शनि की क्रूर दृष्टि पौराणिक संदर्भ

पुराणों और ज्योतिष शास्त्र के अनुसार शनि सूर्य की द्वितीय पत्नी छाया के पुत्र है, जो सूर्य के तेज को यह ना सकीं, और अलग रहने लगी वही शनि का जंम हुआ अतः सूर्य ने नाराज होकर उन्हें शाप दिया और शनि को अपना पुत्र मानने से इंकार कर दिया अपमान और शाप से भरे शनि सूर्य से शत्रुता रखने लगे ओर उन्हें पराजित और अपमानित करने का प्रयास करने लगे। 
शनि के संदर्भ मे पुराणें मे एक कथा पाई जाती है। के जब रावण का पुत्र पैदा हो रहा था तो केवल शुभ ही फल पाने के लिये रापण मे सभी ग्रहों को ग्यारहवें भाव मे रखने का प्रयास किया किन्तु किन्तु शनि ने अपना पैर 12 वें भाव मे रख दिया था क्योंकि 12 भाव मे शनि अशुभ फल देता है। देवता इसका महत्व समझ गये उन्होने शनि से प्रार्थना की कि वह अपना पैर 12 भाव मे ना पसारे बल्कि 11 वें भाव मे ही रखे, शनि ने देवताओं को साहस बंधाते हुये कहा कि वह अकेला ही रावण के विनाश के सारे कार्य कर सकता है, जिसे वह सर्वाधिक प्रयास करके करना चाहते है। इन्द्रजीत के जंम के बाद जब रावण को इसका पता चला तो उसने क्रोधित होकर शनि का पैर कटवा दिया जिससे शनि लंगड़े हो गये, और धीमी गति से चलने लगे। कहा जाता है कि हनुमान जी जब लंका पहुँचे उन्होने रावण के महल मे देखा कि शनि महाराज महल मे बंदी बने उल्टे टंगे हैं, हनुमान जी ने उनसे उनका परिचय प्राप्त किया शनि महाराज ने बताया कि मेरी अशुभ दृष्टि से बचने के लिये रावण ने मुझे उल्टा टांग दिया है, ताकि मेरी दृष्टि उस पर ना पड़े तुम मुझे मुक्त कर दो मेरी दृष्टि पड़ने से रावण का दुर्भाग्य आ जायेगा और भगवान राम की विजय निश्चित हो जायेगी हनुमान जी ने ऐसा ही किया और शनि की क्रूर दृष्टि पड़ने से रावण का पतन हो गया।
कहा जाता है कि एक बार हनुमान जी और शनि महाराज मे किसी बात को लेकर युद्ध हुआ जिसमे हनुमान जी के गदा प्रहार से शनि महाराज काफी घायल हो गये तभी एक किसान सरसों के तेल का पीपा लेकर उधर से निकल रहा था शनि महाराज को घायल देखकर उसने अपना सारा तेल शनि महाराज के घावों पर उड़ेल दिया जिससे उनकी पीड़ा शांत हो गई, शनि महराज ने ना केवल किसान को वरदान दिया बल्कि सारे सेसार मे घोषणा की कि जो मनुष्य मुझ पर सरसों का तेल चढायेगा उसे मेरी दशा मे कष्ट नही होगा।