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नवाबी शहर लखनऊ की संस्कृति और सभ्यता विलुप्त सी होती जा रही है

वो भी एक दौर था, लखनऊ जो अदब, तहजीब, नजाकत और मेहमान नवाजी के मशहूर था और लखनऊ के चारबाग स्टेशन पर उतरते ही सभ्य लखनवी भाषा में स्वागत करते कुली, उसके बाद बाहर तांगे वाले मिल जाते थे। उनकी बातों की शैली ही लखनऊ की मेहमान नवाजी का अहसास करा देती थी। अब पहले आप वाली संस्कृति नजर नहीं आयेगी। परन्तु अब स्टेशन पर कुत्तों और सांडों के दर्शन हो जायेंगे वो आप पर कब हमला कर के स्वागत कर दे इसका अंकलक करना भी मुश्किल है। स्टेशन के बाहर तांगे की जगह मनमाने कीमत वसूलने वाले आटो-टैम्पो वाले मिल जायेंगे और सुरक्षा में लगी पुलिस क्यों मूकदर्शक बनी रहती है यह भी समझ से परे है। आखिर अब क्या होता जा रहा है इस नवाबी शहर लखनऊ को, एक ऐसा भी समय था, जब बात करते ही लोग पहचान लेते थे और पूछने लगते थे क्या आप लखनऊ के रहने वाले हैं। यह कोई सपने की नहीं बल्कि अपने सामने की बात कर रही हूँ, ऐसा अभास होने लगा है कि अब नवाबी शहर लखनऊ की संस्कृति और सभ्यता विलुप्त सी होती जा रही है। वर्तमान में जब लोग लखनऊ आते हैं तो उन्हें काफी बदलाव नजर आता है। लखनऊ में उर्म के बदलाव के साथ ही सब कुछ बदलता जा रहा है। भीड़-भाड़, जगह-जगह गंदगी और तांगे-इक्के की जगह तीव्र गति से चलते वाहन मिलेगें, उन्हें सड़क पर पैदल चलने वालों से कोई मतलब नही चाहे वह उनकी चपेट में आ कर घायल ही क्यों न हो जाये। इसी लखनऊ में अराजकता की हदें पार कर गयी हैं। जगह-जगह गुण्ड़ें-बदमाश मिल जायेंगे लड़कियों से छेडकानी आम बात हो गयी है। अब तो ऐसा लगता है कि एक जमाना था, जब इसी लखनऊ में इज्जत नवाजी जाती थी, किन्तु अब इसी लखनऊ में कब अपमानित कर दिये जायें आप इसका आभास भी नहीं कर सकते। इस शहर में क्या बदमाश को कहें अब तो जनप्रतिनिधियों के साथ हथियारों से भरे वाहन देखने को मिल जायेंगे। शुद्ध शब्दों में कहा जाये तो अब नवाबी तहज़ीब की जगह इस शहर में गुड़ों और बदमाशों का कब्जा हो गया है। आखिर नवाबों के शहर लखनऊ की तहजीब और मेहमान नवाजी कहां खो गई। इस गम्भीर मुद्दे पर हम सब को सोचना होगा और पुनः लखनऊ की पुरानी सभ्यता को वापस लाने के लिये हम सब को मिलकर सार्थक प्रयास करना होगा।
'खुदा अबाद रखे लखनऊ को, गनिमत है कि कभी न कभी कोई प्यारी सूरत नजर आ ही जाती है।'
(संकलित)


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