धनुष यज्ञ प्रसंग

दिव्य प्रेम सेवा सदन हरिद्वार के तत्वाधान में रिफार्म क्लब में आयोजित रामकथा के चैथे दिन कथाव्यास शान्तनु जी महराज ने गुरु विश्वामित्र के सानिध्य में धनुष यज्ञ प्रसंग का तात्विक विवेचन प्रस्तुत किया। उन्होंने कहाकि माँ जानकी भक्ति स्वरूपा हैं और भक्ति को गुरु की कृपा और गुरु के सानिध्य से ही प्राप्त किया जा सकता हैं इसीलिए भगवान श्रीराम जनकपुर में आयोजित धनुष यज्ञ में गुरु के साथ ही पहुंचते हैं और साक्षात् भक्ति स्वरूपा माँ जानकी का वरण करते हैं। 
 शान्तनु जी महराज ने कहाकि भगवान श्रीराम और माँ जानकी अपनी तरूणावस्था में गुरु के सानिध्य में रहते हैं। मानव जीवन में यह आयु अत्यन्त महत्वपूर्ण और संवेदनशील होती है। इस आयु में बालकों को गुरु के अनुशासन और बालिकाओं को माता गौरी के पूजन को अपनाना चाहिए। उन्होंने कहाकि गुरुजनों और अभिभावकों को उचित अवसर पर संतानों को मानवता और वैदिक जीवन के संस्कार देना चाहिए। इन्हीं संस्कारों से भावी पीढ़ी के जीवन में आनन्द, उमंग, संवेदना और सहजता प्राप्त होती है। 
 उन्होंने कहाकि मनुष्य के जीवन मंे काम, क्रोध, मोह, लोभ, मद, मत्सर आदि उसके अन्तस्थ शत्रु हैं। इसके साथ ही बुद्धि भी मनुष्य को नचाती है, भ्रमित करती है, मोह आदि उत्पन्न करती है। इसलिए सिर्फ बुद्धि पर ही भरोसा नहीं करना चाहिए। बुद्धि के साथ विवेक और विवेक के साथ सत्संग और सत्संग से प्राप्त रामकृपा ही जीवन में कल्याण करती है। यदि जीवन में कोई पाप हो जाये तो छिपाना नहीं चाहिए उसे गुरु या गुरु जैसे शेष जन के समक्ष प्रकट कर पश्चाताप् करना चाहिए। उन्होंने कहाकि छिपाने से पाप भारी होता है और गाने से पुण्य क्षीण होता है। 
 इस अवसर पर शिवम् सिंह, दिनेश सिंह, देवर्षि तलरेजा, एसपी सिंह सभासद, राघवेन्द्र, प्रदीप, राजेश, अजय, अंकित, ज्ञानेन्द्र, राहुल, विजय आदि उपस्थित रहे।