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जीवन-शिक्षा के अट्ठारह सूत्र

आज मानवोदय शिविर का समापन दिवस है, यह मानवता का शिविर है, जिसे मानवोदय शिविर का नाम दिया गया है, यह आयोजन दस यज्ञों के बराबर है। चार दिनों से जो भी मुझसे मिलता है, वही इस कार्यक्रम में कुछ नयापन देखकर बड़ी प्रशंसा करता है। यह सब देख-सुनकर मुझे भी प्रसन्नता हुई और मन में मानवोदय के लिए अट्ठारह सूत्र वाक्य बने उन्हीं को बता रहा हूं। आज कल नम्बर का बड़ा रिवाज है, इसलिए मैं भी एक से अट्ठारह तक नम्बर बोलता जाऊंगा, वही लिखे भी जायेंगे-
1. सांस्कृतिक विकास, योग की शिक्षा, गो-परिवार की उन्नति, नशा मुक्ति, हिंसा का शमन, ईष्र्या में कमी, ईमानदारी, और सद्व्यवहार बढ़े, कैसे बढ़े इस पर विचार हो।
2. नैतिक सामाजिक सुधार हो, आध्यात्मिक भाव बढ़े, स्वास्थ्य में उन्नति हो, सद् साहित्य का खूब प्रचार हो। आदर्श गांवों का निर्माण, शिक्षा में नैतिकता की प्राथमिकता तथा आचार्यों और विद्यार्थियों में स्नेह बढ़े।
3. परिवारों में आपसी कलह समाप्त हो, सादा जीवन-उच्च विचार पर जोर हो, अर्थ आवश्यकतापूर्ति में व्यय हो, विलासिता का खर्च रोका जाए।
4. मोटा और महीन काम दोनों में से किसी को निन्दनीय न समझा जाए।
5. शारीरिक श्रम और बौद्धिक श्रम का समान आदर हो, समाज सुधार में तीनों गुणों के स्तरों का ध्यान रखा जाए। सज्जनता और दुर्जनता को ध्यान में रखते हुए मानव समाज का निर्माण किया जाए, भोग वासना की प्रवृत्ति को प्रोत्साहन न मिले, गरीबी में जीवन जीने वालों के प्रति सच्ची सहानुभूति हो।
6. मेला-त्योहारों में मनोरंजन हितकारी और सात्विक हों। शासक और शासित वर्गों का समान हित चाहने वाले व्यक्ति राग-द्वेष से रहित हों।
7. किसी भी धर्म या मजहब अथवा धर्म-मजहब रहित ग्रन्थों में जो समाज हितकारी वाक्य हों, उनको विद्यार्थियों को पढ़ाया जाए।
8. ग्रामीण मनुष्यों में विशेष कर नवयुवकों में कोई भी ठेलुहा-निठल्ला न रहने पाए, लौकिक-पारलौकिक कार्यों में इनकी विशेष सेवायें ली जायं।
9. देहातों में जड़ी-बूटी आदि की सरल औषधियां बनाने का रिवाज हो, ऐसी ही छोटी-छोटी चीजों से स्वदेशी का प्रचार होगा।
10. खान-पान और व्यवहार का विशेष ध्यान रखा जाए, गुण और स्वभाव इसी से बनते-बिगड़ते हैं।
11. वस्तु, बर्तन और रहने के स्थान की स्वच्छता प्रत्येक मनुष्य को स्वयं करनी चाहिए।
12. कथा और सत्संग करने वाले व्यक्ति अपने आचरण में शुभगुण विशेष रूप से उतारने का प्रयास करें।
13. धार्मिक कार्यक्रम तथा अन्य सामाजिक कार्यों में रूचि लेना चाहिए, इससे निष्काम सेवा के भाव बनते हैं।
14. सुधार के कार्यों में हृदय परिवर्तन का कार्य सबसे बड़ा है, इसे प्रीतिपूर्वक शिक्षा द्वारा किया जाए।
15. बोलते समय सत्य, प्रिय, हितकारी तथा उद्वेग रहित शब्दों के प्रयोग की शिक्षा दी जाए।
16. व्यक्ति से परिवार, परिवार से गांव, गांव से समाज तथा समाज से विश्व को एक कुटुम्ब मानकर विश्वशान्ति का लक्ष्य प्राप्त किया जाए।
17. जैसे आत्मा अमर है, वैसे ही विचार कभी नष्ट नहीं होते, यह समझकर स्वाध्याय में प्रमाद नहीं करना चाहिए।
18. समाज की सुन्दर व सुखद व्यवस्था के लिए प्राचीनकाल की ऋषि पद्धति से प्रेरणा लेनी चाहिए, समतामूलक समाज की स्थापना में यह पद्धतिपूर्ण सफल रही है। उपरोक्त सभी सूत्रों का प्रयोग में लाने का प्रयास मानवोदय शिविर में भाग लेने वाले सभी साधकों को करना चाहिए।
इसका नाम मानवोदय शिविर क्यों रखा गया, जबकि इसकी चार कड़ियां हैं, पहले मानवोदय, फिर कुटुम्बोदय, इसके बाद ग्रामोदय और अन्त में सर्वोदय। इसे एक रूपक से समझना चाहिए। एक गांव का हलवाई कस्बे की बाजार से शकर का बोरा खरीद लाया, दीवाली का त्योहार नजदीक था। फिर घर में बैठकर हिसाब लगाने लगा कि इतनी तौल की शकर से मिठाई के खिलौने बनेंगे, इतनी शकर के बर्फी-पेड़ा बनेंगे- आदि-आदि उसके दिमाग में थे। हलवाई के लिए जैसे शकर सब प्रकार की मिठाइयों का आधार है, वैसे ही मानवोदय है, यदि मानवोदय की योजना सफल हो जाए, तो सारा विकास अपने आप होता जायगा। यह शिविर परमार्थ साधना के लिए था। समस्त संसार को अपना कुटुम्ब मानकर ''आत्मवत् सर्वभूतेषु'' की भावना से प्रभावित होकर यह समस्त जगत परमात्मा का ही स्थूल शरीर है ऐसा समझकर पुरुष जो भी पुरुषार्थ करता है, वह सब परमार्थ ही है। पुरूषार्थी और परमार्थी दोनों प्रकार के भक्तों को मेरे आराध्य, मेरे जीवन निर्माता सद्गुरु स्वामी एकरसानन्द सरस्वती जी दस उपदेश दे गए हैं- आप लोग उनका अनुसरण करें।
(1) संसार को स्वप्नवत् जानो, (2) अति साहस रखो, (3) अखण्ड प्रफुल्लित रहो, दुःख में भी। (4) परमात्मा का स्मरण करो, जितना बन सके, (5) किसी को दुःख मत दो, बने तो सुख दो, (6) सभी पर अति प्रेम रखो, (7) नूतन बालवत् स्वभाव रखो, (8) मर्यादानुसार चलो, (9) अखण्ड पुरुषार्थ करो, गंगा प्रवाह वत्, आलसी मत बनो, (10) जिसमें तुम्हें नीचा देखना पड़े, ऐसा काम मत करो।


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