सैयद अमीर अली

वीरभूमि बुन्देलखण्ड के सागर जनपद के देवरी कस्बे में 22 अक्टूबर सन् 1873 को जन्मे कवि सैयद अमीर अली 'मीर' रसखान की परम्परा के वाहक कवि के रुप में अपनी अलग पहचान बनाने में कामयाब रहे। 2 वर्ष की आयु में सैयद अमीर अली के सिर से पिता का साया उठ जाने के बाद चाचा के संरक्षण में शिक्षा ग्रहण कर अंजुमन इस्लामिया हाईस्कूल में ड्राइंग-टीचर बन गये। बचपन से परेशनियों का सामना करने वाले अमीर अली को आंखों में परेशानी के कारण नौकरी छोड़कर चाचा की दुकान पर कार्य करने के लिऐ विवश होना पड़ा। एक दिन सुप्रसिद्ध साहित्यकार जगन्नाथ प्रसाद भानु द्वारा सागर में स्थापित भानु समाज से जुड़कर हिन्दी काव्य लिखने के लिए मन ही मन सोच रहे थे तभी एक दिन श्री वकटेश्वर समाचार मंे कवि समाज सागर की ओर से प्रकाशित समस्या पूर्ति ''लोभते अमी के अहि, चढ़यों जात चन्द पै को पूरा करने पर छन्द प्रभाकर ग्रन्थ पुरस्कार में मिलने की सूचना पढ़कर कवि सैयद अमीर अली 'मीर' ने समस्या पूर्ति कुछ एक मुस्लिम परिवार में जन्में कवि की इस पहली रचना मंे हिन्दुओ के आराध्य सीता राम के लिये जो भाव अपनी कविता में प्रकट किये वह वास्तव में आष्चर्य जनक ही नहीं अपित समस्या। भानु समाज द्वारा पुरुस्कृत किया गया। समस्या पूर्ति परक रचना से प्रोत्साहित होकर कवि सैय्यद अमीर अली मीर ने हिन्दी काव्य की साधना में ऐसे लगे कि तत्तकालीन समय में हिन्दी कवियों के रुप में अपनी अलग पहचान बनाने में कामयाब हुऐ। आपकी हिन्दी निष्ठा के सम्बन्ध मंे श्री जहूरबख्ष हिन्दी कोविद ने यह ही लिखा था- वे एक प्रकार से हिन्दी संसार में मुस्लिम जगत के प्रतिनिधि कवि थे। जब मुस्लिम समाज में हिन्दी के प्रति विद्रोह की भावनाएं जोर पकड़ रही थी तब वे उसकी सेवा करने के लिए अग्रसर हुए थे और उन्होंने यथाशक्ति उस विद्रोह का मुकाबला किया था। ''मुस्लिम परिवार मंे जन्म लेकर अपनी रचनाओं में आपने हिन्दू पर्वो, त्योहारों और रीति रिवाजों का चित्रण करते समय इस बात का विषेश ध्यान रखा कि हिन्दू समाज अपनी संस्कृति और सनातन धर्म के प्रतिको तथा देवताओं के प्रति जो श्रद्धा का भाव अपने मन में रखते है उसे उसी पवित्रता और दिव्यता के साथ अपने काव्य में अत्यन्त सफलतापूर्वक प्रस्तुत किया। आपके द्वारा रचित ऐसी रचनाओं में सूर्य सन्ध्या उलाहनापंचक अन्योक्ति सप्तक दषहरा तथा कृष्णाष्टमी आदि लोकप्रिय रही है। कवि मीर धार्मिक कट्टरता के प्रबल विरोधी थे। आपकी काव्य रचनाओं में पारस्परिक प्रेम, भाईचारा और देश भक्ति का स्वर प्रमुख रुप से दिखाई देता है। जिसके कारण आपकी गणना रसखान और आलम की परम्परा का कवि के रुप में की जाती है। कवि सैयद अमीर अली ने भानु कवि समाज के सम्पर्क में आकर आपने अपनी काव्य प्रतिभा को छंद शास्त्र का व्यापक अध्ययन करके परिमार्जित किया। जिसके कारण आपका कवित्व के निखार ने आपको काव्य शास्त्र का विद्वान बना दिया। आपने अपने गृह निवास  स्थान देवरी में मरी मण्डल की स्थापना करके काव्य शास्त्र के साथ-साथ हिन्दी भाषा के उत्थान हेतु अनेक कवियों