शेरशाह सूरी की किस्मत साथ देती तो इतिहास कुछ और ही होता


 


शेरशाह सूरी बहादुर लड़ाका और काबिल सुल्तान जो महान होते-होते रह गया माना जाता है कि किस्मत शेरशाह का थोड़ा और साथ देती तो हिंदुस्तान का इतिहास कुछ और ही होता, तारीख-ए-ंशेरशाही में जिक्र है कि फरीदखान यानी शेरशाह ने अपनी सौतेली मां के कहने पर जागीरदारी छोड़ दी थी. पर काबिल को अपनी किस्मत चमकाने के कई मौके मिलते हैं. फरीदखान हिंदुस्तान के बादशाह बाबर की नजरों में जितनी तेजी से चढ़ा उतनी ही तेजी से गिरा भी। बताते हैं कि बाबर उसकी आंखें, उसका जबीं (माथा) और चलने के तेवर देखकर समझ गया था कि फरीद की तरफ से लापरवाही बरती तो हिंदुस्तान की गद्दी पर मुगल नहीं पठान काबिज हो जायेंगे। बहरहाल, यह किस्सा आगे के लिए। अभी फरीद और उसकी जागीरदारी की बात करते हैं।
शेरशाह का ताल्लुक अफगानों की सूर जाति से था. उसके दादा इब्राहिम सूर 1542 में भारत आए थे जिनके बेटा और शेरशाह के पिता हसन सूर ने बिहार के सासाराम में एक छोटी सी जागीरदारी हासिल कर ली थी। वहीं फरीदखान का जन्म हुआ। परिवार लड़ाई के बाद फरीद खान जौनपुर के मनसबदार के यहां नौकरी करने चला गया था. वहां कुछ समय रहने के बाद वह बिहार के मनसबदार बहारखान की सेना में भर्ती हो गया. फिर एक रोज किसी बात पर बहारखान और फरीदखान में मनमुटाव हुआ तो वह बाबर की सेना में भर्ती हो गया. कुछ समय बाद बहारखान की मौत पर वह दोबारा बिहार आ गया और उसके नाबालिग बेटे जलाल खान का सलाहकार बन गया. कुछ समय बाद जलाल खान को रास्ते से हटाकर फरीदखान ने बिहार को अपने कब्जे में ले लिया. वह ताकतवर था औ रबहादुर भी. उसने बाबर की सेना में रहकर ही हिंदुस्तान की गद्दी के ख्वाब देखने षुरू कर दिए थे।
तारीख-ए-शेरशाही में एक किस्सा दर्ज है कि एक बार साथ खाने बैठे बाबर और फरीदखान के बीच कुछ ऐसा परोसा गया जिसे वह समझ नहीं पाया. उसने फौरन अपनी कटार से उसके टुकड़े कर डाले और बेबाक होकर खाने लग गया. तभी बाबर ने अपने खास सलाहकार खलीफा से कहा, 'इसके तेवर देखे? मैं इसकी पेशानी पर सुल्तान बनने की लकीर देखता हूं। इससे होशियार रहो और अगर हो सके तो गिरफ्तार कर लो। खलीफा बात को हल्के में ले गया। उसने बाबर को समझाया कि जितना वह सोच रहा है इतना कर पाना फरीदखान के बूते की बात नहीं है। लेकिन फरीद बाबर के इरादे भांप चुका था. वह काम का बहाना बनाकर अपनी जागीर, सासाराम आ गया। जब इसकी खबर मिली तो उसने कहा, 'मुझसे गलती हो गयी कि मैंने इसे जाने दिया, जाने अब ये क्या करेगा।
