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विनोद खन्ना

 


विनोद खन्ना का जन्म 6 अक्टूबर, 1946 को पेशावर में हुआ था। पहली पत्नी गीतांजलि से दो पुत्र अक्षय खन्ना और राहुल खन्ना। दूसरी पत्नी कविता से साक्षी और श्रद्धा। मेहनत से ग्लैमर संसार तक का सफर के बावजूद चमक-दमक से विरक्त होकर अध्यात्म को अपनाया। पहले खलनायक फिर नायक का किरदार निभा कर यादगार बना दिया। बाॅलीवुड का स्टारडम छोड़कर संन्यास की राह पकड़ने वाले अभिनेता विनोद खन्ना 1982 में अमेरिका के ओरेगन राज्य में बने ओशो के आश्रम रजनीशपुरम चले गए और पांच साल तक वहां रहे। इस दौरान उन्होंने ध्यान अध्यात्म के साथ माली का काम संभाला। आश्रम में उनका नामकरण विनोद भारती के रूप में हुआ था। लेकिन जिस मन की शांति के लिए वो अध्यात्म की शरण में गए, वो उन्हें हासिल नहीं हुई।  इधर मुंबई में इसके चलते उनका परिवार बिखर गया। विनोद खन्ना ने खुद कहा था कि संन्यास का वो फैसला बिल्कुल मेरे अपने लिए था। इसलिए वो फैसला मेरे परिवार को बुरा लगा। मुझे भी दोनों बच्चों के परवरिश की चिंता होती, लेकिन मैं मन से मजबूर था।
 संन्यास का फैसला विनोद खन्ना की मजबूरी थी या मन की कोई उलझन, संन्यास के साथ विनोद खन्ना का करियर तो वहीं का वहीं ठप हो गया, परिवार भी ऐसे बिखरा कि फिर कभी जुड़ नहीं पाया। अमेरिका के ओशो आश्रम में रहते हुए ही पत्नी गीतांजलि से अलगाव हुआ। 1985 में तलाक के साथ ये बात तो खत्म हो गई, लेकिन विनोद खन्ना का मन संन्यास में भी नहीं रमा। वो अक्सर भारत वापस लौटने की बात करते रहते थे।
 मुंबई लौटकर आने के बाद एक तरफ सिनेमा की दुनिया में खुद को दोबारा साबित करने का संघर्ष और दूसरी तरफ बिखरे हुए परिवार का दर्द। विनोद इस दौर को भी बदल देना चाहते थे। वो साथ उन्हें कविता में मिला, जिनसे मिलना बड़े ही संयोग से हुआ था।
 कविता अमेरिका और यूरोप से पढ़ाई पूरी करने के बाद इंडस्ट्रियलिस्ट पिता सरयू दफ्तरी का बिजनेस संभाल रही थी। विनोद खन्ना से पहली मुलाकात एक पार्टी में हुई, जिसमें कविता बिना किसी बुलावे के दोस्तों के साथ आई थी। कविता की तरफ से वो मुलाकात तो औपचारिक थी, लेकिन विनोद खन्ना उस पहली मुलाकात में ही कविता के मुरीद हो गए। एक साल की मेल मुलाकात के बाद विनोद खन्ना ने एक और चैंकाने वाला ऐलान किया, वो अपने से 16 साल छोटी कविता से शादी करने जा रहे हैं।
 विनोद खन्ना को 27 अप्रैल को सुबह 11.20 बजे मुम्बई के सर एच एन रिलायंस फाउंडेशन हास्पिटल में निधन हो हुआ। वह ब्लैडर कैंसर से जूझ रहे थे, वह 70 साल के विनोद खन्ना को शरीर में पानी की कमी के चलते 31 मार्च को अस्पताल में भर्ती कराया गया था।
 विनोद खन्ना वर्ष 1998 में पहली बार गुरदासपुर से भाजपा के सांसद निर्वाचित हुए थे, इसके बाद 1999 और 2004 के आम चुनावों में भी वह इस सीट से निर्वाचित हुए। लेकिन 2009 में वह कांग्रेस उम्मीदवार प्रताप सिंह बाजवा से हार गए, हालांकि वर्ष 2014 में वह एक बार फिर इस सीट से जीते। उन्हें पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार में संस्कृति एवं पर्यटन राज्य मंत्री और फिर विदेश राज्य मंत्री बनाया गया। 
 1974 में आई इम्तिहान नाम की फिल्म इसकी मिसाल है। उस दौर में बढ़ती विनोद खन्ना की लोकप्रियता की एक मिसाल हाथ की सफाई नाम की फिल्म भी है। मनमोहन देसाई ने उन्हें अमर अकबर एंथनी के बाद परवरिश जैसी फिल्म में अमिताभ के साथ दोहराया, तो प्रकाश मेहरा ने एक बार फिर उन्हें मुकद्दर का सिकंदर में आजमाया। इन सभी फिल्मों में सहायक हीरो की भूमिका करते हुए भी विनोद खन्ना अमिताभ के बराबरी करते नजर आए। अमिताभ को बराबर की टक्कर के साथ उस दौर में विनोद खन्ना की अपनी अलग सितारा हैसियत भी थी, इस हैसियत के साथ विनोद खन्ना की दो-तीन फिल्म हर साल सुपरहिट होती थी। हालांकि इस दौर में सोलो हीरो फिल्में विनोद खन्ना को कम ही मिली। लेकिन अपने चाहने वालों की नजर में इकलौते हीरो थे, जो अमिताभ के सुपरस्टारडम को भी पीछे छोड़ सकते थे।


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