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खड़ी बोली और लोक भाषा के महारथी हैं धीरजः सोम ठाकुर

साहित्यिक संस्था गुफ्तगू के ऑनलाइन साहित्यक परिचर्चा में वरिष्ठ कवि जमादार धीरज के काव्य संग्रह ‘भावांजलि’ पर साहित्यकारों ने अपने विचार व्यक्त किए। सुप्रसिद्ध गीतकार सोम ठाकुर ने कहा कि हिन्दी में ऐसे कवि बहुत कम हैं, जिनको खड़ी बोेली के साथ-साथ लोक भाषा में भी महारत हासिल हो। जमादार धीरज ने अवधी में अनेक रस-सिक्त गीतों की रचना की है, इन्होंने गीत, गजल और दोहों में भी अपनी रचनाशीलता का परिचय दिया है। ‘भावाजंलि की भाषा न सरल और न कठिन है, वरन् वह भाव के साथ जन्मी सहज भाषा है। वरिष्ठ शायर सागर होशियारपुरी ने कहा कि धीरज के गीतों में दर्द और प्यार का मिश्रण है, अपनों जुदाई ने मानो ज्वालामुखी बना दिया है।
प्रसिद्ध कवि नरेश महरानी ने कहा कि जमादार धीरज के गीत अनुभव पुंज हैं। उनके गीतों में दार्शनिकता एवं चिन्तन की झलक स्पष्ट दिखाई देती है और समाज में नारी की स्थिति को उसके श्रम से साझा कर उसकी विरह वेदना को दर्शाती है। प्रभाशंकर शर्मा के मुताबिक धीरज के गीतों में मुख्यतः विरह वेदना की गहराई एवं माटी की सोंधी महक दिखाई देती है। कविता नारी श्रम के माध्यम से स्त्री की दशा पर चिंता प्रदर्शित की गई है। धीरज जी की कविताओं में समय की आहट व स्पंदन महसूस किया जा सकता है।
ऋतंधरा मिश्रा ने कहा कि जमादार धीरज के गीतों में जीवन दर्शन विषय चिंतन समय का बोध स्पष्ट झलकता है इसके साथी महिलाश्रम गीत में नारी के अंतर्मन की दशा और परिवेश को पकड़ते हुए इतनी संवेदनशीलता से लिखा है कि मन को छू गई भाषा शैली सहज और सरल भाव की अभिव्यक्ति पूरे चरित्र का मूल्यांकन कर रही है। सतना के कवित तामेश्वर शुक्ल ‘तारक’ ने कहा कि जमादार धीरज ने अपने गीत सृजन द्वारा भावांजलि पुस्तक के रूप साहित्य जगत को एक बेहतरीन गुलदस्ता भेंट किया है। आपने  सृजन द्वारा अंतर के भावों को पृष्ठ पर उकेरते हुए लयात्मत एवं प्रेरणाप्रद गीत का रूप दे दिया। इनके अलावा डाॅ. नीलिमा मिश्रा, अर्चना जायसवाल, रचना सक्सेना, अनिल मानव, शैलेंद्र जय, सम्पदा मिश्रा, शगुफ्ता रहमान, डॉ.  शैलेष गुप्त ‘वीर’, मनमोहन सिंह तन्हा, नीना मोहन श्रीवास्तव, संजय सक्सेना और ममता देवी ने अपने भी अपने विचार व्यक्त किए। संयोजन गुफ्तगू के अध्यक्ष इम्तियाज अहमद गाजी ने किया। शनिवार को नीना मोहन श्रीवास्तव की कविताएं पर परिचर्चा होगी।


 


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