छब्बीस जनवरी आयी

नव वर्ष सुमंगलमय हो छब्बीस जनवरी आयी।
ध्वज-रोहण गाँव-नगर में फिर याद आयी।
कितने वीरों ने हंसकर जीवन बलिदान किए हैं।
कितनी मांगे उजड़ी हैं कितनों ने लाल दिए हैं।
दासता-तमी का सूरज इनका सुआत्मिक बल है।
यह शुभ गणतंत्र इन्हीं के तप और त्याग का फल है।
श्रद्धा सुमनों की अंजलि भर भावों ने बरसायी। 
पाकर खुशियों की सरिता बह प्रेम का सागर।
जैसे ऊषा! भरती है तमजल से अपनी गागर।
जीवन प्रभात बन चमका सत्कर्मो की भक्ति से।
जन-जन में भाव-एकता जगता श्रद्धा-भक्ति से।
प्रेमाश्रु भरे आँखों में भारत माता मुस्कायी।
अनुपम स्नेहल समता की मिल-जुलकर फसल उगायें।
वसुधैव कुटुम्ब भावना सारे जग में फैलायें।
आडम्बर-दुराचार की आँधी से मत घबरायें।
रूढ़ियाँ भेद-भावादिक, सामाजिक-शाप मिटायें।
चिर परिचित यह संदेशा प्रति सम्वत् पड़े सुनायी।
श्रम माान की सुशक्ति का व्यापार नहीं तो क्या है?
संकल्प सत्य-कर्मो का आधार नहीं तो क्या है?
हम अपने भाग्य-विधाता सत्कर्म-लेखनी ले लें।
सतत् निष्काम-भाव से लिख जीवन-नैय्या खे लें।
हर समय रहेगी बजती पौरूष-प्रताप-शहनाई।