संपत्ति विनाश के योग

मनुष्य को संपति से संबधित अनेकों समस्याओं का सामना करना पड़ता हैं। जैसे संपत्ति विहीन होना, अति थोड़ी संपत्ति होना, संपत्ति का विभाजन होना, जब्त होना, बिक जाना, किसी सरकारी परियोजना मंे निकल जाना, संपत्ति का विवादग्रस्त या मुकदमाग्रस्त हो जाना, किरायेदारी में फंसना, संपत्ति से भारी आय ना होना, कई पीढी तक संपत्ति का विभाजन ना होना। संपत्ति क्रय-विकय में धोखा मिलना, कर्जग्रस्त संपत्ति। तृतीय भाव नाना की संपत्ति तथा पैत्रिक संपत्ति के विभाजन का है। चतुर्थ भाव वर्तमान संपत्ति के हैं। तृतीय भाव संपत्ति विनाश व यदि चतुर्थेश त्रिक में होे तो मकान या भूमि अति विलंब से प्राप्त होगी। 
 संपत्ति विनाश के योग:-यदि चतुर्थेश त्रिक भाव में पापग्रह युत हो तो जातक संपत्ति विहीन या समस्याग्रस्त संपत्ति का स्वामी हो। चतुर्थेश तृतीय में संपत्ति विभाजन में फंसे। चतुर्थेश षष्ठ में या षष्ठेश चतुर्थ में हो संपत्ति किराये की या मुकदमा ग्रस्त हो या अति छोेटी हो। यदि चतुर्थ भाव या चर्तुर्थेश पापकर्तरी, पापयुत या शत्रु राशि में हो या नीच, अस्त या वक्री हो। चतुर्थ भाव में पापग्रह हों या पापदृष्टि हो। चतुर्थेश पापग्रह की राशि या पाप नवांश में हो तो संपत्ति नष्ट हो। यदि लग्नेश चतुर्थेश से युत होकर नीच, शत्रु राशि या त्रिक भाव में हो तो संपत्ति नष्ट हो। शुक्र द्वितीयेश होकर राहू-केतु से युत हो तो संपत्ति नष्ट हो। चतुर्थ भाव पर पाप प्रभाव संपत्ति विहीन हो।  शनि नवांश लग्न में उच्च का हो तथा जंमाक चक्र में शनि नवमेश से 8 वें में हो तो संपत्ति नष्ट होगी।
संपत्ति विक्रय योग-2,500 वर्ष पुराने ग्रन्थ 'ज्योतिषार्णवम नवनीतम' जो आर. संथानम द्वारा अनुवादित है। में संपत्ति विक्रय के यह योग दिये हैं।
1. चतुर्थेश द्वितीय भाव में पापग्रह सें युत हो। 
2. चतुर्थेश नीच का हो।
3. चतुर्थेश शत्रु राशि में बिना शुभ प्रभाव के हो।
4. चतुर्थेश उच्च का होकर पापग्रस्त हो।
5. केरलीय जातक के अनुसार चतुर्थेश नीच का हो या शत्रु राशि में हो और द्वितीयेश द्वादश में हो तो संपत्ति बिकेे। यदि चतुर्थ भाव व अष्ठमेश दोनो पापग्रस्त हों या त्रिक भाव मे नीच या शत्रु राशिगत हों तो संपति मे अदृश्य बाधायें होती है।
6. यदि चतुर्थ भाव मे सूर्य या चन्द्र राहू केतु से युत हों या चतुर्थेश, वक्री,या पापकत्र्तरी मे हो।
7. चतुर्थ भाव व चतुर्थेश निर्बल व पापकत्तरी मे हो।
विभाजन-चतुर्थेश तृतीय में बंटवारा हो या चतुर्थेश त्रिक में हो या चतुर्थेश षष्ठेश या अष्ठमेश से युत या दृष्ट हो तो संपत्ति का विभाजन होगा।
