आशावादी विचारों को पूरा होते हुए देखती हैं नीना श्रीवास्तवः सागर

नीना मोहन श्रीवास्तव आशावादी हैं और अपने गीतों से आशा की उन्नति का द्वार खोलती हैं। वो अपने आशावादी विचारों को पूरा होते हुए देखती हैं, जब वो कहती हैं, ‘निशा की हार होती है और उषा की जीत होती है।’ यह बात वरिष्ठ सागर होशियापुरी ने शनिवार को साहित्यिक संस्था गुफ़्तगू के ऑनलाइन साहित्यिक परिचर्चा में नीना श्रीवास्तव की कविताओं पर विचार व्यक्त करते हुए कहा। कवि संजय सक्सेना के मुताबिक नीना मोहन श्रीवास्तव जी ने अपनी कविताओं में माध्यम से, समाज के लिये प्रकृति में छुपे हुए बिभिन्न संदेशो को बहुत सुंदर ढंग से उजागर किया है। जो समाज के लिये प्रेरणाश्रोत का काम करते है। उन्होंने अपनी कविताओं में जीवन दर्शन को भी स्पष्ट रूप से रेखांकित किया है। जमादार धीरज ने कहा कि मीना मोहन श्रीवास्तव भावुक रचनाकार हैं। सहज, सरल शब्दों मे कल्पना के पंख पर आसीन जीवन के विशेष कर नारी जीवन के ममतामय पक्ष को बड़े ही लालित्यपूर्ण ढंग से स्पर्श करतीं हैं। 
नोएडा की कवयित्री डाॅ. ममता सरूनाथ ने कहा कि नीना की कविताओं में आगे बढने का संदेश मिलता है। ‘मर्म यही है जीवन का बस  चलते जाना है’, ’करो मन न व्याकुल कभी प्रतिकूल’ के माध्यम से नीना जी ने समाज के निर्माण में कविता तथा कवियो का महत्व बडे ही सुन्दर शब्दों में बयान किया है।
उधमसिंह नगर की कवयित्री शगुफ्ता रहमान ने कहा कि नीना मोहन श्रीवास्तव ने अपनी विशिष्ट रचनाओं में प्रकृति में निर्बाध होने वाली नई क्रियाओं को सटीक रूप् को, गूढ़ शब्दों एवं सहज भाषा से मानव जीवन में उठने वाले उदगारों को परिलक्षित किया है। वास्तव में यही काव्य कला आपकी विद्वता को दर्शाती है। इनके अलावा मनमोहन सिंह तन्हा, ममता देवी, डॉ. शैलेष गुप्त ‘वीर’, ऋतंधरा मिश्रा, नरेश महारानी, अनिल ‘मानव’ और रचना सक्सेना ने भी विचार व्यक्त किया। संयोजन गुफ्तगू के अध्यक्ष इम्तियाज अहमद गाजी ने किया। रविवार को मनमोहन सिंह ‘तन्हा’ की पुस्तक ‘तन्हा नहीं रहा तन्हा’ पर परिचर्चा होगी।