया लेकिन संभव नही हुआ पसीना आ गया घमंड़ नष्ट हो गया। तब भगवान ने श्री राधा जी का आवाह्न कर सीता जी बनने का आदेश दिया और उधर गरुण जी से भी पीछे चल बजरंगबली जी पहले आ गये। दरवाजे मे चक्र घूम रहा था कि श्री हनुमान जी ने बाये हाथ से चक्र को ढ़केल दिया और अंदर प्रवेश कर गये बाद मे गरुण जब अन्दर गये तो देखा भगवान की सेवा मे श्री हनुमान जी बैठे है वे विष्फारित नेत्रों से देखते रह गये कि मैं इन्हें तो मैं वही छोड़कर आया था बड़ा वेगमान बना था लेकिन ये तो मुझसे पीछे चल कर आगे आ गये है। फलतः गरुण जी का भी घमंड़ दूर हो गया। उपरोक्त प्रसंग से भगवान श्री बजरंगबली के वास्तविक स्वरुप का ज्ञान हुआ वहा मनुष्य जाति के दुशमन अहंकार का भी अंत हो गया जो श्रृष्टि काल से ही मनुष्य के विनाश का कारण रहा है। इससे यह सिद्ध होता है कि प्रभु अवतरित हो कर अपनी विविध लीलाओ द्वारा तमाम कष्ट सहते हुऐ निस्वार्थ भाव से लोगो के उध्धार की भावना भी हमे होश मे नही ला पाती कि प्रभु की तमाम पन्थ प्रकाशित करने वाली व्यवस्थाओ को लाघ कर अभागे अन्धकार भरे व अन्त हीन विप्ति भरे मार्ग की ओर अग्रसर रहते है।


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