ज्योतिष का विचित्र अनुभव

बहारे दुनिया है चन्द्र रोजा, ना चल ऐसे सर उठा उठा के!
कजा ने ऐसी हजार सूरत, मिटा है डाली बना-बना के!!
 इंसान किस्मत के हाथों एक खिलौना है। कुदरत इंसान को ना जाने क्या क्या खेल दिखाती है। तमाम लोगों की जिंदगी मे ऐसे विचित्र हादसे होते है जो बड़े अजीबो-गरीब होते है। एक ज्योतिषी की जिंदगी मे तमाम ऐसे खट्टे-मीठे अनुभव होते है। जो विचित्र यादगार उलझे हुये और डरावने होते है। मेरी जिंदगी मे भी कई ऐसे केसेस आये जो यादगार और हैरत-अंगेज थे चंूकि शुरू से ही मेरी आदत रही है कि मै अपने ज्योतिष रोजनामचे मे महत्वपूर्ण केसेस को मय डाटा व घटना के साथ दर्ज कर लेता था लिहाजा इन केसेस को बरसों बाद भी प्रामाणिक रूप से पाठको के सामने के पेश करने मे मुझे कभी कोई दिक्कत नही हुयी अपनी यादों के आयने पर जमीं गर्द हटाकर अपने रोजनामचे से दो यादगार केस आपके सामने रख रहा हूँ यह अप्रैल सन 2009 के अंतिम सप्ताह की बात हैं मेरे कार्यालय मे मेरी एक पुरानी क्लाईट प्रज्ञा सिंह अपने मौसरे भाई और भाभी की कुडंली लेकर आई उनमे से एक जमंाक आजादी से पूर्व गोरखपुर जिले की सिंसवा बाजार स्टेट के महाराजा तथा 2007 से पूर्व उ.प्र. राज्य के समाजवादी सरकार मे खेल राज्य मंत्री रहे राजा शिवेन्द्र सिंह का था दूसरा उनकी रानी का जो गुर्दे के पुराने और गंभीर किस्म के रोग से पीड़ित थीं लगभग डेढ दो सालों से उनका ईलाज चल रहा था उत्तर प्रदेश व बाहर के राज्यों के कई नामचीन डाक्टर्स उनका ईलाज कर चुके थे किंतु मर्ज बढता ही गया। ज्यों-ज्यांे दवा की वाली कहावत ही चरितार्थ हो रही थी सबसे खतरनाक बात यह थी कि उनकी तीन-चार बार डायलीसिस भी हो चुकी थी बनारस और प्रदेश के कई नामी-गिरामी ज्योतिषी भी उनके जमांक का अध्ययन कर चुके थे वे मारकेश बता रहे थे किन्तु उनकेे उपचार असफल रहे थे। महराज के निमंत्रण पर मैं 5 मई की शाम मैं अपने संस्थान के वरिष्ठ पदाधिकरी व कुशल चिकित्सक डा. पी के निगम के साथ उनके हजरतगंज लखनऊ के आवास पर पहुँचा वहांँ महरानी और महाराजा दोनों के जमाकांे का गहराई से अध्ययन करने से जो तस्वीर उभर कर आई कि पत्री के अनुसार उनके सभी कोठियों और महलों का वास्तु बहुत खराब था एक निर्माणाधीन बंगले का वास्तु ठीक था पर बंगला अधूरा था उसमे तत्काल निवास करना संभव नही था। बातो ही बातो मे पता चला इसी भवन मे उनके पिता भी और उसके पूर्व उस कोठी के पूर्व मालिक भी बरसों तक गंभीर रूप से बीमार और बरसों तक बिस्तर पर पड़े रहे और उसी हाल मे उनका देहांत हुआ उनकी कुण्डली का अध्ययन करने से निम्नलिखित ज्योतिष तथ्य सामने आये कुण्डली बांचतें हुये मैंने उन्हों बताया कि जातिका को 2 साल पहले गर्भाशय मे