टीपू सुल्तान की पराजय

बात मार्च 1993 की है। मेरी ज्योतिष और वास्तु आदि मे नई-नई पैदा रुचि पैदा हुयी थी उन्हीं दिनों मै अपने कुछ मित्रांे के साथ दक्षिण भारत के मंदिरों और तीर्थों की यात्रा कर रहा था तिरूपति बालाजी, कोर्णाक के सूर्य मंदिर, जगन्नाथ जी मंदिर के दर्शन करने के बाद जब मैं बैंगलौर मे कावेरी नदी के किनारे स्थित टीपू सुल्तान के श्रीरंगपटटम् के किलें पर पहुँचा तों किले की सैर के दौरान मुझे यह देखकर बड़ा आश्चर्य हुआ कि टीपू सुल्तान के किले मे तुलसी चैरा बना हुआ मैंने जब इस बारे मे वहां के गाइड से पूछताछ की कि एक मुस्लिम शासक के किले मे तुलसी चैरे का क्या काम है। तो उसने मुझे टीपू सुल्तान के समय घटी एक विचित्र ज्योतिष घटना सुनाई। अति दुर्लभ और अजीब घटना को मै पाठकों के सामने पेश कर रहा हूँ।  
 17 वीं सदी के उत्तरार्घ मे मैसूर मे टीपू सुल्तान का शासन था जिनका जंम 20 नवम्बर 1752 को सुल्तान हैदर अली व माता फखरूनिसां के घर में हुआ उनके जंम के पूर्व हैदर अली व फखरूनिसां ने आरकाट के प्रसिद्ध सन्त टीपू मस्तान औलिया जो मस्त कलंदर कहलाते थे की दरगाह पर बेटा पाने के लिये मनौती मानी थी उसके कुछ ही दिन बाद बेगम गर्भवती हो गई और उन्ही सन्त के नाम पर बालक का नाम फतह अली टीपू रखा गया जो अपने पिता हैदर अली की मौत के बाद दिसम्बर 1782 मे मैसूर के सुल्तान बने थे। टीपू सुलतान देश को अंग्रेजों से आजाद कराना चाहते थे वे मराठों, निजाम को मिलाकर अंग्रेजों के खिलाफ संयुक्त मोर्चा बनाना चाहते थे लेकिन निजाम व मराठे अपने स्वार्थों के लिये अंग्रेजों से मिल गये थे। टीपू सुल्तान 1792 की जंग हार गये थे उन्हंे अंग्रेजों को अपना आधा राज्य व तीन करोड़ रूपया हर्जाना देना पड़ा था वे जानते थे कि अंग्रेजों से उनकी अगली जंग जल्द ही होगी वे अपनी फौज व शासन को सुदृढ बनाने मे लगे थे तभी उन्हें एक मजबूत और सुरक्षित दुर्ग की आवश्यकता महसूस हुयी इस संदर्भ मे उन्होने अपने सलाहकारों से परामर्श किया तो उन्होने बताया कि गोदावरी तट पर बसी पड़ोस की शत्रु रियासत कुर्ग मे एक ऐसी विद्वान ज्योतिषी है। यदि उसकी सलाह से किला बनवाया जाये तो उस किले को कोई भेद नही सकेगा टीपू सुल्तान ने उसे बुलवा भेजा किन्तु वह आने को राजी नही हुआ तो उसे टीपू ने उसे जबरन उठवा लिया अपने राज्य मे टीपू ने स्वयं उसकी डोली मे कंधा दिया पहले तो वह काफी नाराज हुआ ओर टीपू की मदद करने करे तैयार नही हुआ किन्तु राष्ट्ररक्षा और अंग्रेजों के विरूद्ध युद्ध की बात सुनकर वह मदद करने को राजी हो गया। उसने कहा कि मेरे पत्रा, पुस्तके आदि सब वही छूट गये है। मुझंे महल में काम करने के लिये बिलकुल अलग जगह और कुछ सामग्री चाहिये टीपू ने उसे राजकीय अतिथि बनाकर सम्मान सहित श्रीरंगपटटम् के किलें उसके लिये सब व्यवस्था कर दी और उसकी पूजा करने के लिये तुलसी चैरा बनवाया उसने पत्रा बना कर पक्षी शकुन विचार व ग्रह गणना करके टीपू को एक पहाड़ी पर एक खास दिन का मुहुर्त बताया कि उपरोक्त दिन उस पहाड़ी पर आप पूजन सामग्री लेकर जाये वहां शाम को पर्वत की चोटी पर एक मोर आकर बैठेगा वह मोर जिस दिशा की ओर चांेच करके बैठे मोर का पूजन करके उसी दिशा में आप अपने किला का प्रवेश द्वार रख कर आप किले का निर्माण करवाइये तो उस किले से हर युद्ध मे आपकी जीत होगी यह सुनकर दरबार के मुल्ला मौलवियों को चिंता हुयी कि अगर पंडित जी की बात सच हुयी और किला बन गया तो तो दरबार मे उनकी इज्जत घट जायेगी उन्होंने टीपू से कहा आपने पंडित से सारी बात तो जान ही है। उसे पहाड़ी पर ले जाने की जरूर कोई जरूरत नही है। आप खुद या किसी अन्य पंडित से पूजन करवा लें। उनकी बातों मे आकर उस दिन वह सारी सामग्री लेकर दूसरे पंडित सहित पहाड़ी पर पहुँचा सारा दिन बीत गया किन्तु कोई मोर नही आया उस पंडित के विरोधी कहने लगे कि कहां आप बेकार मे पंडित के चक्कर मे पड़ गये तभी पहाड़ी पर एक भिखारी आया उसके गले मे एक लकड़ी का बड़ा सा मोर था उस समय प्रथा थी कि भिखारी लोग गले मे लकड़ी का खोखला कपड़े मालाओं से सजा मोर लेकर चलते थे जिसके उपर ढक्कन होता था उन्हें जो कुछ उन्हें मिलता था वह उसी मोर मे डाल देते थे ज्योतिष से अज्ञान मुल्लाओं ने समझाया कि महाराज यही वह मोर है। असली मोर कहां आयेगा सूरज भी अस्त होने को है मोर आना होता तो अब तक आ जाता उनकी बातों मे आकर टीपू ने उसी मोर की पूजा शुरू कर दी टीपू पूजा करके खड़ा हुआ था तभी एक अति विशालकाय मोर पहाड़़ी पर आ बैठा उसे देखकर टीपू व सारे दरबारी सन्न रह गये क्योंकि अब नीचे से उतनी जल्दी पूजन सामग्री लाना संभव नही था टीपू पछताते हुये निराश होकर लौट आये और पंडित जी को सारी बात बता कर दूसरा मुहुर्त पूछा पंडित जी बोले आपने मेरी बात पर विश्वास नही किया अब ऐसा मुहुर्त निकालना संभव नही है क्योंकि ऐसा मुहुर्त सैकड़ों सालों मे एक बार आता है महाराजा अब आपकी पराजय निश्चित है इजाजत लेकर पंडित वहां चल दिया मई 1799 में पुनः टीपू की अंग्रेजों से जंग हुयी टीपू ना केवल वे हारे बल्कि वे वीरगति को प्राप्त हुये।