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ये नाचने वाले दरवेश

मध्य पूर्व में एक से एक विचित्र धर्म एवं सम्प्रदाय के लोग है, परन्तु उनमें यात्रियों का जो सर्वप्रथम बरबस ध्यान आकर्षित करते हैं वे है लेबनान के 'नाचने वाले दुरवेश'। दुरवेशों का निवास-स्थान जिसे वहां के लोग तकिया कहते है शहर के बाहर एक छोटी सी पहाड़ी पर स्थित है। जैतून तथा शहतूत के हरे-भरे वृक्षों से आच्छादित ष्वेत गुंबजदार तकिया देखते ही मन को मोह लेती है। पहाड़ी के नीचे कल कलनिनादिनी कादिशा की रजत धार ने वहाँ की छटा मंे चार चांद लगा दिये है।          
इस्लाम में खास कर धार्मिक अनुष्ठानों के लिए संगीत और नृत्य सर्वथा वर्जित है। धार्मिक कृत्यों में संगीत और नृत्य के समावेश के औचित्य पर निम्नलिखित दन्तकथा प्रचलित है। कहा जाता है कि पैगम्बर मुहम्मद साहेब ने एक बार एक दिव्य आभास की अनुभूति के अनन्तर हजरत अली को कुछ आंतरिक रहस्य प्रदान किये और चूंकि वे रहस्य साधारण मस्तिश्क के लिए नही थे अतः उन्होंने हजरत अली से यह ताकीद कर दी कि इन रहस्यों को वह सदा गुप्त ही रक्खे। परन्तु उक्त रहस्य हजरत अली के अन्तर मंे फैलने लगा और इस भय से कि कहीं वह हृदय फाड़कर बाहर न आ जाय, वह मरूस्थल की ओर भागे। एक छोटे से मरूद्यान में पहुंचने पर एक सोते के किनारे पानी पीने के लिए जब उन्होंने मुंह खोला तो उसमें से रहस्य का कुछ अंश पानी में गिर पड़ा। उक्त घटना के कई मास उपरान्त एक गड़रिया घूमता घामता वहां आ पहुंचा और उसने देखा कि उक्त स्रोत के किनारे एक सुन्दर नल (नरकट) का पौधा उगा हुआ है। उसे काटकर उसने एक बांसुरी बना ली। जब वह बांसुरी बजाने लगता था तो उससे आनन्द की एक ऐसी मादक स्वरलहरी निकलती थी जिसे सुनकर उसकी समस्त भेड़ें घास चरना भूल जाती थी और अन्य चरवाहें प्रेमोन्मत्त होकर उस वंशी की ध्वनि पर नाचते लगते थे। तभी से धार्मिक अनुष्ठानों में भी नाचने और बांसुरी बजाने की पावन परम्परा चल पड़ी। रात के करीब 9 बजे शेख हमकों एक बहुत बड़े कमरे में ले गये यही नाच वाला कमरा था। कमरे के फर्श पर ईरानी दरी बिछी हुई थी। तेज रोशनी से कमरा जगमगा रहा था। शेख के कमरे में प्रवेश करते ही उस सम्प्रदाय के अनुयायिओं तथा अन्य दर्शकांे ने जिनमें कमरा पहले ही से भरा हुआ था, पहले खड़े होकर फिर झुककर षेख की अभ्यर्थना की। शेख ने चर्म (भेड़ की खाल) पर आसन जमाया हम लोग उनकी बांयी ओर बैठे। बांसुरी ढोल और जिदर बजाने वाले हम लोगों के सामने बैठे। थोड़ी देर के पश्चात एक दर्जन दुरवेशों ने शान्तिपूर्वक कमरे में प्रवेश किया। वे लम्बे लबादों से लैस थे तथा तुर्की टोपी (फेज) पहने हुए थे। उनके सिर आगे की ओर झुके हुए तथा दोनों हाथ छाती पर जुड़े हुए थे। उनके लिए एक ओर कीमती कालीन बिछे हुए थे जिन पर वे बैठ गये। उत्सव का प्रारम्भ कुरान की एक आयत के पाठ द्वारा हुआ जिसमें खुदा की इबादत की गयी थी। उसके पश्चात् एक रहस्यवादी गीत द्वारा संगीत का समारम्भ हुआ। संगीत की गत के आरोह के साथ ही दुरवेश उठे, एक पंक्ति में खड़े हुए, तभी उन्होंने बारी-बारी से झुककर शेख को नमस्कार किया। तब चारों कोनों पर घूमते हुए तथा झुककर नमस्कार करते हुए उन्होंने कमरे की