सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

कबीर ने धर्म, समाज और राजनीतिक दर्शनशास्त्र पर प्रभाव डाला


15वीं सदी ने कबीर के रूप में एक ऐसे रहस्यवादी सूफी कवि व संत को देखा जिसने धर्म, समाज और राजनीतिक दर्शनशास्त्र पर प्रभाव डाला जिसका असर आज तक दिखाई देता है। ऐसा माना जन्म बुनकर परिवार में हुआ, उनके जन्म के बारे में  भिन्न-भिन्न जानकारियों  की वजह से हिन्दू और मुसलमानों  के बीच  अक्सर उनकी पहचान को लेकर विभिन्न विचार रखे गए हैं। कबीर ने अपने जीवन काल में 1498-1518 के दौरान प्रभावशाली कवितायें बनाईं जिसका प्रभाव भक्ति आंदोलन पर पड़ा और उनके छंदों का उल्लेख सिख धर्म के आदि ग्रंथ में भी संग्रहीत हैं।
कबीर, भक्ति काल के कवि व संत स्वामी रामानन्द (एक ऐसा व्यक्ति जिसका लक्ष्य इस्लाम, ईसाई धर्म और ब्राह्मण के सिद्धांतों को मिश्रित करना था ) के शिष्य बन गए  अतः कबीर की कविताएं उनके गुरु के विचारों के विलय का एक प्रतिबिंब है और शैली में काल्पनिक स्थानीय भाषा की मान्यता को दर्शाता है। शैली में स्थानीय भाषा का प्रयोग किया गया है, जीवन की विशेषताओं व ईश्वर के प्रति श्रद्धा पर केन्द्रित कविताओं में हिन्दी, अवधि, ब्रज, और भोजपुरी बोलियों का प्रयोग किया गया है। 
कबीर की कविताओं में उस समय की सामुदायिक गतिशीलता और तर्कसंगत सोच को अभिव्यक्त किया गया है। जीवन के प्रति उसके दार्शनिक आकलन ने आज की पीढ़ी को उदार  विचारों  की पहुँच  दी है। हिन्दू धर्म और इस्लाम व सिख  धर्म  सहित  का मुख्य स्त्रोत बना है, हिन्दू व इस्लाम धर्म  और उनकी अर्थहीन परम्पराओं रीति-रिवाजों आलोचना करने  के लिए उन्हे जाना जाता है। कबीर ने सुझाव दिया है कि जीने का सही तरीका धर्म के मार्ग के माध्यम से है, सभी लोग ईश्वर के प्रतिबिंब हैं और अतः सब बराबर हैं। कबीर अपने विचारों के लिए लड़े हालांकि उन्हे दोनों संप्रदायों के द्वारा धमकाया गया, उन्होनें इसका स्वागत किया व उन्हे ईश्वर के ओर नजदीक ले जाने के लिए आभार प्रकट किया।   
कबीर ने बुनियादी धार्मिक सिद्धांतों में जीवात्मा और परमात्मा को संघटित किया और इनकी राय के अनुसार इन दोनों की एकता के साथ ही मोक्ष को प्राप्त किया जा सकता है। कबीर द्वारा रचित, ज्ञान की मौखिक कविताओं को उनके अनुयायियों द्वारा “वाणी” कहा गया जिसमे दोहे, श्लोक थे और इन्हें वास्तविकता का सबूत माना जाता था। कबीर की विरासत को कबीरपंथ के माध्यम से जीवित रखा गया जिसे धार्मिक संप्रदायों और इनके सदस्यों द्वारा पहचान मिली जिन्हें कबीरपंथी कहा जाता है।
इनकी साहित्यिक कृतियाँ इस प्रकार हैं कबीर बीजक, कबीर परछाई, आदि ग्रंथ, आदि ग्रंथ और कबीर ग्रंथावली।
शाश्वत रूप से उनके काम में अभिव्यक्ति और रहस्यमय भावना और व्यापक मान्यताओं के रूपकों के साथ धर्मों के प्रतीक की सहजता है। कबीर ने अपने जीवन काल का ज्यादातर समय वाराणसी में बिताया और ये बताया गया है कि वाराणसी विशाल हिन्दू पुजारियों के प्रभाव का केंद्र था, उनके द्वारा पारंपरिक प्रथाओं को कम आँकने के लिए उनकी बहुत आलोचना की गई।  उन्हे 1495 में लगभग 60 वर्ष की उम्र में वाराणसी से बाहर निकाल दिया गया, उसके बाद वह अपने अनुयायियों के साथ उत्तरी भारत की तरफ चले गए और निर्वासन का जीवन व्यतीत किया द्य प्राप्त जानकारी के अनुसार उन्होनें 1518 में  आखिरी सांस गोरखपुर के नजदीक मगहर में ली।
उनके जन्म की  तरह ही उनकी मृत्यु भी अनेक विवादों  से घिरी रही, जबकि  कुछ का मानना था कि कबीर एक ब्राह्मण के पुत्र थे जिनको एक बेऔलाद मुसलमान दंपति ने गोद ले लिया, आम राय यह है कि वह एक मुसलमान परिवार में पैदा हुए थे। दोनों धर्मों के बेहतरीन विचारों के प्रचार के कारण उनके अनुयायियों के बीच उनके अंतिम संस्कार को लेकर बहस हो गई। पौराणिक कथाओं के अनुसार उनके मृत देह के ऊपर फूल मिले थे और मुसलमानों ने उन्हीं फूलों को दफनाया जबकि हिंदुओं ने उन फूलों का  अंतिम संस्कार किया।