8. यदि चतुर्थ भाव व अष्ठमेश दोनो पापग्रस्त हों या त्रिक भाव मे नीच या शत्रु राशिगत हों तो संपति मे अदृश्य बाधायें होती है।
9. चतुर्थ भाव व चतुर्थेश निर्बल व पापकत्र्तरी मे हो।
10. मंगल-शनि चतुर्थ भाव मे हो तथा चतुर्थेश व अष्ठमेश पापग्रस्त हों। जातक के संबधी व अन्य लोग उसकी संपति हड़प 
11.मंगल भूमिपुत्र है। भूमि कारक मंगल व भवन कारक केतु है। 
12. मंगल-शनि चतुर्थ भाव मे हो तथा चतुर्थेश व अष्ठमेश पापग्रस्त हों। जातक के संबधी व अन्य लोग उसकी संपति हड़प लें।
13. चतुर्थ भाव मे कालसर्प योग हो।
14. कही भी मंगल-राहू या बुध राहू योग हो। 
15. जमंाक मे मंगल नीच का होकर शनि राहू से युत हो या जमंाक मे बुध-मंगल, बुघ-चन्द्र, बुघ-केतु योग बुध नीच का हो।
16. चतुर्थ भाव मे मांदि हो या मांदि चतुर्थंेश या बुध, शुक्र, या मंगल से युत हो। बुघ केतु शुक्र युति से राहू का गोचर 29 या 30 वर्ष मे छोटे भाई या बहन से संपत्ति का विवाद होगा। बुघ राहू योग से शनि का गोचर जातक के पास एक पुरानी विवादित भूमि या संपत्ति होगी। शनि के गोचर मे उस पर मार्केट काम्पलैक्स बनेगा। केतु बुध मुकदमा अति तनाव व  जाायदाद से दुःख दे शनि, बुध, केतु योग मे बुध से ष्शनि गोचर 30 वर्ष मे व तृतीय भाव मे शनि गोचर भूमि विवाद हो। जातक के पास अति पुरानी पुश्तैनी जमीन या जायदाद होगी जो कई  लंबी झगड़ों या समस्याओं से ग्रस्त होगी मंगल गुरू जायदाद मे झगड़ा व मुकदमे । मंगल बुध योग जमीन जायदाद से युत हो जायदाद मे झगड़े हा,चन्द्र-बुध जमीन जायदाद से युत हो जायदाद मे झगड़े हो भूमि कारक मंगल व भवन कारक केतु है। यदि मंगल, केतु का शत्रु शनि से या चतुर्थ भाव से संबध हो तो भूमि, व भवन का विनाश होगा। कुछ ग्रन्थों में मंगल, भूमि, खेत, केतु बंजर भूमि, शुक्र मकान बुघ प्लाट व लद्यु घर और राहू खंडहर को बताता है। चतुर्थेश नीच, त्रिक मे या शत्रु राशिगत हो तो संपत्ति नष्ट हो। यदि उस पर दशमेश, सूर्य, मंगल का भी प्रभाव हो तो सरकारी आदेश से संपत्ति नष्ट या जब्त हो।
12. यदि चतुर्थांश चक्र का चतुर्थेश यदि पापग्रस्त होकर  द्वितीय भाव मे हो तो संपत्ति बिके । यदि चतुर्थांश चक्र के धनेश व द्वादेश का परस्पर संबध हो तो संपत्ति बिक जायेगी। द्वितीय भाव से प्राप्त होने वाली आय को षष्ठ भाव रोकता है। जो शत्रुता, प्रतियोगिता का भाव है। पंचम भाव संतान या सेवकों द्वारा संपत्ति का उपभोग बताता है। पंचम भाव के शुभ ग्रह संतान द्वारा संपत्ति के सुखपूर्वक उपभोेग व पाप ग्रह संपत्ति के दुरूपयोग को बताते है।