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आधुनिकता की आड़ में मौज-मस्ती

आज के दौर में किषोर व किशोरियों में बढ़ता असभ्य व्यवहार वाकई चिन्ता का विषय है। उत्तेजना या आवेश में आकर वे ऐसा कुछ कर बैठते हैं। जिससे परिवार की मान-मर्यादा को गहरा धक्का लगता है। पकड़े जाने पर शर्मिन्दगी भी होती है। इसके बावजूद कुछ तो ऐसे होते हैं कि जो बार-बार गलतियाँ करने पर भी नहीं सुधरते। आधुनिकता की आड़ में मौज-मस्ती करने वाले किशोर भूल जाते हैं कि उनके भद्दे आचरणों का अंजाम क्या होगा? वे नशा, सेक्सुअल गतिविधि और कई दूसरे खतरे मोल लेकर जीवन को बेहद रोमांचक बनाए रखना चाहते हैं। अधिकतर समय दोस्तों के साथ घूमने-फिरने, सिनेमा देखने, पार्टियों में बर्बाद करते हैं। अक्सर ऐसे बच्चे उन घरों से आते हैं जहाँ रूपये-पैसे की कोई चिन्ता नहीं होती। उनमें अपनी सभी इच्छाओं की तत्कालिक पूर्ति करने और दूसरों को अपने नियन्त्रण में रखने की प्रबल इच्छा होती है। आर्थिक रूप से कमजोर किशोर भी इनसे प्रभावित होकर साथ मिल जाते है। बाजारीकरण, प्रतिस्पर्धा और हिंसा  के माहौल में एक दूसरे से किसी भी तरह आगे निकलने की होड़ आजकल हर किशोर युवा में देखी जा सकती है। जो छात्र मेधावी व समझदार होते हैं, वे मेहनत और लगन पर अटूट विष्वास रखते हुए रचनात्मक गतिविधियों में भाग लेकर मनचाही सफलता हासिल करते हैं। परिजन, दोस्त, रिष्तेदार सब उनके गुण गाते हैं। इसके विपरीत पिछड़ने के कारण बहुत से छात्र चाहते हुए भी प्रषंसा के पात्र नहीं बने पाते। बार-बार विफलता के अनुभव से कंुठित हो जाते हैं। जब रचनात्मक तरीकों से अपनी पहचान नहीं बना पाते तो अनैतिक व बेहूदा हरकतों से दूसरों का ध्यान आकर्षित करते हैं। साथियों से उन्हें बढ़ावा मिलता रहता है, जिससे इनकी इगो बूस्ट होती रहती है और इस चक्रव्यूह में फँसे रह जाते है। विलम्ब सहन नहीं करना, असभ्य, अश्लील, आक्रामक व्यवहार जिन्दगी का हिस्सा बन जाता है। पीयर ग्रुप में शान व रौब दिखाना, सेखी बधारना, जोर-जबर्दस्ती करना आम व्यवहार बन जाता है। स्कूल का वातावरण जैसे अत्यधिक प्रतिस्पर्धा, अध्यापकों की छात्रों से अपेक्षाएँ, शिक्षा का गिरता स्तर, षिक्षण में मूल्यों का अभाव, पीयर प्रेषर इत्यादि बातें भी बच्चों को बहुत प्रभावित करते हैं। मीडिया द्वारा प्रस्तुत की हुई तड़क-भड़क और षान-षौकत से लबरेज किशोरों की लाइफ स्टाइल भी इन्हें बहुत प्रभावित करती हैं। किशोर परिपक्वता के अभाव में कुछ गलत रास्ते अपनायें, इससे पहले माता पिता व स्कूल अधिकारियों को मिलकर इस मुद्दे पर विचार करना चाहिए और इसे मुख्य रूप से करना भी होगा। सुख-साधनों के अभाव में किस तरह से मेहनत और लगन के बल पर मजबूती से आगे बढ़ना चाहिए इसकी शिक्षा माता-पिता से अच्छा कोई और नहीं दे सकता। किशोरों के गलत रास्ते पर चलने की जैसे ही भनक पड़े उनकी गतिविधियों की ठीक से जांच पड़ताल करके बिना डाटे-डपटे और आलोचना किए उचित राह दिखाने की कोशिश करें। माता-पिता अपने कीमती समय में से बच्चों के लिए थोड़ा समय निकालें, पढ़ाई के अलावा उनसे उनके दोस्तों, टी.वी. प्रोग्रामों, उनकी मनपसन्द फिल्मों इत्यादि विशयों पर भी बातचीत करें। ऐसा करने से निकटता बढ़ेगी और बच्चे अपनी जिज्ञासाओं, भावनाओं को आपके समक्ष व्यक्त कर पायेंगे। शुरू से ही बच्चों को बतायें कि किसी तरह दूसरों के कहने में आकर या भावुक होकर आत्म सम्मान व प्रतिश्ठा खो सकते हैं। बच्चों की दृढ़ प्रवृत्ति बनायें जिनसे विपरीत परिस्थितियाँ आने पर भी न डगमगाऐं। बच्चों के चरित्र निर्माण में स्कूल की बहुत बड़ी भूमिका होती है। क्लास में बच्चें कैसे पेश आते हैं, उनके अभद्र, असभ्य व्यवहार को किस तरह संषोधित किया जा सकता है, इन विषयों पर गौर करने की बहुत जरूरत है। उनको एजुकेशन स्कूलों में लड़के-लड़कियों में स्वस्थ दोस्त बनाने की चर्चा करें। ताकि एक दूसरे को मान सम्मान देना षुरू से ही सीख पाएँ। नकारात्मक अनुभव से सीख ले और अपने व्यवहार के लिए खुद जिम्मेदार बनें।


