और वे हवा मे गायब हो गये

स्वराज पत्रिका के संपादक महावीर प्रसाद त्रिवेदी ने सन 1895-96 मे अलौकिक घटनाओं को संकलित करते हुये एक अद्भुद ग्रन्थ अद्भुद आपाल लिखा था  जिसमे श्री त्रिवेदी जी ने मिरजापुर  के परगनाधीश सैमुअल डफ के संस्मरणों पर आधारित उनके एक अलौकिक अनुभव का वर्णन किया है। सन 1875 मे डफ साहब मिरजापुर जिले के परगनाधीश बन कर आये थे इसके पूर्व वह गाजीपुर और बलिया के प्रशासक थे उनके भीतर भारत की रहस्यमय घटनाओं और एन्द्रजालिक विद्या को देखने जानने की बड़ी ललक थी सन 1876 की सर्दियों की एक सुबह वे अपने बंगल के लाॅन मे बैठे कुछ कागज देख रहे थे तभी उन्हें अर्दली ने सूचना दी कि बाबू बेनी माधवदास मिलने आये है। डफ साहब ने तुरंत उन्हें अपने पास बुला लिया वे बोले आपने मुझसे हिन्दुस्तान की पुरानी विद्या का चमत्कार देखने की ख्वाहिश की थी आज मै आपको एक नायाब करिश्मा देखने का निमत्रंण देने आया हूँ कैसा तमाशा हवा मे उड़ने का और पानी मे चलने का कहाँ गंगा के किनारे पत्थर घाट पर वे दोनो दोपहर दो बजे वहाँ पहुँचे वहाँ तिमुहानी के हजारों लोग भी आये थे एक किनारे पर तीन कनातें लगी थीं डफ साहब भी कनात के पास आकर बैठ गये तमाशा दिखाने वाला एक पचास वर्षीय ब्राह्मण शिवशंकर पांडे और उसका 15-16 साल का लड़का केदार था जो टीकमगढ मध्य प्रदेश के निवासी थे उन्होने वहीँ सोनगढ मे औघड़ विद्या सीखी थी कनात तीन तरफ से बंद थी चैथी तरफ से खुली थी जहाँ परदा लगा था सबको सिर झुका कर शिवशंकर अंदर गया परदा उठा तो सबने देखा कि केदार एक तिपाई के उपर कपड़े के मोटे गददे पर बैठा है। तिपाई बांस की थी तीनों बांस अलग थे जिन्हें आपस मे बांध दिया गया था बांसों के उपर निकले भागों पर गददी रखी हुयी थी केदार के दोनो हाथ देह के बांये दांये भाग मे फैले हुये थे हाथों के नीच ेभी एक एक बांस था ये बांस तिपाई के बांस से लंबे थंे जो जमीन पर गड़े नही बल्कि खड़े थे केदार के सिर और कंधों पर काला कपड़ा पड़ा था तभी डफ साहब ने देखा  कि शिवशंकर ने तिपाई के तीनों बांस एक एक करके अलग खींच दिये केदार अब गददी पर पालथी मारे हवा मे लटका था उसका आसन जमीन से चार फुट उपर हवा मे था पांडे जी ने एक हाथ के नीचे का बांस भी हटा कर हाथ को उसके सीने पर रख दिया डफ साहब समेेत हजारों लोग स्तब्ध रह गये डफ साहब बेनी बाबू के साथ लड़के के पास छह ईंच की दूरी तक गये उपर नीचे जाकर सब ओर से पूरी तरह से जांच की पर कहीं कोई धोखा तार या आधार नहीं था शिवशंकर ने आखिरी बांस भी हटा कर वो हाथ भी लड़के के सीने पर रख दिया उफ साहब ने लड़के के चारों और उपर नीचे छड़ी घुमा कर देखा कोई आधार नही मिला कुछ देर बाद परदा गिरा लड़का और ब्राह्मण बाहर आये डफ साहब के ठीक सामने गंगा नदी तक सीढियां बनी थीं तभी शिवशंकर अपने पुत्र सहित गंगा मे उतर गया उसने बेटे सहित मुस्करा कर डफ साहब को हाथ हिला कर अभिवादन  किया वे पानी पर ऐसै चलने लगे जैसे जमीन पर चल रहे हो गंगा के बीच मे पहश्ुच कर दोनो ने डफ साहब को मुस्कराते हुये हाथ हिला कर अभिवादन पुनः किया डफ साहब ने भी हाथ हिला कर जवाब दिया डफ साहब ने देखा कि वे दोनो हवा मे कुछ उपर उठे और देखते देखते हवा मे विलीन हो गये घाट पर खड़ी भीड़ मे कोहराम मच गया हजारों लोग पानी मे उतर गये पर केदार और शिवशंकर विलुप्त हो चुके थे चमक रहा था तो केवल गंगा का सुनहरा पानी डफ साहब ने पूछा कि वे लोग कहां गये बेनी बाबू ने कहा कि वे इसी दुनिया मे है। उसी विद्या से कभी ना कभी प्रकृट हो जायेगंे इस घटना के बाद डफ साहब जब 1882 मे मेरठ डिवीजन के कमिश्नर के रूप मे गढ मुक्तेश्वर गये थे तो उनकी मुलाकात एक बार फिर शिवशंकर और केदार से हुयी थी पर डफ साहब के बार बार पूछने पर भी उन्होने हवा मे उड़ने और पानी मे चलने व गायब हो जाने का रहस्य डफ साहब को नही बताया सेठ बाबू बेनी माधवदास उर्फ नाबालिग साब कलकत्ता की स्टीमर बनाने वाली मशहूर फर्म रैली बद्रर्स के मिरजापुर के ऐजेन्ट थे सेठ जी ने खूब पैसा कमाया था उन्होने 1872 मे गंगा नदी पर घाट भी बनवाये थे जो आज भी कायम है।