 दिसंबर, 1530 में बाबर की मौत के बाद हिंदुस्तान की गद्दी के कई ख्वाहिशमंद पैदा हो गए थे क्यों कि दूसरा मुगल-हुमायूं काबिल नहीं था। उनमें सूर का पठान फरीदषाह सब से ज्यादा काबिल था. यहां तक आते-आते फरीद ने खुद को शेरशाह सूरी कहलवाना शुरू कर दिया था। हुमायूं बंगाल जीतना चाहता था पर बीच में शेरशाह की जागीरदारी थी, हुमायूं ने उससे दो-दो हाथ करने की सोची। सन 1537 में चैसा, उत्तर प्रदेश में दोनों की सेनाएं आमने-सामने थी। चैसा के घाट पर दोनों के बीच कूटनीतिक पहल भी हुई. हुमायू ंने अपने दूत मोहम्मद अजीज को जब शेरशाह सूरी से मिलने भेजा तो उसने देखा कि शेरशाह कुदाली लेकर अपने महल के बंदोबस्त करने में लगा हुआ था। अजीज ने दोनों के बीच सुलह करवाई और करार हुआ कि मुगलिया परचम के नीचे शेरशाह सूरी को बंगाल और बिहार दे दिएजायेंगे. यह शेरशाह की जीत ही थी। इसको अपने हिस्से की जीत दिखाने के लिए हुमायूं ने एक खेल खेला. उसने शेरशाह को इस बात के लिए राजी किया कि दिखावे के तौर पर मुगलिया सेना शेरशाह की सेना को पीछे खदेड़ेगी और तब शेरशाह रहम की गुहार लगायेगा जिसे हुमायूं स्वीकार कर लेगा।
खेल खेला गया और बाबर की सेना के एक टुकड़े ने सूरी की सेना को पीछे धकेल दिया। रात घिर आई थी. शेरशाह सूरी ने इस खेल को बदलते हुए हुमायूं को गंगा तैरकर जान बचाने के लिए मजबूर कर दिया. शेरशाह के लिए हिंदुस्तान की गद्दी बस एक जंग ही दूर रह गयी थी। हुमायूं आगरा पहुंचा भी नहीं था कि कुछ महीने बाद मई,17,1540 को कन्नौज में दोनों फिर भिड़े ,अंजाम वही हुआ जो पहली खेल का हुआ था. बस इतना फर्क था कि इस बार हुमायूं ने हाथी पर बैठकर गंगापार की और अपनी जान बचाई।
 हुमायूं समझ गया था कि तख्त उसके हाथ से फिसल चुका है, शेरशाह सूरी के सर हिंदुस्तान का ताज चमकने लग गया था। हुमायूं भाग रहा था और पीछे-पीछे शेरशाह की सेना, किस्सा है कि सरहिंद पहुंचकर उसने शेरशाह को कहलवाया, 'मैंने तुम्हे हिंदुस्तान दे दिया है, तुम मुझे लाहौर दे दो और सरहिन्द हमारे बीच में सरहद होगी। सूरी से बड़ा ही ठंडा जवाब भिजवाया, काबुल छोड ़दिया तुम्हारे लिए. वहीं जाकर रहो। अब तकरीबन यह बात प्रचलित हो गयी है कि राजपूत हर लड़ाई में अमूमन हार जाते थे। कुछ हद तक यह सही भी है. लेकिन राजपूतों की बहादुरी पर प्रश्न चिन्ह लगाना गलत है। सुमेल की लड़ाई, जो राजपूतों और शेरशाह सूरी के बीच हुई थी। इस बात की गवाह है.
