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जीना चाहते हैं तो आयुर्वेद और प्रकृति के करीब आना पड़ेगा

आयुर्वेद विश्व की प्राचीनतम चिकित्सा प्रणालियों में से एक है। यह विज्ञान, कला और दर्शन का मिश्रण है। ‘आयुर्वेद’ नाम का अर्थ है, ‘जीवन का ज्ञान’ और यही संक्षेप में आयुर्वेद का सार है। आयुर्वेद शब्द दो शब्दों से मिलकर बना है, आयुष और वेद। 
हिताहितं सुखं दुःखमायुस्तस्य हिताहितम
 आयुर्वेद हमारे जीवन के लिए सदियों से वरदान साबित हुआ है। और आयुर्वेद चिकित्सा पद्धति ने वर्तमान और प्राचीन काल से ये साबित किया है कि ये किसी भी बीमारी में बिना साइड इफेक्ट के सत प्रतिशत लाभ लाभ पहुँचाता है बल्कि यूँ कहें कि हमारा लाइफ स्टाइल आयुर्वेद के बिना मिथ्या मात्र है।
(वल्र्ड हेल्थ ओगर््नाइजेशन) का कहना हैं  कि  आज हमारे स्वस्थ्य जीवन निरोग्ी काया के लिए जरूरी है शुद्ध हवा, पानी, भोजन और आवश्यक पोषक तत्वों जैसे मिनरल्स, प्रोटीन, विटामिन्स, एंटीआॅक्सीडेंट इत्यादि जो आज हमारे शरीर को आवश्यकतानुसार पूर्ण रूप से किसी को भी नहीं मिल पा रहा है। क्या आप जानते हैं कि इसके कारण हमारी रोजमर्रा की जिन्दगी में हमारे शरीर की कोशिकायें क्षातिग्रस्त होते रहते है और उस संख्या में पुनः नहीं बन पाते हैं, अधिकतर देखा गया है कि हम अपने भोजन में पोषक तत्वों की मात्रा शरीर की जरूरत के मुताबिक नहीं ले पाते हैं, आज के इस प्रदूषित वातावरण तथा भागदौड़ भरी जिन्दगी में लीवर की समस्या, मधूमेह, उच्च रक्तचाप, गठिया, दिल का दौरा, मोटापा और त्वचा संबंधित समस्या बहुत ही आम समस्या बन गई है बल्कि एक महामारी का रूप लेती जा रही है, जो हमारे जीवन शैली को बहुत ज्यादा प्रभावित करती है। 
 रासायनिक खाद और कीटनाशक दवाओं का छिड़काव के कारण अनाज की पैदावार और इन्जेक्शन के कराण दूध, फलों और सब्जियों की पैदावार को बढ़ाना यह सब हमारे शरीर के लिये बहुत ही विषाक्त और हानिकारक होता जा रहा है डब्लूएचओ के अनुसार यह 2023 तक कैंसर से भी ज्यादा खतरनाक समस्या बन जायेगा और 40 प्रतिशत से ज्यादा लोग इसकी चपेट में होंगे और जो अपने जिंदगी और मौत से संघर्ष करेंगे) और जो हमारी रोग प्रतिरोधक क्षमता, आन्तरिक ऊर्जा और एनर्जी लेवल को दिन प्रति दिन प्रभावित करती जा रही है स जिससे संक्रमण होने की सम्भावनायें बहुत बढ़ जाती हैं। जैसे वायरल फीवर, सर्दी, जुकाम, बुखार, कमजोरी थकान, चक्कर आना और काम के प्रति रूचि न होना। 
 हमने देखा की अधिकांश समस्यायें विषाक्त पदार्थों (टाॅक्सिन्स) से उत्पन्न होती हैं और यह विषाक्त पदार्थ प्रदूषित जल, वायु और भोजन के परिणाम हैं ।   आज हर शहार में कोई न कोई व्यक्ति किसी न किसी समस्या से परेशान है। आप किसी भी ऐसे व्यक्ति को शायद नहीं जानते होंगे जो कि नीचे लिखी किसी भी समस्याध्बीमारी से परेशान न हो, चाहे वो किसी भी प्रोफेशन में हो।
1. शुगर (मधुमेह), 2. ब्लड प्रेशर (ठण्च्ण्), 3. हृदय रोग, 4. कोलेस्ट्राॅल, 5. कैंसर, 6. दमा, 7. लकवा (चंतंसलेपे ), 8. स्वाइन फ्लू, 9. थाइरोइड, 10- माइग्रेन, 11. थकान, 12. आर्थराइटिस, 13. गठिया, 14. जोड़ों का दर्द, 15. कमर में दर्द, 16. बदन दर्द, 17. सेक्सुअल समस्या, 18. मोटापा, 19. त्वचा/चर्म रोग, 20. सोराइसिस, 21-लूकोडर्मा, 23.  बवासीर, 24. ,सिडिटी, 25- श्वसन संबंधी समस्या, 26. पाचन सम्बंधित रोग, 27. ,एटी, जिंग, 28. लीवर से जुडी कोई भी परेशानी, 29. अनिद्रा, 30.  अनीमिया (खून की कमी), 31. मानसिक तनाव, 32. खांसी, 33. साईनस, 34. पेट में गैस बनना, 35. पैर के तलवे मे जलन, 36.  आखों से संबंधित रोग, 37. स्वेद प्रदर, 38. मासिक धर्म की अनियमितता, 39. बालों की समस्या, 40. हाथ पैरों में कंपन्न, इत्यादि छोटी-छोटी अन्य समस्या है। यह भी कह सकते हैं, आप जिस भी किसी बीमारी का नाम जानते हैं या ऐसा कहें कि हमारे जीवनशैली से जुड़ी हुई जो भी बीमारियां हैं। और ये सर्वथा सत्य है कि छोटी समस्या ही एक दिन बड़ी समस्या का रूप लेती है।
     एक बहुत बड़ा कटु सत्य यह भी है कि जब कभी भी कोई किसी शरीरिक समस्या को लेकर अंग्रेजी दवाओं के सम्पर्क में आ जाता है तो वह जीवन के आखिरी पड़ाव तक अंग्रेजी दवाइयों का सेवन करना उसकी मजबूरी बन जाती है या यूं कह लें कि वह धीरे-धीरे उसका गुलाम बनता चला जाता है और तब तक बहुत देर हो चुकी होती है। कुछ बीमारियों में तो 100 प्रतिशत सत्य साबित हो चुका है जैसे शुगर, ब्लडप्रेशर, थाइराइड, डिप्रेशन जैसी बीमारी में यदि आप ने अंग्रेजी दवाओं का सेवन सुरू कर दिया तो जीवन के आखिरी सांस में ही वह दवा बन्द होगा। हमारे आयुर्वेद चिकित्सा पद्धति में इन बीमारियों का स्थाई तौर पर समाधान सम्भव है। अगर आप सही में अपना जीवन जीना चाहते हैं तो आयुर्वेद और प्रकृति के करीब आना पड़ेगा और आपको इसमें अटूट विश्वास भी पैदा करना होगा। 


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