शनि की सूर्य से शत्रुता

पुराणों और ज्योतिष शास्त्र के अनुसार शनि सूर्य की द्वितीय पत्नी छाया के पुत्र है, जो सूर्य के तेज को यह ना सकीं, और अलग रहने लगी वही शनि का जंम हुआ अतः सूर्य ने नाराज होकर उन्हें शाप दिया और शनि को अपना पुत्र मानने से इंकार कर दिया अपमान और शाप से भरे शनि सूर्य से शत्रुता रखने लगे ओर उन्हें पराजित और अपमानित करने का प्रयास करने लगे। ज्योतिष के प्रसिद्ध ग्रन्थ उत्तर कालामृतम के अनुसार शनि आयु, मृत्यु, पराजय, भय, अपमान, द्ररिद्रता, मजदूरी नीच संगति, कर्जा, पापकर्म, आलस, जेल यात्रा, खेमी, दस्तकारी, लोहे की वस्तुऐं, पुराने वस्त्र, काले बनाज, विकलांगता, गठिया, वात विकार, पैर के रोग, लकवा, बहरापन, लंगड़ापन, सूखा, बकाल, मँहगाई, बेराजगारी, नौकरी छूटना, प्रेतबाधा, पागलपन, दुर्घटना, बँटवारा, संपति के झगड़े, तेली, काले पक्षी, गधा, नौकर, दास, सांप, दान, बुढापा, शीत ऋतु, गंदगी, अवैध संतान, सरसों का तेल, क्रोध, वनवासी,ब्रह्म राक्षस, लकड़ी, पत्थर, बदसूरत, लोहा, रेल, भारवाहक वाहन, अशिक्षा, चोरी, नीच कार्य, दुर्भाग्य, स्करवट, कंटीली वस्तुऐं व वृक्ष, अंधेरा, विष, गंदा, वस्त्र, बिखरे बाल, काला रंग, तमोगुणी, किसान, जातिच्युत, झूठ बोलना, युद्ध, पतन, सीसा धातु, आपरेशन, सर्जन, कंबल, पश्च्छिममुखी मकान व वस्तु, भ्रमण, नपुंसक, कारगार, शस्त्रागार, वैश्य, शूद्र, कुत्ता, भैंस, बकरा, निष्ठुर, चमड़ा, बाधा, विरोध, आय, जाॅब, दुःख मरण, स्त्री सुख, नसें, पुराना घर, राख, कोयला, दुष्ट से मित्रता, मंदगति, बुरे विचार, अंगे्रजी भाषा, पिछड़ा वर्ग, आरक्षण, अति विवाह विलंब का कारक है। 
न्याय के देवता शनि- शनि न्याय के कारक है। अतः शनि के दो व्यक्तित्व हैं। 
1. प्रथम यम जो मनुष्यों को उनके गत जंम के तथा पाप कमों के आधार पर दुःख रोगदि, कष्ट दण्ड स्वरूप प्रदान करता है।
2. दूसरा धर्मराज का। वह जातक को उनके पुण्यों एवं पुण्य कमों के आधार पर सुख, धन, उच्चपद, राजयोग आदि समस्त वस्तुऐं व कष्ट से मुक्ति देता है।