सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

व्यक्ति कांटों को फूल बना सकता है

जरा सोचिए, कहाँ मगध राज दरबार में खड़ा एक निर्बल और अपमानित ब्राहमण और कहाँ वहीं ब्राहमण, जो भारतीय इतिहास के स्वर्ण काल का अग्रदूत और प्रणेता, जो चन्द्रगुप्त मौर्य के साम्राज्य की रीढ़ बन गया, ‘चाणक्य’!    
रेल के पहले दर्जे से मात्र रंग के आधार पर फेंका गया एक वकील और वहीं व्यक्तित्व जिसके चुम्बकत्व में लाखों भारतीयों को अंग्रेजों के दमनकारी हथियारों के सम्मुख निहत्था खड़ा कर दिया, गांधी’! रास्ता चाहे जो भी हो, इतिहास इन्हें चाहे नायक बनाये या नहीं, वास्तविक जीवन से उठाये गये ये दोनों चरित्र कहीं न कहीं अपमान की अग्नि में सुलग रहे थे, अपमान की इसी अग्नि को धैर्य, परिश्रम और सतत् संघर्श की भट्टी में डालकर विजय के महायज्ञ को लगन रूपी ईधन से प्रज्ज्वलित करके ऐसे ही चरित्रों में अन्ततः नये इतिहास की रचना। सम्मान, सुख या किसी आधारभूत आवष्यकता से वंचित होने को यदि लगन बनाकर सफलता के निरन्तर प्रयास किये जायें तो असफलता की संभावना षून्य हो जाती है और संघर्ष से दुर्गम मार्ग भी सरल लगने लगते हैं। मनोवैज्ञानिक दृष्टि से सफलता एक स्वप्न है और असफलता यथार्थ, मानव इतिहास की महानतम उपलब्धियाँ यथार्थजनित पीड़ा को जीतकर स्वप्न विजित करने की प्रक्रिया है। लेकिन आज यह मिथक बदल गया क्योंकि मेरे अनुसार, ्कष्ट, पीड़ा को अपनाकर व्यक्ति कांटों को फूल बना सकता है। जीवन में सुख ढूंढ़ने वाले संतोषी व्यक्तियों से सदैव बचना चाहिए, क्योंकि एक संतोषी व्यक्ति उस पत्थर के समान हैं, जिसमें योग्यता का भार तो है, परन्तु लक्ष्य तक पहुँचने की क्षमता नहीं है। भारतीय वेदान्त को आधुनिक युग में उचित संघर्ष से दुर्गम मार्ग भी सरल लगने लगते हैं संघर्ष से दुर्गम मार्ग भी सरल लगने लगते है संघर्ष से दुर्गम मार्ग भी सरल लगने लगते हैं प्रतिष्ठा दिलवाने वाले स्वामी विवेकानन्द के हृदय की पीड़ा ही थी, जिसने पश्चिमी परतन्त्रता में जकड़ी और तत्कालीन पश्चिम आयातित इतिहास में जंगली और असभ्य समझी जाने वाली हिन्दू सभ्यता हिन्दू सभ्यता के दर्शन को शिकांगो के विश्व धर्म सम्मेलन में सिरमौर बनाया था, यह स्वामी विवेकानन्द जी का कष्ट ही था, जो पहले छवि सुधार के उद्देश्य रूप में अनुवादित हुआ और अन्ततः सांस्कृतिक आत्म-सम्मान के प्रतीक के रूप में परिलक्षित हो गया। ‘कर्मण्येवाधिकारस्ते...’ की मूल भावना के विपरीत श्रीमद्भगवतगीता में एक स्थान पर कर्म, अकर्म और विकर्म को परिभाषित किया गया है, जो कर्म किसी आकांक्षा या फल की इच्छा के बिना किया जाता है, वह अकर्म है, कर्म के अन्दर उद्देश्य निहित होना आवश्यक है। उद्देश्य या लक्ष्य से दूरी ही पीड़ी है और वही लक्ष्य प्राप्ति की लगन भी है। विपत्ति काल में हृदय को कवलित करने वाले विचार लम्बे समय तक मस्तिष्क पटल पर अंकित रहते हैं। वंचित होने की टीस भी एक शाश्वत विपत्ति है। आवश्यकता है सकारात्मक प्रेरणा ग्रहण करने की। पहली फ्लाइंग मशीन का अविष्कार करने वाले राइट बन्धु अपने पहले तीन अभियानों में असफल रहे और व्यंग्यवाणों का निशाना भी बने, परन्तु इस व्यंग्य वाणों को प्रेरणा बनाकर अन्ततः उन्हें सफलता भी मिली। सच तो यह है कि कष्ट के बिना लक्ष्य प्राप्ति भी संभव नहीं है और यदि कष्ट की अगन को परिमार्जित करके सतता का ईधन बना लिया जाये, तो सफलता अवश्यम्भावी है, आपके सपनों को सच होते देर नहीं होगी।


इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

पक्षी आपका भाग्य बदले

मनुष्य का जीवन अपने आसपास के वातावरण से ही प्रभावित होता है। व्यक्ति के आस-पास के पशु पक्षी उसके जीवन का अभिन्न अंग है। भारतीय ऋर्षियों तथा संसार के अध्यात्मवादियो ने संसार के पक्षियों को ना केवल ज्योतिष तथा मनुष्य के भाग्य से जोड़ा है। बल्कि पक्षियों को उपयोग शकुन ज्योतिष, फलित तथा प्रष्न ज्योतिष तथा अनेकों ज्योतिष, तांत्रिक उपचारों और शारीरिक मानसिक रोगों के निवारण में किया है। भारत मे पंच प़क्षी शास्त्र, कल्ली पुराण पर आधारित तोते द्वारा भविष्यवाणी, पक्षी तंत्र तथा शकुन ज्योतिष का प्रयोग आदिकाल से ही किया जाता है भारत मे गरूड़ जी, नीलकंठ, काकभुषुंडी,, हंस, जटायु व संपाती, शुकदेव जी आदि दिव्य पक्षियों तथा अनेक देवी देवताआंे वाहन के रूप मे पक्षियों को प्रयोग किये जाने का  वर्णन है। जैसे भगवान विष्णु का गरूड़, कार्तकेय जी का मयूर, माता लक्षमी का उल्लू, विश्वकर्मा, वरूण जी तथा स्वरसती जी का हंस आदि शनिदेव का कौआ आदि का प्राचीन काल मे पक्षियों द्वारा डाक सेवा युद्ध संबधी शकुन का भी काम लिया जाता था पक्षियों को स्वतंत्रता, नवीन विचारों, आनंद, तनाव, मुक्ति, प्रषंसा, यष, धन्यवाद देने, प्रजनन श

परिवर्तन योग से करें भविष्यवाणी

भारतीय ज्योतिशशास्त्र में भविष्यकथन के सैकड़ों सूत्रो का वर्णन है। इन्ही सूत्रों मे से एक है परिवर्तन योग जिसका वर्णन पाराशरीय और नाड़ी ग्रन्थों दोंनों मे पाया जाता है। हाँलाकि दोनो प्रकार के ग्रन्थों में इन सूत्रों को विभिन्न तरीको से प्रयोग किया गया है ज्योतिष मे परिवर्तन योग के तीन रूप पाये जाते हैं। 1. भाव परिवर्तन 2. राशि परिवर्तन 3. नक्षत्र परिवर्तन  भाव परिवर्तन पाराशरीय व कुछ नाड़ी ग्रन्थों जैसे षुक्र नाड़ी मे इसके सूत्रो का वर्णन पाया जाता है। जो भावा के स्वामियो के बीच स्थान परिवर्तन से बनता है। जैसे चतुर्थेश षष्ठ भाव मे जाय और षष्ठेश चतुर्थ भाव मे जाय। इसके भी तीन भेद हैं। 1. दो शुभ भावों के स्वामियों का परस्पर परिवर्तन जैसे लग्न व पंचम भाव का परिवर्तन या दो केन्द्रेशों का परिवर्तन या केन्द्र और त्रिकोण भाव मे परस्पर परिवर्तन। 2. दो त्रिकेशांे का परिवर्तन जो विपरीत राजयोग बनाता है। 3. किसी केन्द्रेश या त्रिकोणेश का त्रिकेश से परिवर्तन। जैसे दशमेश का द्वादेश से परिवर्तन या पंचमेश या द्वादेश के बीच परिवर्तन। 2. ग्रह या राशि परिवर्तन  इसका वर्णन स्व. आर. जी. राव द्वारा अनुवादित और

जेल जाने के योग

ज्योतिष शास्त्र अनुसार कुंडली के आठवें मतांतर से बारहवें भाव से कारावास तथा सजा का विचार किया जाता है। कुंडली के इस घर में राहु अगर अष्टमेश के साथ हो तो उसके अशुभ प्रभाव के कारण व्यक्ति को किसी बड़े अपराध के कारण जेल जाना पड़ता है। शनि  मंगल और राहू मुख्य रूप से यह तीन ग्रह एवम् इनका आपसी सम्बन्ध जेल के कारक है। शनि व 12 भाव सजा का कारक है। छठा भाव व मंगल राहू अपराध के कारक है। अगर किसी व्यक्ति की कुण्डली में मंगल और राहु एक साथ किसी भाव में बैठकर युति करते हैं तो जेल योग बनता है केतु रस्सी बेड़ी हथकड़ी का कारक ग्रह हैं अशुभ मंगल व राहु के बीच दृष्टि संबंध बनता हो तो अंगारक योग की वजह से ऐसा इंसान हिंसक स्वभाव वाला हो जाता है और अपराध करता है जिससे जेल जाना पड जाता है। शनि मंगल व राहु मुख्य रूप से जेल यात्रा कराने का भी योग बनाते हैं और इनकी युति या आपस में दृष्टि इस तरह की स्थितियां बना देती है कि आखिर इंसान को जेल जाना ही पड जाता है। जन्मकुंडली में सूर्यादि ग्रह समान संख्या में लग्न एवं द्वादश तृतीय एवं एकादश, चतुर्थ, दशम, षष्ठ एवं अष्टम भाव में स्थित हो तो यह बंधन योग बनाता है यह स्थिति