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स्वातिक का अर्थ सौभाग्य

स्वातिक संसार मे व्याप्त एक प्राचीन प्रतीक है। भारतीय संस्कृति मे ऊँ के स्वातिक सबसे महत्वपूर्ण बाद प्रतीक है इसका उद्म भूतकाल के रहस्यमयी पर्तों मे खो चुका है। सर्वप्रथम आर्यों ने इसे मानवता की भलाई के लिये अपनाया। वहाँ ये यह संसार की अनेकों सभ्यताओं और देशों मे फैल गया। भारतीय दर्शन मे  विश्वचक्र का वर्णन है। स्वातिक का केन्द्र ब्रह्माण्ड का उद्गम स्थान है। खड़ी रेखा शिव और आड़ी रेखा पार्वती या स्त्री अंग है। उनका क्रास सारे विश्व की उत्पत्ति और उसके चक्र का निर्माण करता है। क्रास ईश्वर और रचना का प्रतीक है स्वातिक क्रास का पूर्ववर्ती रूप है। क्रास की चार भुजायें भारतीय अध्यात्म  के चार परूशार्थों धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष और चार दिशाओं पूर्व, पश्च्छिम, उत्तर, दक्षिण की प्रतीक है संस्कृत के शब्द स्वातिक का अर्थ सौभाग्य या शुभ होना होता है। स्वातिक सौभाग्य, समृद्धि या शुभफल का प्रतीक है। यह सूर्य और जीवन का प्रतीक है। इसकी दांयी भुजा विष्णु तथा दांयी भुजा माँ काली की प्रतीक है। 12,000 पुरानी सभ्यताओं मे स्वातिक पाया जाता है। स्वातिक ईसा पूर्व की तथा मध्ययुगीन योरोपनीय सभ्यताओं मे, मोहन जोदड़ो ईरानी, हित्ती, सेल्ट, ग्रीक, वैदिक सभ्यता की पूर्व की सभ्यताओं मे, मूल अमरीकन सभ्यता मे, चीन, जापान, दक्षिण पूर्व की सभ्यताओं मे विभिन्न रूपों मे पाया जाता है। मोहन जोदड़ो की सभ्यता के बर्तनों व मोहरों में स्वातिक पाया जाता है। फोनेशियन इसे सूर्य का प्रतीक मानते है। उत्तरी अमेरिका मे नवाजोस इसे प्रयोग करते थे। प्राचीन युनान मे पाइथागोरस ने टेट्रक्टस के रूप मे प्रयोग किया है। जो पृथ्वी और स्वर्ग के बीच सबंध जोड़ता है यह दुर्भाग्य और बुरी शक्तियों का नाश करता है। इसे मूलाधार चक्र, महात्मा बुद्ध के पैर और पदचिन्हों मे स्वातिक पाया जाता है। स्वातिक जैन    धर्म के अष्ठमंगल चिन्हों में से एक है अष्ठमंगल जैन धर्म के आठ शुभ चिन्ह हैं। जो जैन धर्म के पारंपरिक शास्त्रोक्त उदद्ेश्य या वस्तुओं को बताती है। दर्पण, भद्रासन (सिंहांसन), वर्धमानक, वेस चूर्ण, कलष, मछली का जोड़ा, श्रीवत्स चिन्ह, नंदयव्रत, स्वास्तिक निर्माण और स्वास्तिक। हरियाणा के अम्बाला जिले के प्रख्यात ज्योतिषी और चित्र वेध यंत्र, चित्रा नक्षत्र मण्डल, चित्रा लग्न मापक जैसे कई ज्योतिष यंत्रों के निर्माता प. जगन्नाथ शर्मा भारद्वाज अनुसार स्वास्तिक सप्तर्षि नक्षत्र मंडल द्वारा धु्रव तारे के चारो और परिक्रमा का चित्र है। स्वास्तिक के क्रास का मध्य बिंदू जहां आड़ी और खड़ी भुजायें मिलती है। वह ध्रुव तारे की स्थिति का प्रतीक है। केन्द्र बिंदू से निकलती चार समकोणिक भुजायें चार दिषायें हैं। प्रत्येक भुजा अंत मे दाहिनी ओर मांेंड़ दी जाती है। यह द्वितीय भुजा भी अंतिम सिरे पर 45 अंश पर पुच्छाकार रूप मे मोड़ दी जाती है। प्रत्येक उपभुजा और उसके पुच्छ पर सप्तर्शि नक्षत्र मंडल के सात तारों मरीचि, अरून्धति, वषिष्ठ, अंगिरा, अत्रि, पुलस्त्य, पुलह, तथा ऋतु की स्थित होती है। पुलह पुलस्त्य का उप लघु नक्षत्र है। यह स्वास्तिक जमांक मे चार केन्द्रों का प्रतीक है। स्वास्तिक की उपरी भुुजा लग्न व सप्तर्षि नक्षत्रों की उपरी स्थिति का द्योतक है। अधोगामी भुुजा सप्तर्शि नक्षत्रों की उपरी स्थिति का द्योतक है। नीचे की स्थिति को बताता है। दांयी भुजा (दशम भाव) की भुजा उदय की स्थिति और बांयी भुजा (चतुर्थ भाव) सप्तर्षि नक्षत्रों की अस्त स्थिति को बताता है। प्रसिद्ध रूसी आध्यात्मवदी महिला हेलेना ब्लावस्तिकी (1831-1891) ने 1888 में प्रकाशित अपनी पुस्तक सीक्रेट डाक्ट्रिन मे लिखा है। हिन्दुआंे का आध्यात्मिक प्रतीक स्वास्तिक आर्यों का चिन्ह है। जो उन्हंे अपने पूर्वजों अतलांतिस वासियों से मिला है। मादाम ब्लावस्तिकी के अनुसार आर्य अतलांतिस वासियों की संताने हैं। प्राकृतिक विपदा मे डूबे अतलांतिस के निवासियों ने तिब्बत मे शरण ली वहीं से वे योरोप होते हुये भारत मे आये स्वास्तिक दो विपरीत शक्तियों के परस्पर सन्तुलन का प्रतीक है। जैसे सूर्य व चन्द्रमा, दिन व रात, प्रकाश व अंधेरा, गर्म व ठंडा, गीला व सूखा, स्त्री व पुरूष।
 


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