टयूमर हुये थे जिनका आपरेशन हुआ था उन्होने मेरी बात को सच बताया मैंने कहा कि अब वे टयूमर गुर्दे मे पैदा हो गये हंै। गुर्दे फेल नही हुये हंै। महारानी का जमंाक इस प्रकार है। जंम तिथी-22 नवम्बर 1966। समय-रात्रि-8.15 रात्रि। कलकत्ता। उनका जमंाक इस तरह था मिथुन लग्न द्वितीय कर्क का गुरू, चतुर्थ मे कन्या का मंगल, तुला मे वक्री लग्नेश बुध केतु युत था छठे भाव मे वृश्चिक राशि मे सूर्य शुक्र युति थी नवम मे कुंभ का वक्री शनि था दशम मे मीन का चन्द्रमा तथा एकादश भाव मे मेष का राहू था जातिका का लग्नेश व गुर्द का कारक ग्रह बुध वक्री होकर पंचम भाव मे अपने शत्रु ग्रह केतु के साथ तुला मे बैठा है। और पापकर्तरी मे भी है। वक्री होकर वह कन्या का फल देगा जहाँ बुध का शत्रु ग्रह मंगल अपनी परम शत्रु राशि कन्या मे है। बुध नवांश लग्न वृष मे है तथा वहाँ पर भी पापकर्तरी मे है। पंचमेश शुक्र जमांक मे अस्त व नवांश लग्न मे नीच का है। लग्नेश बुध जमांक में बली व उच्च का फल दे रहा है। बली लग्नेश जातिका के लिये वरदान साबित हुआ जिसने जातिका को शुरू मे भीषण रोग दिये पर अंत मे जान बचाई दशमेश गुरू से त्रिकोण मे चन्द्रमा से त्रिकोण गजकेसरी बना रहा है। (शुक्र नाड़ी) जिसने सही फैसलों के कारण रोग मुक्ति दी बाधकेश व मारकेश गुरू द्वितीय मारक भाव मे है। जो द्वितीेयेश व दूसरे मारकेश चन्द्रमा को देख रहा है। गर्भाशय कारक चन्द्रमा पापकर्तरी मे है तथा उससे 6, 7, 8, भाव मे पाप ग्रह है। जो पापी चन्द्राधियोग बना रहे हैं मारकेश चन्द्रमा पर बाधकेश व टयूमर कारक गुरू की दृष्टि ने जातिका को गर्भाशय मे टयूमर दिये गुरू व चन्द्रमा मे राशि परिवर्तन है। अतः गुरू धनु का फल देगा और चन्द्रमा कर्क का फल देगा टयूमर कारक गुरू पर सर्जरी कारक मंगल की दृष्टि मे जातिका के टयूमर का आपरेशन करवाया चन्द्रमा से कैंसर कारक राहू का कोई संबध ना होने के कारण गर्भाशय का टयूमर कैंसर मे नही बदला वक्री अष्ठमेश भीषण रोग व दुर्घटना देता है। किंतु अष्ठमेश व आयु कारक शनि के स्वग्रही होने से दीर्घायु योग बना कुंभ का वक्री शनि मकर राशि का फल देगा जो ना केवल स्वग्रही है जो बल्कि शनि भाग्येश होकर लग्नेश बुध को 10 वीं दृष्टि से भी देख रहा है जिसने उन्हें अकाल मौत से बचाया पापकर्तरी चन्द्र व शत्रु राशि गत मंगल की चन्द्र पर दृष्टि ने गर्भाशय, रक्तदोष, व गुर्दे के रोग दिये व डायलीसिस करवाई। पर चन्दमा पर बली व उच्च के गुरू की दृष्टि व चन्द्र गुरू मे राशि परिवर्तन ने डायलीसिस रोक कर रोग मुक्ति दी नवांश मे स्वग्रही सूर्य व मंगल के उच्च ने भी रोग सेे मुक्ति प्रदान की शुक्र व बुध के मंत्रोपचार व हवन से जातिका दो सप्ताह मे रोगमुक्त हो गई।