तीन-तीन बार परिक्रमा की। इसके पश्चात एक बुजुर्ग आदमी ने दुरवेशों के चोगे, जिन्हंे आबा कहते है, उतार लिए और अब वे अपने असली नृत्य कार्य में जुट गये। प्रत्येक दुरवेश जहाँ पर वह खड़ा था वहीं नाचने लगा। शनैःशनैः नृत्य की गति तीव्रतर होती गयी, यहाँ तक कि उनके चेहरों से एक प्रकार का दिव्य प्रेमोन्माद झलकने लगा। उस दिव्य प्रेम से वहाॅ का सम्पूर्ण वातावरण ही विद्ध दिखाई देने लगा। नृत्य लगभग पच्चीस मिनट तक चलता रहा। तब शेख ने कई बार ताली बजाकर दुरवेशों को रूकने का संकेत किया। उनमें से कुछ ने तो शेख के इशारे की ओर जैसे बिलकुल ही ध्यान नही दिया और एक प्रकार की मूच्र्छितावस्था में वे तब भी पूर्ववत् नाचते रहे। शेख तब स्वयं उन दूरवेशों के पास गये और अपने हाथों से उन्हें बैठाया परन्तु वे तब भी अर्द्ध मूच्र्छित अथवा हाल की अवस्था में थे। अब बाजों का वजना भी बन्द हो गया था। क्षण भर तक पूर्ण स्तब्धता छा गयी। सहसा रात्रि की नीरब  निस्तब्धता केा भंग करती हुई शेख की ओजस्विनी वाणी प्रस्फुटित हुई ''प्रियतम-ईश्वर बिना मदिरा के ही समुन्नत है, प्रियतम- ईश्वर पाप एवं पुण्य से परे है, प्रियतम ईश्वर उस उच्च स्थान पर आसीन है जहाँ सब एक है। इन शब्दों के साथ वह रोचक उत्सव जो हम लोगों के लिए संक्षिप्त कर दिया गया था। समाप्त हुआ। दुरवेश आन्दोलन अथवा सूफीमत का प्रादुर्भाव ईसा की आठवीं शताब्दि में हुआ था। ईसाई रहस्यवादी संतों से प्रभावित होकर ईराक की भूतपूर्व राजधानी कूफा के कुछ प्रायश्चित प्रिय मुसलमानों ने शरीर को यातना देने के लिए खुरदुरे वस्त्र पहनना प्रारम्भ कर दिया। इस आन्दोलन का उद्देश्य मनुश्य की मनावैज्ञानिक अवश्यकताओं की पूर्ति करना, नाना प्रकार की सांसारिक चिताओं से उसका ध्यान हटाना तथा एक प्रकार के प्रेमोन्माद की दशा में खुदा के नूर को देखना था। इस आन्दोलन ने इतना जोर पकड़ा कि इसके 70 सम्प्रदाय हो गये जो एक दूसरे से कार्य प्रणाली में विभिन्न थे परन्तु उनके उद्देश्य एक ही थे। इनमें से चार सम्प्रदाय के रहमानियां, रफाइया मौलथिया तथा निश्तिया सर्वाधिक प्रसिद्ध है। प्राणायाम तथा योगासन रहमानियाँ सम्प्रदाय के अनुष्ठान के प्रमुख अंग है। इन पर भारतीय योगियों का प्रभाव स्पश्ट परिलक्षित होता है। इस सम्प्रदाय के मठ, अलजीरिया और चीन में पाये जाते है। रफाइया या आत्म पीड़क अपने को चाकू और लोहे की लाल-लाल सलाखों से छेदते है तथा साथ ही साथ प्रेमोन्माद की दशा में जोर-जोर से अल्ला का नाम भी लेते जाते है। वे शारीरिक यातना द्वारा ईश्वर की प्राप्ति में विश्वास रखते है। मौलविया या नाचने वाले दुरवेश सांसारिक सौन्दर्य को ईश्वरीय सौन्दर्य का प्रतिबिम्ब मान कर खुदा के नूर को हुस्ने बुताॅ के परदें में देखते है। वे संगीत तथा नृत्य द्वारा ईश्वर का साक्षात्कार करते है। कहा जाता है कि इस्लामी संसार के सर्वश्रेष्ठ रहस्यवादी कवि मौलाना जाललुद्दीन रूमी ने इस सम्प्रदाय की स्थापना तुर्की स्थित कोनियाँ नामक स्थान पर की थी। इस सम्प्रदाय का मूल मंत्री निम्नलिखित पंक्तियों से प्रकट होता है।
करूं में सिज़दा बूतों के आगे,  
तू ऐ बरहमन खदा-खुदा कर।


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