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रंगोत्सव है अवध की होली

होली खेले रधुवीरा अवध मे होली खेले रघुवीरा! होली फाल्गुन माह की पूर्णिमा को मनाया जाने वाला रंगोल्लास से भरा सतरंगी रंगों से सराबोर त्योहार है जो ऋतराज  बसंत की विदाई और ग्रीष्म ऋतु का हर्षोल्लास के साथ स्वागत का पर्व है। होली का पर्व सारे उत्तर भारत मे विशेष रूप से अवध और ब्रज क्षेत्र मनाया जाता है। पौराणिक कथाओं के अनुसार होली हरदोई के दैत्य राजा हिरण्यकश्यप के भगवान विष्णु भक्त पुत्र ध्रुव के अपनी बुआ होलिका के आग मे जलाने के षड़यंत्र से जीवित बचने की खुशी मे जनता द्वारा मनाया जाता है। पुराण कथाओं मंे भगवान कृष्ण और भगवान राम द्वारा भी होली खेलने का वर्णन मिलता है। वर्तमान मंे अवध में होली का जो रूप मिलता है वो वास्तव में अवध के नवाबों द्वारा स्थापित गंगा जमुनी संस्कृति से उपजा है। ईरानी मूल के शिया नवाबों ने हिन्दु मुस्लिम भाई-चारे, एकता और भेदभाव से रहित गंगा-जमुनी तहजीब को बढावा दिया सैकड़ों सालों से अवध में हिन्दू-मुस्लिम दोनों पूरे आपसी प्रेम, सद्भाव और बिना किसी जाति या धार्मिक भेदभाव के होली का पर्व सामुहिक रूप से मानते आये है लखनऊ के कई नवाब अपने परिजनों, हिन्दू दरबारियों व जनता के साथ बड़ी मस्ती व जोश के साथ होली खेलते थे। तत्कालीन चित्रकारों के कई चित्रों मे नवाबों तथा उनकी बेगमों द्वारा पीतल की रंगो से भरी बड़ी नादों में और पीतल की पिचकारियों से आपस मे रंग खेलने का चित्रण है। जाने आलम नवाब वाजिद अली शाह तो लखनऊ की पहचान बन गये। लखनऊ के अंतिम नवाब जाने आलम वाजिद अली शाह तो होली का त्योहार कई दिनों तक मनाते थे, वे होली मे भगवान कृष्ण बनते और बेगमों व कनीजों को गोपिकायें बना कर टेसू आदि के रंगों, पीतल की पिचकारियों, इत्र, खुशबुदार गुलाल अबीर से जी भर कर होली खेलते थे तत्पश्चात सबको दर्जनों लजीज पकवानों और गुझिया, नमकपारे, शकरपारे मीठे, नमकीन बेसन के सेव कई प्रकार पापड़ों, दालामोंठों, पूरी, कचैरी, दही बड़े, शर्बतों, ठंडाई, अनेक प्रकार की मिठाईयों व व्यजंनों से सजी शानदार दावतें दी जाती थीं। इन दावतों की शान होती थी मलाईदार दूध, मेवों, गुलाब व केसर से बनी अवध की मशहूर भांगवाली व सादी ठंडाई। होली में लखनऊ में मुहल्ले-मुहल्ले चाँचर व फाग गाई जाती थी है।
 होली जलने के अगले दिन चैक में बरात निकलती है और अबीर, गुलाल, कई तरह के सूखे व पानी वालो रंगो से होली खेली जाती थी। आज भी अवध में होली खेलने का वही रिवाज है मेहमान नवाजी के लिये मशहूर लखनऊ की जनता भी अपनी हैसियत के अनुसार लखनवी अदाओ अंदाज मे अपने दोस्तों, पड़ोसियों का दावत देती थी। शहर मे जगह जगह हास्य कवि सम्मेलन, मुशायरे और होली मिलन समारोह आयोजित किये जाते थे लखनऊ में होली अमूमन सुबह 9 से 12 बजे तक खेली जाती थी। यह सारी परम्परायें आज भी बदस्तूर कायम है। पहले तरह आज भी शहर में जगह जगह हास्य कवि सम्मेलन और होली मिलन समारोह आयोजित किये जाते है। आने वाली पीढ़ियों ने भी इस परम्परा का जिंदा रखा लखऊ के कवियों, लेखकों, शायरों, बुद्धिजीवियों,, साहित्यकारों जिनमें जोश मलिहाबादी, मो हाजी रूसवा, शरर, मजाज लखनवी मंुशी नवल किशोर, दुलारे लाल भागर्व, योगेश प्रवीण. अमृतलाल नागर. के पी सक्सेना, वचनेश त्रिपाठी, रमई काका, सूर्यकांत त्रिपाठी निराला, महावीर प्रसाद द्विवेदी, शिवमंगल सिह सुमन का   भी अवध की होली में अभिन्न योगदान रहा। इसीलिए कहा गया है कि, हम फिदाये लखनऊ लखनऊ फिदाये हम!


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