आयुर्वेद का आयना

प्राचीन ऋशियों ने ज्योतिष के कुछ आधारभूत सिद्धान्तों को आयुर्वेद से मिला कर कुछ खान पान और आहार विहार के कुछ नियम जनहित मे बनायंे थे जिनको 16 वीं सदी के महान ज्योतिषी घाघ ने अपनी कहावतों मे सम्मलित किया है। इन सिद्धान्तों को सदियों तक लाखों वैघों और करोंड़ों लोगों ने आजमा कर अपने आप को स्वस्थ रखा है। कुछ प्रमुख सिद्धान्त निम्नलिखित है।
चन्द्रमास और हानिप्रद खानपान
चैते गुड़ वैसाखे तेल जेठ मे पंथ आसाढ मे बेल।
सावन साग ना भादों दही, क्वारे दूघ न कातिक मही।।
अगहन जीरा पूश घना माघे मिश्री फागुन चना।
चन्द्रमास और लाभप्रद खानपान
सावन हरें भादों चीता, क्वार मास गुड़ खाहू मीता।
कातिक मूली अगहन तेल, पूस मे करे दूघ सो मेल।।
माघ मास घी खिचरी खाय, फागुन उठि के प्रात नहाय।
चैत मास मे नीम सेवती, वैसाखहि मे खाय बासमती।।
जेठ मास मे जो दिन सोवे, ताको जुर आषाढ मे रोवे।।
कुछ मास मे कुछ पदार्थ निषिद्ध
क्वार करैला, चैत गुड़, भादौ मूली खाय।
पैसा खरचे गांठ का, रोग बिसावन जाय।।
गहरे जख्म या कटे अंग मे-
घाव या कटे अंग को सीधा करके सेम के पत्तियों की पुल्टिस लगा कर पटट्ी बंाध दें। घाव या अंग जुड़ जायेगा। 
सेंहुआ में- भटकटैया के बीज और राई के बीज सम भाग लेकर उन्हें पीस कर सेंहुआ मे कुछ दिन लगाने से सेंहुआ ठीक हो। 
बलतोड़- तुुकमलंगा के चैथाई चम्मच बीज पानी मे आधे घंटे भिगो दें वो लुगदी सी बन जायेगी उस लुगदी को बलतोड़ पर रख दे। एक दो दिन मे बलतोड़ अपने आप कील सहित बाहर आ जायेगा एक प्रयोग तब तक दोहरायें जब तक बलतोड़ जड़ से समाप्त ना हो जाये।
पेचिश-50 ग्राम दही मे दो चम्मच ईसबगोल की भूसी मिला कर फूलने को रखे दें करीब दो घंटे बाद खायें इसे सुबह दोपहर शाम तीन बार लें। आराम होने तक लेते रहें।