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वीर सरोवर दिनारा की अनूठी दास्तां

ग्रामवासियों और टीकमगढ़ दर्शन से जुटाई गई जानकारी के अनुसार सरोवर का अस्तित्व कासना नदी से माना जाता है इस नदी से निकलकर दो नाले दिनारा की ओर बहते थे दक्षिण में स्थित सेवढ़ी कला ग्राम से भी एक नाला निकलकर इस ओर बहता था अतः इस त्रिवेणी संगम पर वीर सरोवर का निर्माण किया गया। सरोवर की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि पर नजर डाले तो ज्ञात होता है कि सोलहवीं शताब्दी में दिनारा जागीर पर ओदा नरेश मधुकर शाह राज करते थे। भारतीय इतिहास में जो नाम अकबर का रहा, बुंदेलखण्ड में वही स्थान मधुकर शाह का था। मुगुलों की सर्वोच्च प्रभुसत्ता का प्रभावकाल यही समय था, जिसे ललकारने वाले दो ही राजा थे। महारणा प्रताप और महाराजा मधुकर षाह, मधुकर षाह की महारानी गणेशकुंवर भी कम भक्त न थी भक्ति की होड़ में वे भगवान राम को अयोध्या से आरेझा लाई थी। वीर सिंह देव ओरछा के नरेश मधुकर षाह (1554-1592) के पुत्र थे। मधुकर शाह की मृत्यु के पश्चात उनके ज्येष्ठ पुत्र रामशाह ओरझा की गद्दी पर बैठे। उनके शेश पुत्रों को छोटी जागीरें दे दी गई। इस बंटवारे के अंतर्गत वीर सिंह देव की बड़ोनी जागरी दे दी जिससे वह संतुष्ठ ना थे। वीर सिंह देव काफी महत्वकाक्षी होने के कारण वह विद्रोह करन लगे और आसपास की जागीरों पर कब्ज करने लगे। रामशाह इस कार्य से बहुत नाराज थे, दोनों भाईयों मंे सैनिक मुठभेड़ भी हुई, इन मुठभेड़ों से वीर सिंह देव की नजरें थी उनके मार्ग मंे केवल एक ही बाधा थी रामषाह, ओरछा नरेश रामशाह पर सम्राट अकबर का हाथ था इस कारण वीर सिंह देव को उनके खिलाफ सफलता नहीं मिल पा रही थी। उधर शहजादा सलीम भी मुगल साम्राज्य की बागडोर संभालने के लिये आतुर हो उठा था। उसकी इस आतुरता ने धीरे-धीरे विद्रोह का रूप धारण कर लिया और 1601 ई. के मध्य उसने इलाहाबाद मंे शक्ति संग्रह करना आरंभ कर दिया। वृद्ध अकबर को दुश्चिन्ताआंे ने आ घेरा अबुल फजल तब दक्षिण मंे थे-सम्राज्य ने उन्हें शीघ्र अतिशीघ्र आगरा बुला भेजा। सलीम अकबर की अपने ऊपर रूष्टता का कारण अबुल तुजुक-इ-जहांगीर मंे लिखता है कि इसके (अबुल फज़ल) के विचार मेरी ओर नेक ना थे एकांत और सबके सामने वह मेरे विरूद्ध बाते किया करता था। इस समय जबकि मुझमें और मेरे पिता मंे कटुता बढ़ रही थी। उस मसय उसका सम्राट से मिलना मेरे लिये अहित्कर था। सलीम को भय था कि अबुल फजल अकबर को उसके खिलाफ भड़का देगा फिर सम्राट से क्षमा प्राप्त करना कठिन हो जायेगा। अकबर का झुकाव रामशाह की ओर था सो सलीम और वीरसिंह देव मंे गहरी मित्रता हो गई। अतः सलीम ने दक्षिण विजय करके लौट रहे अबुल फजल की हत्या करने की ठानी और वीरसिंह देव को पुरुस्कार का लालच देकर मार्ग में ही अबुल फजल को समाप्त करने का संदेश भेजा। वीरसिंह ने दूरदर्शिता के चलते यह दायित्व स्वीकार कर लिया और आतंरी के निकट शेख का सिर काटकर हत्या कर दी। इस लूट मंे वीरसिंह को काफी धन प्राप्त हुआ साथ ही जहांगीर सलीम  के राजा बनते ही वीर सिंह देव को ओरछा की गद्दी व तीन हजार मनसबदारी भी प्राप्त हुई लगभग 1621ई. में वीर सिंह देव का मनसव बढ़ाकर चार हजार बाईस सौ सबार कर दिया गया। चंदेला के पश्चात वीर सिंह देव ने ही बुंदेलखण्ड मंे महान निर्माता के रूप में ख्यति प्राप्त की थी। कहा जाता है कि उन्होंने एक ही तिथि माघ वदी 5 संवत 1675 में बावन ईमारतों और तालाबों की नीव एक ही साथ उलबाई थी, जिनमंे दिनारा था वीर सरोवर सबसे अनुपम निर्माण है एक मत यह भी है कि इस तालाब की शुरूआत चंदेलों ने करवाई थी बाद मंे वीर सिंह देव ने पूरा करवाया पर यह मत मान्य नहीं है कहा जाता है कि यह निर्माण उस समय उदारता की मिशाल था, क्योंकि इस तालाब को बना रहे मजदूरों को अच्छी उजरत दी जाती थी साथ ही महिला श्रमिकों के साथ आये बच्चों का भी परिश्रामिक मिलता था। नरेश का मानना था कि बच्चे भी इस निर्माण कार्य में शामिल है सो इन्हंे भी पारिश्रमिक मिलना चाहिये। सरोवर से जुड़ी है लोक परंपरायें कहते है नदिया, तालाब, झील संस्कृति व सभ्यता की साक्षी होती है ऐसी ही लोक परंपरायें वीर सरोवर से भी जुड़ी है यहां भगेड़े व वेलना दो लोक तीज तालाब के किनारे मनाये जाते है जिसमें समस्त ग्रामवासी भोजन बनाते व खाते है, साथ ही एक दूसरे को सदव्यवहार पूर्वक वितरित भी करते है सावन के माह में यहाँ हर वर्ष मेला भी लगता है कार्तिक माह में कतकियां सारे तालाब का चक्कर लगाती व भजन गाती है, नवरात्री और गणेश उत्सव पर प्रतिमाओं का विसर्जन भी यही किया जाता है पर अब यह परंपरायें धीरे-धीरे समाप्त हो रही है।


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