गणेश स्तूप

इन महान अनोखे ज्योतिषी, संत, शिव व देवी दुर्गा साधक, सिद्ध पुरूष पं. गणेश नारायण का जंम राजस्थान के झंुुझनु जिले के बुगाला गांव मे एक समृद्ध रूथला खण्डेलवाल ब्राह्मण, विद्वान वैद्य और नवलगढ के राज ज्योतिषी पं. घनश्याम दास नामक के घर विक्रम संवत 1903 पौष मास की कृष्ण पक्ष प्रतिपदा गुरूवार रोहणी नक्षत्र चतुर्थ चरण मे तदनुसार दिनांक 3 दिसम्बर 1846 को हुआ उनकी चन्द्र कुण्डली इस प्रकार है। वृष लग्न मे चन्द्र व गुरू वक्री, तुला मे मंगल व राहू, वृश्चिक मे सूर्य व शुक्र धनु मे बुध वक्री  कुंभ मे शनि मेष मे केतु। जंम के बाद आपके पिता नवलगढ मे द्वारिकाधीश मंदिर मे व्यस्थापक हो कर वही बस गये उनकी प्रारंभिक शिक्षा प. रूदेन्द्रजी द्वारा संचालित पाठशाला मे हुयी जिन्होने गणेशजी को ज्योतिष, आयुर्वेद, कर्मकांड और तंत्र मंत्र मे दक्ष कर दिया उन्ही दिनो एक बार जब घनश्याम जी किसी काम से बाहर गये हुये थे तो गणेश जी के चाचा नानकराम का छोटा बेटा बीमार पड़ गया तो चाचा ने गणेश जी से कहा जरा इसकी जंम पत्री देख कर बताओं कि ग्रहों का क्या चक्क्र है। 10 वर्षीय बालक गण्ेाश जी ने गणना करके बताया कि कल दोपहर तक और जीयेगा यह सुनते ही घर मे रोना पीटा शुरू हो गया तभी प. धनश्याम जी भी आ गये सारी बात जान कर क्रोधित होकर बोले गणेश क्या जंमपत्री देखेगा कल ही तो मैने उसे सिखाया है। प. घनश्याम ने स्वयं लड़के की जंमपत्री देखी सचमुच मारकेश लगा हुआ था लड़का अगले दिन बारह बजे चल बसा 11 वर्ष मे 1857 मे उनकी सगाई गोपी नाथ मंदिर के पुजारी जोधराज की पोती व प. चतुर्भज की पुत्री श्यानन्दी देवी के साथ हो गई दो साल बाद 1859 मे आपका विवाह हो गया 1874 मे गणेशजी को एक पुत्र हुआ जो एक साल मे मर गया फिर दो पुत्रियां हुयी जीवन के उत्तरार्ध मे आपने शमशान काली की सिद्धि प्राप्ति की माँ के आदेश से वे भगवान शिव के अघोर रूप की साधना करने लगे आपके मुँह से जो भी बात निकल जाती थी वो सच हो जाती थी उस जमाने के जानी मानी हस्तियां उनकी शिष्य बन गई थी थी जिनमे पिलानी के जुगल किशोर बिड़ला भी थे आप योग बल से कभी शेर तो कभी साँड़ का रूप धारण कर लेते थे एक बार गणेशजी चिड़ावा के शमशान मे बैठे थे तभी पिलानी से जुगल किशोर मिलने आ गये उन्हें देखते ही पंडित जी ने कहा रे जुगल्या आज तो तेरे चोखो दिन छ। करणी वरणी चालु रखा जे। जाज्या (अरे जुगल आज तेरा अच्छा दिन है। भवन निर्माण और ब्राह्मण द्वारा पूजा बराबर चालू रखना जा भाग जा) बिड़ला जी समझ गये कि अच्छा मुहूर्त है। उन्होने सीधे कलकत्ता जाने का विचार किया और अपना रथ नारनौल स्टेशन के रास्ते हंकवा दिया चाँदनी रात थी बिड़ला जी का रथ थोड़ी ही दूर गया था कि रास्ते के दांये ओर उन्हें एक काला सांप फन उठाये दिखाई दिया जुगल जी इसे अपशकुन समझ कर वापस पंडिती जी के पास लौट आये बिड़ला को देखते ही पंडितजी ने लौट आने का कारण पूछा उन्होने सर्प मिलने की बात बताई पंडित जी बोले रे जुगल्या तू तो गलती करी छ। तू चल्यो जातो तो चक्रवर्ती वण जातो जा अब भी तेरी कीर्ति सार फैल ज्यागी जुगल किशोर कलकत्ता चले गये और समय के साथ उन्होने ईतना पैसा और यश कमाया कि भारत ही नही बल्कि विदेशों मे भी प्रतिष्ठा पाई पंडितजी अक्सर चिड़ावा के नेमानी मोहल्ले के प्रहलाद राम नेमानी की दुकान पर बैठते थे एक दिन पंडित जी वहाँ आ गये उन्होने नेमानी से कहा ला कागज दे तेरे लड़के की जंमपत्री बना दूँ। नेमानी चैंके क्योकि उनके कोई लड़का नही था उन्हें कलम कागज दिया गया तो पंडिती जी ने जंमपत्री बना कर लड़के का नाम कैलाशेश्वर रखा एक वर्ष बाद नेमानी को पुत्र हुआ तो पुजारी कालीचरण ने बालक की जंमपत्री बनाई वह जंमपत्री पंडितजी द्वारा बनाई जंमपत्री से अक्षरशः मेल खा गई पंडित जी ने 1912 मे गुरूवार को ही शरीर त्यागा उनके दाहस्थल पर ही लोगों ने उनका एक मंदिर बनवाया और बिड़ला जी ने पंडित जी के मंदिर के पास ही उनका एक विशाल स्तूप बनवाया जो गणेश स्तूप के नाम से प्रसिद्ध है।