शनिदेव दयालु भी है


भारतीय दर्शन मे शनिदेव को एक क्रूर ग्रह माना गया है, शनि को आम जनता के बीच इतना आंतक है कि यदि भूले-भटके भी घर, परिवार, शरीर मे कोई अनिष्ट हो जाये तथा कोई पंडित, ज्योतिषी इसे शनि का दोष बता दे, घर मे सबको सांप सूंघ जाता है। हजारों भयानक  अनिष्ट कर कल्पनायें उसे अंदर तक झझकोर देती है। शनिदेव की क्रूरता के हजारों लाखों किस्से जनता मे प्रचलित है। कहा जाता है कि भगवान राम व श्रीकृष्ण भी शनि के कोप से नही बच सके थे लेकिन मथुरा मे श्री कृष्ण जंमभूमि नंदगांव से चार किलोमीटर दूर गंाव के पास एक स्थान पर एक ऐसा शनि मंदिर है जहां शनि कृपालु और दयालु रूप मे विद्यमान है। यहां का शनि मंदिर करीब तीन किलोमीटर के दायरे मे फैला हुआ है यहाँ के शनि स्थान व मूर्ति की इतनी अधिक मान्यता है। कि हर शनिवार दूर-दराज के करीब पचास हजार मे भी अधिक श्रद्धालु यहाँ शनिदेव के दर्शन के लिये आते है। भक्त यहां के सूर्य कुंड मे स्नान करके मंदिर मे उड़द, तेल, लोहा व काले कपड़े का दान करते है। तथा विस्तृत क्षेत्र मे फैले मंदिर की परिक्रमा करते हैं। पौराणिक एवं ज्योतिषीय मान्यता के अनुसार शनिदेव भगवान सूर्य व उनकी द्वितीय पत्नी छाया के पुत्र है। पत्नी के शाप के कारण वह क्रूर हो गये और माता पार्वती के शाप के कारण लंगड़े हो गये चँुकि उन्हें खंज या खाज का रोग हो गया था अतः वे काले रंग के, शूद्रवर्ण और सूर्यमुख माने गये हैं उनका वाहन गिद्ध है। इन्ही की दृष्टि पड़ने के कारण श्री गणेश जी का सर कट कर गिर गया था जिससे रूष्ट होकर माता पार्वती ने इन्हें शाप दे दिया था फलतः शनिदेव लंगड़े हो गये थे।
 माता पार्वती ने इन्हें शाप दे दिया था फलतः शनिदेव लंगड़े हो गये थे कोकिला वन मूलतः ब्रज क्षेत्र का एक उपवन है। जिसकी गणना ब्रज के चैबीस उपवनों मे की जाती है। कोकिला वन का वर्णन गर्ग संहिता मे भगवान कृष्ण की रासलीला के अन्र्तगत आता है जनश्रुति है। कि रास लीला के समय एक बार स्वयं भगवान कृष्ण ने कोयल की तरह कूक कर लीला की थी तथा प्राचीन काल मे यहाँ चारों तरफ निबिड़ घोर जंगल था जिसके वृक्षों पर कोयलों की बहुतायत थी लोक कथा के अनुसार भगवन विष्णु के अवतार श्री कृष्ण के बाल रूप के दर्शन हेतु सभी देवता, सिद्ध, यक्ष. किन्नर, गंधर्व आदि सभी पहुचें तब शनिदेव भी पहुंचे तो शनि की क्रूर दृष्टि की आशंका के कारण माता यशोदा ने श्रीकृष्ण के दर्शन कराने से मना कर दिया तब भगवान कृष्ण ने अपने दिव्य रूप मे प्रकट होकर उनसे कहा कि वे नंद भवन से उत्तर दिशा मे निवास करें वहां उनके मनोरथ के लिये वे कोयल बन कर अप्रकृट रासलीला करेंगें और शनिदेव कूक सुनकर ही रासलीला का आनंद लेंगें तब से शनि यहीं विराजित है। और कृष्ण की 'नित्य निकुंज' रासलीला का आनंद लेते है यही कारण है। कि शनि देव ब्रजभूमि मे क्रूर ना होकर भक्त रूप मे विराजते हैं। और अपने श्रद्धालुओ पर कृपा बरसाते हैं। इस शनिदेव की प्रतिमा की स्थापना भरतपुर नरेश के राजपुरोहित प. रूपराम कटारा द्वारा की गयी थी। यहां शनिदेव जी की प्रतिमा काले रंग की छोटी सी है। इस प्रतिमा मे शनिदेव भैंसे पर सवार हैं। जो विलक्षण है। यहां के सूर्य कुंड का निर्माण ओरछा के राजा वीर सिंह जूदेव द्वारा 16 वीं सदी मे करवाया गया था कहा जाता है कि इस कंुड मे स्नान करने से खाज, खुजली, कोढ आदि रोग नष्ट हो जाते हैं।