और लेखकों को प्रोत्साहित किया। भानु जी से छन्दप्रभाकर को पुरस्कार मंे प्राप्त करके आपने छन्द-शास्त्र का जो गहन ज्ञान प्राप्त किया था उसे दूर-दूर तक फैलाने हेतु युवकों को तैयार करके उनके द्वारा तत्तकालीन समाज में हिन्दी के प्रचार-प्रसार की दिशा में जो ठोस पहल की उसके कारण धीरे-धीरे आपकी ख्याति दूर-दूर तक फैल गई। आपने मातृभाषा की महत्ता शीर्षक एक निबन्ध लिखा जिस पर आचार्य महाबीरप्रसाद द्विवेदी ने सौ रूपए का पुरस्कार भी प्रदान किया था। इस निबन्ध का प्रकाषन अखिल भारतीय हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग की ओर से किया गया था। कवि सैयद अमीर अली मीर को रसिक कवि समाज कानपुर और कवि समाज सीतापुर की ओर से साहित्य रत्न तथा काव्य रसाल की उपाधि देकर सम्मानित किया गया। मध्य प्रदेश के उदयपुरा दरबार ने भी कवि सैयद अमीर अली मीर को सम्मानित करने के साथ ही उदयपुरा के दरबार द्वारा संचालित विद्यालय मंे प्रधानाध्यापक के पद पर नियुक्ति किया था। आजादी के आन्दोलन में सीधे तौर पर भले ही भागीदारी नही की लेकिन कवि मीर ने महात्मा गांधी के सुधारवादी विचारों को अपनी काव्य रचनाओं मे कुछ इस तरह से व्यक्त किया कि गांधी जी के विचार जन-जन तक पहुँच कर जनमानस को उदेलित करके गांधीवाद के साथ जोड़ सके। हिन्दू मुस्लिम एकता तथा सर्वधर्म समन्वय की भावना को अपनी रचनाओं के माध्यम से जन-जन तक पहुंचाकर समाज को जोड़ने के लिए हमेषा तत्परता के साथ हमेशा लगे रहे। सामाजिक विषमताओं ओर कूरीतियों के प्रति सजग प्रहरी के रुप में युगानुकूल रचनाऐं रचकर समाज को जागरित करने में महती भूमिका को अदा करने मंे सबसे आगे रहे। तत्तकालीन समाज में वृद्ध विवाह तथा बाल-विवाह जैसी अनेक कुरीतियाँ समाज को अधोगति में ले जा रही थी तब आप ने बूढ़े का ब्याह नामक रचना के माध्यम से ऐसी सुधारवादी मनोवृत्ति का साक्ष्य प्रस्तुत किया। सैयद अमीर अली मीर की प्रमुख रचनाओं में बूढ़ों का ब्याह, नीति दर्पण, सदाचारी बालक काव्य संग्रह तथ लेख माला आदि प्रमुख है। सैयद अमीर अली मीर काव्य शास्त्र के माध्यम से एक संदेश वाहक के रुप में अपना नजरिया आम आदमी के इर्द-गिर्द से लेकर कुरीतियों धार्मिक आडम्बरों के प्रति सचेत करने के लिए अभिव्यक्त करते रहे। अपने प्रवेश के प्रति सचेत कवि ने असली हित चिन्तक के रुप में क्रान्ति कारी पथ प्रदर्शक की भूमिका को अपनी करिश्माई शख्सियत के साथ विष्व बन्धुतत्व एवं वसुदेवकुटुम्बकम् की भारतीय दर्शन की विचार धारा को अपने काव्य में अमिली जामा पहनाते हुये जीवन के अन्तिम दिनों मंे महात्मा शेखसादी से प्रभावित होकर उनके दर्शन पर आधारित कृतियेां गुलितां और बोस्तां का हिन्दी पद्यानुवाद करने में लगे थे कि एक दिन दुर्घटनावश 19 जनवरी सन् 1937 की रात्रि में रेलगाड़ी के आगोश में आकर इस दुनिया से विदा हो गये। बुन्देली माटी के सरोकारों से रचे बसे कवि सैयद अमीर अली मीर ने हिन्दी साहित्य को अपनी प्रतिभा से अनेक कृतिया सौपकर समृद्ध किया।


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