आजादी के तोहफे

नोटबन्दी से तो नोट का मोहभंग हुआ ही था कि जी.एस.टी. भाई साहब ने पधारकर टैक्सों की मटियापलीत कर दी। जनता पूरी तरह से अब आजाद है। न ठीक से कमाने की इच्छा ही शेष रही है और न ही बचत की। बचत क्या घुइयाँ करेगी जब टैक्सों का अम्बार लग गया है। ये बात तो आजादी के बाद से अब जाके समझ में आयीं है। कि हम अपनी इनकम पर तो टैक्स देते ही है। मगर खरीद पर भी टैक्स देते हैं, केवल खरीद का मसला नहीं है। हर चीज की खरीद पर टैक्स है, किसी भी लाइसेंस और नवीनीकरण, और विलम्ब पर फाइन, हाउस, बिजली-पानी टैक्स, कपड़ा-सोना, हर समान की खरीद पर टैक्स और वैट आवागमन, यात्रा-देशाटन, सर से पैर तक टैक्सों की भरमार। अरे भई तुम्हें टैक्स ही लगाना है, तो सारी इनकम को एक मिनिमम टैक्स निर्धारित कर दीजिए बाकी आदमी की बचत, उसकी उम्मीदों, भविष्य, बच्चों, खुशियों, पर टैक्स क्यों लगाते हो। और देखो तो नेता-नगरी का मैटर कि अपनी आय, साधन, विलासितापूर्ण जीवन, विदेश यात्रा, रैलियों, फैशन, शौकों को इन सबसे दूर हैं। जब टैक्सों को इकट्ठा ही किया था, तो सब कर देते। इससे तो आम आदमी सदमें में है, बीमार हो रहा है, परेशान व दुखी है। सरकार की सस्ती शिक्षा व चिकित्सा पर कोई ध्यान नहीं है। शराब आदि पर कन्ट्रोल व जी.एस.टी. नहीं है। मतलब कि जनता कुछ जान नहीं पा रही है। ये वो लोग समझ रहे हैं। मगर साधो..... अब सभी जान रहे है, कि हमारे सपनों और खुशियों पर टैक्स लग रहा है। हम आजाद नहीं हैं, अपितु धीरे-धीरे प्रजातंत्र में नेता और सरकारे राजतंत्र का मुखौटा ओढ़कर राज कर रही हैं। और इन राजनेताओं ने यह योजना बनाई है, कि जनता को इतने टैक्सों और दौड़-भाग उलझनों में फंसा दो कि इनके बीच का आदमी नेता न बन सके, मंत्री व सत्ता में न आ सके।
 अरे हद तो ये हो गई कि अपना पैसा बैंक में जमा करो उस पर टैक्स। आखिर सरकारे ये क्यों नहीं बताती कि हमारे पैसे से जो कमाई करते है, और उससे दस गुना मुनाफा कमाकर हमें आंशिक ब्याज देते है, क्या हमारा हक नहीं है कि जितना मुनाफा हो कम से कम हमें भी मुनाफा ज्यादा से ज्यादा दिया जाये।
 खैर ये सब तो जनता की हजामत बनाई जा रही है और तानाशाही से योजनाओं ओर आदेशों द्वारा कार्यवाही थोपी जा रही है, जनमानस ब्याज-तियाज सहित अपने अवसर पर सबक जरूर देगी। और वो वक्त बहुत दूर नहीं हैं। अखिरकार जनता जीना ही तो चाहती है, बच्चों, परिवार, रहन-सहन को बेहतर तरीके से करना चाहती है। तो फिर जब ठीक से जीने भी नही दिया जायेगा। मुकदमों व जेल का डर दिखाया जायेगां तो जनता कब तक चुप रहेगी। जनमानस मूक-बधिर नहीं है, सब देख रही है, एक या दो बार किसी को भी बरगलाया जा सकता है, मगर बार-बार नहीं। देश के सभी नागरिकों, सभी धर्म-सम्प्रदायों, वर्गो के लिए समान कानून हो, समान विचारधारा हो, समान अधिकार हो और सरल व बेहतर सुविधा हो, शुद्ध खान-पान का समान व जल उपलब्ध हो, मंहगाई व टैक्सों, वैट आदि से राहत हो, स्वच्छता हो, वृक्षारोपण हो, पारिवारिक व संस्कारिक शिक्षा हो, तो आधे से ज्यादा अस्पताल बन्द हो जायेंगे। ये मेरा विश्वास है स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर। सही मायनों में जब हम ये पायेेगे और ऐसा हो पायेगा। तभी वास्तविकता में हम आजाद होंगे। अब हमें संकल्प लेना होगा! कि हम भी कानून को ठीक से पढ़ेंगे! ठीक से नेताओं का चयन करेंगें। पार्टी अथवा दल कोई भी हो! आखिरकार अन्ततः बहुमत की सरकारे भी हमने देख ली। माननीय राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री, राजयपाल और आधे से ज्यादा सूबों में एक ही पार्टी की सरकार तब भी जनता बेहाल वादों को ताख पर रखकर झांसों में आखिर कब तक मालपुआ खाओगे। गाँव में एक कहावत सुनी है, कि 'जो फरा है- सो झरा है' यानि कि रसगुल्ला अगर आप खाओगे तो करेला कौन खायेगा। स्वतंत्रता दिवस मनाइये मगर भविष्य की सफल योजनाओं और सिद्धान्तों व सोचों को संजोते हुए। भारत माता की जय! अब और नहीं खोयेगें जो बचा हय! फिर भी सारे जहाँ से अच्छा हिन्दोस्तां हमारा! सभी को स्वतंत्रता दिवस की मेरी हार्दिक शुभकामनायें!


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