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पक्षी आपका भाग्य बदले

मनुष्य का जीवन अपने आसपास के वातावरण से ही प्रभावित होता है। व्यक्ति के आस-पास के पशु पक्षी उसके जीवन का अभिन्न अंग है। भारतीय ऋर्षियों तथा संसार के अध्यात्मवादियो ने संसार के पक्षियों को ना केवल ज्योतिष तथा मनुष्य के भाग्य से जोड़ा है। बल्कि पक्षियों को उपयोग शकुन ज्योतिष, फलित तथा प्रष्न ज्योतिष तथा अनेकों ज्योतिष, तांत्रिक उपचारों और शारीरिक मानसिक रोगों के निवारण में किया है। भारत मे पंच प़क्षी शास्त्र, कल्ली पुराण पर आधारित तोते द्वारा भविष्यवाणी, पक्षी तंत्र तथा शकुन ज्योतिष का प्रयोग आदिकाल से ही किया जाता है भारत मे गरूड़ जी, नीलकंठ, काकभुषुंडी,, हंस, जटायु व संपाती, शुकदेव जी आदि दिव्य पक्षियों तथा अनेक देवी देवताआंे वाहन के रूप मे पक्षियों को प्रयोग किये जाने का  वर्णन है। जैसे भगवान विष्णु का गरूड़, कार्तकेय जी का मयूर, माता लक्षमी का उल्लू, विश्वकर्मा, वरूण जी तथा स्वरसती जी का हंस आदि शनिदेव का कौआ आदि का प्राचीन काल मे पक्षियों द्वारा डाक सेवा युद्ध संबधी शकुन का भी काम लिया जाता था पक्षियों को स्वतंत्रता, नवीन विचारों, आनंद, तनाव, मुक्ति, प्रषंसा, यष, धन्यवाद देने, प्रजनन श

परिवर्तन योग से करें भविष्यवाणी

भारतीय ज्योतिशशास्त्र में भविष्यकथन के सैकड़ों सूत्रो का वर्णन है। इन्ही सूत्रों मे से एक है परिवर्तन योग जिसका वर्णन पाराशरीय और नाड़ी ग्रन्थों दोंनों मे पाया जाता है। हाँलाकि दोनो प्रकार के ग्रन्थों में इन सूत्रों को विभिन्न तरीको से प्रयोग किया गया है ज्योतिष मे परिवर्तन योग के तीन रूप पाये जाते हैं। 1. भाव परिवर्तन 2. राशि परिवर्तन 3. नक्षत्र परिवर्तन  भाव परिवर्तन पाराशरीय व कुछ नाड़ी ग्रन्थों जैसे षुक्र नाड़ी मे इसके सूत्रो का वर्णन पाया जाता है। जो भावा के स्वामियो के बीच स्थान परिवर्तन से बनता है। जैसे चतुर्थेश षष्ठ भाव मे जाय और षष्ठेश चतुर्थ भाव मे जाय। इसके भी तीन भेद हैं। 1. दो शुभ भावों के स्वामियों का परस्पर परिवर्तन जैसे लग्न व पंचम भाव का परिवर्तन या दो केन्द्रेशों का परिवर्तन या केन्द्र और त्रिकोण भाव मे परस्पर परिवर्तन। 2. दो त्रिकेशांे का परिवर्तन जो विपरीत राजयोग बनाता है। 3. किसी केन्द्रेश या त्रिकोणेश का त्रिकेश से परिवर्तन। जैसे दशमेश का द्वादेश से परिवर्तन या पंचमेश या द्वादेश के बीच परिवर्तन। 2. ग्रह या राशि परिवर्तन  इसका वर्णन स्व. आर. जी. राव द्वारा अनुवादित और

जेल जाने के योग

ज्योतिष शास्त्र अनुसार कुंडली के आठवें मतांतर से बारहवें भाव से कारावास तथा सजा का विचार किया जाता है। कुंडली के इस घर में राहु अगर अष्टमेश के साथ हो तो उसके अशुभ प्रभाव के कारण व्यक्ति को किसी बड़े अपराध के कारण जेल जाना पड़ता है। शनि  मंगल और राहू मुख्य रूप से यह तीन ग्रह एवम् इनका आपसी सम्बन्ध जेल के कारक है। शनि व 12 भाव सजा का कारक है। छठा भाव व मंगल राहू अपराध के कारक है। अगर किसी व्यक्ति की कुण्डली में मंगल और राहु एक साथ किसी भाव में बैठकर युति करते हैं तो जेल योग बनता है केतु रस्सी बेड़ी हथकड़ी का कारक ग्रह हैं अशुभ मंगल व राहु के बीच दृष्टि संबंध बनता हो तो अंगारक योग की वजह से ऐसा इंसान हिंसक स्वभाव वाला हो जाता है और अपराध करता है जिससे जेल जाना पड जाता है। शनि मंगल व राहु मुख्य रूप से जेल यात्रा कराने का भी योग बनाते हैं और इनकी युति या आपस में दृष्टि इस तरह की स्थितियां बना देती है कि आखिर इंसान को जेल जाना ही पड जाता है। जन्मकुंडली में सूर्यादि ग्रह समान संख्या में लग्न एवं द्वादश तृतीय एवं एकादश, चतुर्थ, दशम, षष्ठ एवं अष्टम भाव में स्थित हो तो यह बंधन योग बनाता है यह स्थिति