 


इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

पक्षी आपका भाग्य बदले

मनुष्य का जीवन अपने आसपास के वातावरण से ही प्रभावित होता है। व्यक्ति के आस-पास के पशु पक्षी उसके जीवन का अभिन्न अंग है। भारतीय ऋर्षियों तथा संसार के अध्यात्मवादियो ने संसार के पक्षियों को ना केवल ज्योतिष तथा मनुष्य के भाग्य से जोड़ा है। बल्कि पक्षियों को उपयोग शकुन ज्योतिष, फलित तथा प्रष्न ज्योतिष तथा अनेकों ज्योतिष, तांत्रिक उपचारों और शारीरिक मानसिक रोगों के निवारण में किया है। भारत मे पंच प़क्षी शास्त्र, कल्ली पुराण पर आधारित तोते द्वारा भविष्यवाणी, पक्षी तंत्र तथा शकुन ज्योतिष का प्रयोग आदिकाल से ही किया जाता है भारत मे गरूड़ जी, नीलकंठ, काकभुषुंडी,, हंस, जटायु व संपाती, शुकदेव जी आदि दिव्य पक्षियों तथा अनेक देवी देवताआंे वाहन के रूप मे पक्षियों को प्रयोग किये जाने का  वर्णन है। जैसे भगवान विष्णु का गरूड़, कार्तकेय जी का मयूर, माता लक्षमी का उल्लू, विश्वकर्मा, वरूण जी तथा स्वरसती जी का हंस आदि शनिदेव का कौआ आदि का प्राचीन काल मे पक्षियों द्वारा डाक सेवा युद्ध संबधी शकुन का भी काम लिया जाता था पक्षियों को स्वतंत्रता, नवीन विचारों, आनंद, तनाव, मुक्ति, प्रषंसा, यष, धन्यवाद देने, प्रजनन श

परिवर्तन योग से करें भविष्यवाणी

भारतीय ज्योतिशशास्त्र में भविष्यकथन के सैकड़ों सूत्रो का वर्णन है। इन्ही सूत्रों मे से एक है परिवर्तन योग जिसका वर्णन पाराशरीय और नाड़ी ग्रन्थों दोंनों मे पाया जाता है। हाँलाकि दोनो प्रकार के ग्रन्थों में इन सूत्रों को विभिन्न तरीको से प्रयोग किया गया है ज्योतिष मे परिवर्तन योग के तीन रूप पाये जाते हैं। 1. भाव परिवर्तन 2. राशि परिवर्तन 3. नक्षत्र परिवर्तन  भाव परिवर्तन पाराशरीय व कुछ नाड़ी ग्रन्थों जैसे षुक्र नाड़ी मे इसके सूत्रो का वर्णन पाया जाता है। जो भावा के स्वामियो के बीच स्थान परिवर्तन से बनता है। जैसे चतुर्थेश षष्ठ भाव मे जाय और षष्ठेश चतुर्थ भाव मे जाय। इसके भी तीन भेद हैं। 1. दो शुभ भावों के स्वामियों का परस्पर परिवर्तन जैसे लग्न व पंचम भाव का परिवर्तन या दो केन्द्रेशों का परिवर्तन या केन्द्र और त्रिकोण भाव मे परस्पर परिवर्तन। 2. दो त्रिकेशांे का परिवर्तन जो विपरीत राजयोग बनाता है। 3. किसी केन्द्रेश या त्रिकोणेश का त्रिकेश से परिवर्तन। जैसे दशमेश का द्वादेश से परिवर्तन या पंचमेश या द्वादेश के बीच परिवर्तन। 2. ग्रह या राशि परिवर्तन  इसका वर्णन स्व. आर. जी. राव द्वारा अनुवादित और

जेल जाने के योग

ज्योतिष शास्त्र अनुसार कुंडली के आठवें मतांतर से बारहवें भाव से कारावास तथा सजा का विचार किया जाता है। कुंडली के इस घर में राहु अगर अष्टमेश के साथ हो तो उसके अशुभ प्रभाव के कारण व्यक्ति को किसी बड़े अपराध के कारण जेल जाना पड़ता है। शनि  मंगल और राहू मुख्य रूप से यह तीन ग्रह एवम् इनका आपसी सम्बन्ध जेल के कारक है। शनि व 12 भाव सजा का कारक है। छठा भाव व मंगल राहू अपराध के कारक है। अगर किसी व्यक्ति की कुण्डली में मंगल और राहु एक साथ किसी भाव में बैठकर युति करते हैं तो जेल योग बनता है केतु रस्सी बेड़ी हथकड़ी का कारक ग्रह हैं अशुभ मंगल व राहु के बीच दृष्टि संबंध बनता हो तो अंगारक योग की वजह से ऐसा इंसान हिंसक स्वभाव वाला हो जाता है और अपराध करता है जिससे जेल जाना पड जाता है। शनि मंगल व राहु मुख्य रूप से जेल यात्रा कराने का भी योग बनाते हैं और इनकी युति या आपस में दृष्टि इस तरह की स्थितियां बना देती है कि आखिर इंसान को जेल जाना ही पड जाता है। जन्मकुंडली में सूर्यादि ग्रह समान संख्या में लग्न एवं द्वादश तृतीय एवं एकादश, चतुर्थ, दशम, षष्ठ एवं अष्टम भाव में स्थित हो तो यह बंधन योग बनाता है यह स्थिति