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हम फिर दुनिया को शिक्षा देंगे

संसार में बड़ी-बड़ी जातियां हो चुकी हैं, जिन्होंने दूसरों को जीत लिया था। हम भी बड़े विजेता हो चुके हैं, हमारी विजय की कथा को भारतवर्ष के उन महान सम्राट अशोक ने धर्म तथा आध्यात्मिकता की विजय बताया है। अब फिर भारतवर्ष को सम्पूर्ण संसार पर विजय प्राप्त करनी होगी। मेरे जीवन का स्वप्न यही है, और मै। यही चाहता हूं कि आप में से प्रत्येक मनुष्य, जो मेरी बातें सुन रहा है, अपने मन में किसी स्वप्न का पोषण करे तथा इसे कार्य रूप में परिणत किये बिना न छोड़े। लोग प्रतिदिन तुमसे यह कहेंगे कि पहले अपने घर को संभालो, बाद में विदेशों में प्रचार करना। परन्तु मैं आप लोगों से यह स्पष्ट कह देना चाहता हूं कि आप सबसे अच्छा काम तभी कर सकते हैं, जब उसे दूसरों के लिए कर रहे हों। अपने लिए सबसे अच्छा कार्य आपने तभी किया, जबकि आपने औरों के लिए कार्य किया, अपने विचारों का समुद्रों के उस पार विदेशी भाषाओं में प्रचार करने का प्रयत्न किया तथा यह सब इस बात का प्रमाण है कि आप अन्य देशों को अपने विचारों को भारतवर्ष में ही सीमित रखता, तो उसे फल का एक चैथाई भी नहीं हो पाता, जो कि मेरे इंग्लैण्ड तथा अमरीका जाने से इस देश में हुआ। हमारे सामने यही एक महान आदर्श है और प्रत्येक व्यक्ति को इसके लिए प्रस्तुत रहना चाहिए। यह आदर्श भारतवर्ष की संसार पर विजय है इससे छोटे किसी भी आदर्श से काम नहीं चलेगा। और हम सभी को इसके लिए प्रस्तुत होना चाहिए तथा भरपूर प्रयत्न करना चाहिए। यदि विदेशी आकर अपनी सेनाओं से इस देश को छा दें तो कुछ चिन्ता नहीं। उठो भारत! तुम्हारी आध्यात्मिकता संसार पर विजय प्राप्त कर लें। जैसा कि इसी देश में सर्वप्रथम प्रचार किया गया है, ''प्रेम ही घृणा पर विजय प्राप्त कर, विजय प्राप्त कर सकेगा, घृणा- घृणा को नहीं जीत सकती।'' हमें भी वैसा ही करना पड़ेगा। जड़वाद तथा उसकी लाई हुई दुर्गतियां जड़वाद से दूर नहीं होती। जब एक सेना दूसरी सेना पर विजय प्राप्त करती है तो यह मनुष्य जाति को पशु बना देती है और इस तरह से वह पशुओं की संख्या बढ़ा देती है। पाश्चात्य पर धर्मभाव ही विजय प्राप्त कर सकेगा, पाश्चात्यवासी धीरे-धीरे यह अनुभव कर रहे हैं, कि उन्हें जाति के रूप में बने रहने हेतु धर्म भाव की आवश्यकता है। वे इसकी प्रतीक्षा कर रहे हैं। बड़े चाव से इसकी बाट जोह रहे हैं। उसकी पूर्ति कहां से होगी? ये मनुष्य कहां है जो भारत के महर्षियों का उपदेश संसार के सभी देशों में पहुंचाने के लिए प्रस्तुत हों? ये लोग कहां हैं, जो इसलिए सब कुछ त्यागने को तैयार हों कि ये कल्याणकारी उपदेश संसार के कोने-कोने में फैल जाये? सत्य के प्रचार के लिए ऐसे ही वीर हृदय लोगों की आवश्यकता हैं वेदान्त के परम सत्यों का प्रचार करने के लिए ऐसे वीर कर्मियों को बाहर जाना चाहिए। संसार इसके लिए तरह रहा है, इसके बिना संसार विनाश को प्राप्त होगा। सम्पूर्ण पाश्चात्य संसार जैसे इस एक ज्वालामुखी पर बसा हुआ है, जो कल ही फूटकर उसका विध्वंस कर सकता है, पाश्चात्य वालों ने सम्पूर्ण संसार छान डाला, परन्तु उन्हें कहीं भी शांति नहीं मिली। उन्होंने इन्द्रिय सुख के प्याले को पीकर खाली कर डाला, परन्तु फिर भी तृप्ति नहीं मिली। भारतवर्ष के धार्मिक विचारों को नस-नस में भर देने का यही समय है। अतः हे युवकों! मैं विशेषकर तुम्हीं को इसे याद रखने के लिए कहता हूं कि हमें बाहर जाना ही होगा। अपनी आध्यात्मिकता एवं दार्शनिक चिन्तन से हमें संसार को जीत लेना होगा। अन्य कोई उपाय ही नहीं है। हमें यह करना ही होगा, अन्यथा मृत्यु निश्चित है। हमारा जातीय जीवन जो एक समय सतेज था, उसे यदि हम फिर से जगाना चाहते हैं, तो भारतीय विद्याराशि द्वारा संसार पर विजय प्राप्त करनी होगी साथ ही हमें यह भी नहीं भूलना चाहिए, कि आध्यात्मिक विचारों की विजय से मेरा मतलब उन सिद्धान्तों के प्रचार से है, जिनसे जीवन का संचार हो, न कि उन सैकड़ों कुसंस्कारों से है, जिन्हें हम शताब्दियों से अपनी छाती लगाए चले आ रहे हैं। उन्हें तो इस भारतभूमि से उखाड़कर दूर फेंक देना चाहिए, ताकि वो सदैव के लिए नष्ट हो जाऐं। इस जाति के अन्तःपतन के ये ही कारण हैं और ये ही मस्तिष्क को दुर्बल बना देते हैं। हमें उस मस्तिष्क से बचना चाहिए जो उच्च तथा महान चिन्तन नहीं कर सकता जो निस्तेज होकर मौलिक चिन्तन की सम्पूर्ण शक्तियों को खो बैठता है तथा जो धर्म के नाम पर चलने वाले सब तरह के छोटे-मोटे कुसंस्कारों के विष से स्वयं को जर्जर कर डालता है। कौन कह सकता है कि यह शुभ मुहूर्त नहीं है? फिर से कालचक्र घूम रहा है। एक बार फिर भारतवर्ष से वही शक्ति प्रवाह निसृत हो रहा है, जो शीघ्र ही सम्पूर्ण संसार को प्रभावित कर देगा। एक वाणी मुखरित हुई है, जिसकी प्रतिध्वनि चारों ओर भर रही है और यह वाणी इससे पूर्व की सभी वाणियों की अपेक्षा अधिक शक्तिशाली है, क्योंकि यह अपने पूर्ववर्ती सभी वाणियों की समीष्ट रूप है, इसी को हम भारत का पुनर्जागरण काल मानते हैं, इसी से हम फिर दुनियां को शिक्षा देंगे।


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