शेरशाह राजपूताना फतेह करने के लिए निकला था. जोधपुर का राठौर राजा मालदेव उसके सामने था. मालदेव शेरशाह की टक्कर का लड़ाका था। खानवा की लड़ाई में राणा सांगा बाबर से हारकर अपना वैभव खो बैठा था. इधर मालदेव ने अपनी सीमाओं में बीकानेर, मेड़ता जैतारण, टोंक, नागौर और अजमेर मिला लिए थे. बढ़ते-बढ़ते मालदेव झज्जर तक आ गया था जो दिल्ली से सिर्फ 30 मील दूर है। शेरशाह और मालदेव में लड़ाई अब लाजमी हो गयी थी। यह लड़ाई चार जनवरी 1544 में राजस्थान में पाली जिले के जैतारण में हुई. जंग भयंकर हुई थी। शेरशाह तकरीबन हार चुका था. पर तभी कुछ ऐसा हुआ कि राजा मालदेव अपने ही लोगों पर अविश्वास कर रात के अंधेरे में लड़ाई के मैदान से चला गया।
बताते हैं कि तब रणभूमि में बाकी बचे छत्तीस कौम के रणबांकुरों ने महावीर रावखीवकरण, रावजैता, रावकुंपा, रावपांचायण और रावअखेराज के नेतृत्व में मारवाड ़के मात्र 20 हजार सैनिकों के साथ शेरशाह सूरी की 80 हजार सेना पर हमला बोल दिया। यह इतना भयंकर हमला था कि दिल्ली की सेना में हाहाकार मच गया। शेरशाह ने मैदान छोड़ने का मन बना ही लिया ही था कि उसके सबसे काबिल सेना पति खवासखा नमारवात ने रावजैता और रावकुंपा को मारकरजंग का रुख अपनी तरफ कर लिया। जंग में हुई भारी तबाही देखकर शेरशाह को कहना पडा, 'खैर करो, वरना मुट्ठीभर बाजरे के लिए मैं अपनी दिल्ली की सल्तनत खा देता।
 22 मई, 1545 को शेरशाह सूरी की कलिंजर के किले को जीतने के दौरान मौत हो गयी. इस तरह दिल्ली के तख्त पर वह बस पांच साल रह सका। शेरशाह में महानता के सारे लक्षण मौजूद थे और ऐसा मानना है कि किस्मत अगर उसका थोड़ा और साथ देती तो यकीनन हिंदुस्तान का इतिहास कुछ और ही होता। शेरशाह सूरी ने हिंदुस्तान भर में सड़कें और सराए बनवाईं. सडकों के दोनों तरफ आम के पेड ़लगवाए जिससे चलने वालों को छाया रहे. हर दो कोस पर एक सराय बनवाई गयी. इन सरायों में हिंदुओं और मुसलमानों के लिए अलग-अलग व्यवस्था का इंतजाम करवाया गया और दो घोड़े भी रखवाए गये जिन्हें हरकारे इस्तेमाल करते। शेरशाह सूरी ने ऐसी कुल 1700 सरायों का निर्माण करवाया. उसने सड़कों पर सुरक्षा व्यवस्था करवाई। मुद्रा के तौर पर उसने 11.53 ग्राम चांदी के सिक्के को एक रुपये की कीमत दी। शेरशाह ने राज्य संचालन के लिए दीवान-ए-वजारत,  दीवान-ए- आरिज, दीवान-ए-रिसालत और दीवान-ए-इंष्श जैसे विशेष विभाग बनाए। उसका मानना था कि राज्य में तरक्की तभी संभव है जब अमन कायम हो. उसने मन सब दारी में यह तय करवाया कि सैनिकों की संख्या निश्चित हो, उनको समय पर वेतन मिले और जरूरत पड़ने पर मन सबदार अपने सैनिक सुल्तान के सेवा में भेजे। शेरशाह सूरी मानता था कि किसान ही किसी मुल्क का आधार होते हैं. उसने किसानों के लगान को कम किया और उन्हें ज्यादा से ज्यादा सहूलियतें दीं। उन्हें यह भी आजादी दी गयी कि वे जो चाहे उगायें और जैसे चाहे लगान दें. लगान की राशि तय करके पटवारियों को हिदायत दी गई थी कि तयशुदा रकम से ज्यादा लगान नहीं वसूला जायेगा. किसानों को उससे सीधे मिलकर अपनी तकलीफ सुलझाने का हुक्म सुनाया गया। शेरशाह सूरी किसानों और रियाया का हमदर्द बनकर उभरा शेरशाह सूरी की काबिलियत का अंदाजा इससे भी लगाया जा सकता है कि अपने पांच साल के शासन में उसने कई ऐसे काम करवाए जिनका अकबर ने भी अनुसरण किया।