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पूर्वजंम के ज्योतिषीय किस्से

ेबात उन 2008-2009 की है। जब मैं ज्योतिषीय आधार पर पूर्वजंम और पुर्नजंम की घटनाओं का अध्ययन कर रहा था पूर्वजंम बचपन से ही मेरे लिये कूतुहल और जिज्ञासा का केन्द्र रहा है। इस विषय पर मैंने वर्षों से काफी सामग्री जमा कर रही थी मैं अपने पूर्ववर्ती अध्येता वर्जीनिया युनिवसिटी के डा. ईयान इस्टीवेंसन, जयपुर विश्वविद्यालय के परामनोविज्ञान विभाग के डा. हेमेन्द्र बनर्जी, प्रो कीर्ति स्वरूप रावत, भारतीय विद्यापीठ के प्रो. के. एन. राव, कानपुर के उमाश्ंाकर दूबे, दिल्ली विश्वविद्यालय के डा. बलबीर सिंह तथा अंय विद्वानों के लेखों, पुस्तकों और अनुभवों से भलीभांति परिचित था एक ज्योतिषी होने के नाते मैं पुर्नजंम को ज्योतिषीय आधार पर परखना चाहता था इस खोज के संदर्भ में मेरे हाथ प्रो. के. एन. राव की ज्योतिष के आधार पर लिखी गई पुस्तक 'हिन्दू ज्योतिष में कर्म और पुनर्जन्म' हाथ लगी जो कई अर्थो में काफी महत्वपूर्ण थी। जनवरी 2009 में जब मैंने ज्योतिष गोष्ठियों की शुरूआत की तो मेरी इच्छा थी कि समाज के महत्वपूर्ण, जिम्मेदार और बुद्धिजीवी लोग गोष्ठी में सम्मलित हों। उसी समय मेरी मुलाकात डा. सुरेश चन्द्र शुक्ला से हुयी जो पाँच पीढी से वैद्य थे और रिटायर्ड सरकारी चिकित्सक थे आगे चल कर उन्हांेने ना केवल मुझे हर प्रकार का सहयोग किया बल्कि वे अपने अंतिम समय तक संस्थान की ज्योतिष पत्रिका मे नियमित रूप से आयुर्वेद पर शोधपरक लेख देते रहे। पुर्नजंम पर एक दिन चर्चा करते हुये उन्होने मुझे अपने ही परिवार में घटी एक रोचक घटना की जानकारी दी कि उनके बाबा स्व. मंगला प्रसाद शुक्ला भी अपने समय के जाने माने वैद्य थे जिन्हें सब दद्दू कहते थे वे अपने पोेते सुरेश तथा उनकी नयी नवेली बहू से अगाध प्रेम करते थे और अक्सर कहा करते थे कि मैं मरने के बाद तुम्हारे बेटे के रूप मे जंम लूँगा उनकी दांयी भुजा पर एक काला दाग था सन 1978 में एक दिन अचानक चल बसे उसके साल भर बाद वैद्य जी के घर एक पुत्र पैदा हुआ जिसका नाम भास्कर रखा गया तो बच्चे की दांयी भुजा पर काले रंग की धुंधली सी आकृति थे बुद्धिजीवी लोग गोष्ठी में सम्मलित हों।
पुर्नजंम का दूसरा केस मेरे पड़ोसी ने बताया पांडे टोला अलीगंज मे मेंरे घर के पीछे एक वृद्ध श्री उमाकांत भार्गव रहा करते थे जो मेरे ज्योतिष क्लाइन्ट थे 22 जुलाई 2007 की शाम 6.08 को लखनऊ में उनके उनकी पोती श्रेया भार्गव का जंम हुआ। पोती कहती थी कि मैं ही पिछले जन्म में अपनी परदादी दमयंती थी जिनकी मत्यु 16 अप्रैल 2004 को प्रातः 8 बजे लखनऊ में घर पर ही हो गई थी दादी के हाथ मे एक लहसुन का निशान था श्रेया के पैर मे हूबहू वैसा ही निशान था पोती और दादी को मैने अपनी आँखों से देखा था बल्कि दादी दमयंती से दर्जनों बार बात भी की थी दादी भी मेरी ज्योतिष क्लाईन्ट थी मेरे अनुरोध पर उमाकांत जी ने अपनी मां की कुण्डली दिखाई थी जो इस प्रकार थी श्रीमती दमंयती का जंम 4 अप्रैल 1926 को कर्क लग्न में हुआ था उनका राशिनाम डि अक्षर से निकला था तीसरा पुर्नजंम का केस मेरे ही परिवार में हुआ मेरे बड़े बहनोई डाॅ. राजेन्द्र सिंह राजपूत जो शाहजहांपुर मे आयुर्वेद के चिकित्सक थे का जंम 12 मार्च 1951 को शाम 4.45 पर सहारनपुर में हुआ था उनका असामयिक निधन 19 मार्च 1985 को शाम 3 बजे शाहजहांपुर मे हुआ था अपने जीवन काल मे वे अपने दिल्ली वाले चाचाजी हरि से बहुत प्रेम करते थे डा राजपूत की मृत्यु के करीब चार माह बाद हरि चाचाजी के यहाँ एक पुत्र हुआ जो मानसिक रूप से विकलांग था पर उसकी हरकतें व चेहरा व शारीरिक लक्षण हूुबहू डा राजपूत से मिलते पैदा हुआ जिसका नाम धु्रव रखा गया सबको विश्चास था कि डा राजपूत ने ही धु्रव के रूप मे जंम लिया था 


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