नसीहत देने वाली शायरी करते हैं हसनैन: सागर

देखो हरगिज न हेकारत से गरीबों की तरफ/सिर्फ मकसद तो नहीं जीस्त का पैसा होना।’ यह शेर मशहूर शायर हसनैन मुस्तफाबाद के कलम से निकला हुआ है, यह उनकी शायरी का आईना है जो उनकी बुलंद ख्याली की तरफ इशारा करता है। इनके अशआर नसीहत आमेज हैं। वो एक हमदर्द इंसान भी हैं और सबको खुश देखना चाहते हैं। वो समाज में चल रही बुराइयों जैसे गरीबों और मजदूरों पर जुल्म, बुरी सियासत, बेवफाई, एहसान फरोशी वगैरह से बहुत दुखी
हैं। उन्होंने हर मौजू पर बेहद उम्दा शेर कहे हैं। यह बात गुफ्तगू की ओर आयोजित आॅनलाइन साहित्यिक परिचर्चा में वरिष्ठ शायर सागर होशियारपुरी ने कही।
इसरार अहमद ने कहा कि जब कोई कलमकार अपनी तालीम व इल्म के बलबूते अपने ही क्षेत्र के महान कलमकारों से प्रेरित होकर अपनी कलम चलाता है तो वह वास्तव में अन्य कलमकारों की तुलना में अतुलनीय रचना का निर्माण करता है। ऐसा हसनैन मुस्तफाबाद की गजलों को पढ़कर मालूम होता है। इनकी गजलों में इश्क-मोहब्बत से लेकर राजनीति तक पर सारगर्भित कटाक्ष साफ तौर पर नजर आता है।
मनमोहन सिंह तन्हा ने कहा कि ‘दर्दो-गम की जब मेरे सर पर बला आने लगी, आह के बदले मेरे दिल से दुआ आने लगी।’ हसनैन मुस्तफाबादी का यह शेर जीवन के
अनुभव से निकला है, जहां सब कुछ उस खुदा की मर्जी से हो रहा है। आपके कलाम में जहां सूफियाना रंग दिखता है, वही समाज और मानवता का दर्द एक तड़प
बन कर आपकी गजलों में समा गया है। इनकी गजलें जीवन के रास्तों का मार्गदर्शन करती दिखती हैं, बड़ी साफगोई और हक बयानी से आपकी गजलों में जीवन की सच्चाईयों का दीदार होता है, अदब की दुनिया में आपका अपना एक बुलंद मुकाम है। डाॅ. नीलिमा मिश्रा के मुताबिक हसनैन मुस्तफाबादी की गजलें रूमानियत से भरी हुई हैं। शेरों की खासियत ये है कि इनसे महज एक खयाल ही नहीं पूरा अफसाना बयां होता है। गजलों में प्रेम, दर्द और ह्रदय के उद्गारों को रिवायती अंदाज में पेश करने का पूरा साजो सामान हैं। जहां शायर एक तरफ गजल की जुल्फ के पेचोंखम को सुलझाने की कवायद करता हैं तो दूसरी ओर उसका सख्त लहजा भी दिखायी देता है, जहां सामाजिक चिंतन है, आज के राजनीतिक हालात पर तंज और भ्रष्टाचार को बेनकाब करने की पुरकोशिश, यही अंदाज आपको अन्य शायरों से अलग खड़ा करता है।
इनके अलावा नरेश महारानी, जमादार धीरज, शैलेंद्र कपिल, ऋतंधरा मिश्रा, रमोला रूथ लाल ‘आरजू’, डाॅ. सुरेश चंद्र द्विवेदी, शगुफ्ता रहमान, डॉ. ममता सरूनाथ, अर्चना जायसवाल, शैलेंद्र जय, संजय सक्सेना और दयाशंकर प्रसाद ने भी  विचार व्यक्त किए। संयोजन गुफ्तगू के अध्यक्ष इम्तियाज अहमद गाजी ने किया। सोमवार को ऑनलाइन मुशायरे का आयोजन किया जाएगा, इसी मुशायरे के साथ ही ऑनलाइन परिचर्चा का समापन हो जाएगा।