त्रासदी में अपने कर्तव्यों के प्रति जवाबदेह बने कर्मवीर

कुछ दिन पूर्व जब प्रधानमंत्री मोदी ने देश के विभिन्न शहरो में त्रासदी की सबसे ज्यादा मार झेल रहे गरीब, मजदूर व श्रमिको के लिए लॉकडाउन में ढील बरतते हुए उन्हें अपने घर बुलाने की योजना बनायी थी और सभी राज्य सरकारों ने बड़े पैमाने पर लाखो मजदूरो के लिए सीधे घर की जगह पहले क्वॉरनटीन सेंटरों की व्यवस्था की थी , ताकि शेष सामान्य मानवी को संक्रमित होने से बचाया जा सके और बाहर से आ रहे मजदूरो के लिए हर जनपद में कम्युनिटी किचिन के द्वारा भोजन की व्यवस्था की गयी थी, लेकिन कथित भ्रष्ट तंत्र ने अपनी भ्रष्ट मानसिकता के चलते गरीबो को मिड डे मील से भी बत्तर भोजन की व्यवस्था की है और गरीब जीने के लिए उस भोजन को खा रहा है जो जानवरो को दिया जाता है, भृष्ट तंत्र ने त्रासदी में भी मानवीय मूल्यों के प्रति कोई संवेदना प्रकट नही की, क्वॉरनटीन सेंटरों में शासन की मंशा के अनुरूप कोई व्यवस्था नही है, कई जगह तो जिन कर्मचारियों की ड्यूटी लगी है वे केवल अपने हस्ताक्षर करके ही घर वापिस लौट आते है, दो-चार पुलिस के जवानों के अधीन ही सेंटर चलता रहता है और सेंटरों में रुके लोग जिल्लत भरी जिंदगी जीने को मजबूर हो रहे है और पुलिस प्रशासन शहर व गांवो के अंदर अवैध रूप से शराब व गुटका बिकबाकर सुविधा शुल्क ले रही और जनपद में प्रवेश की सीमाओं पर या तो जबरन बसूली कर रही है अन्यथा सुविधा शुल्क लेकर संदिग्धों की बिना सूचना दिये सीमा पार करायी जा रही है, ये तमाशा रोज चल रहा है, जिन लोगों को देश के प्रधानमंत्री ने कोरेना का सच्चा योद्धा बताया था आज वे मानवीय मूल्यों को नष्ट करते हुए कोरेना से प्रधानमंत्री मोदी की वैश्विक लड़ाई को कमजोर करने में लगे हुए है, आखिर ये लोग वह दिन क्यो भूल रहे है जब प्रधानमंत्री मोदी के आह्वान सभी देशवासियो ने इन्हें कोरेना का सच्चा योद्धा मानकर इनके सम्मान में शंख, झालर, ताली-थाली व दीपक बजाकर इनका उत्साहवर्धन किया था, जब देश में मरकज के कटटरपंथी जमाती अपनी उन्मादी मानसिकता के चलते इन पर पत्थर बरसा रहे थे तब यह देश इनके साथ खड़ा था और इनके हौसले को कमजोर नही होने दे रहा था , क्या यही सामाजिक न्याय है? क्या यही सामाजिक वेदना है? क्या ऐसे परिवेश में कोरेना को हराकर स्वस्थ्य व आत्मनिर्भर भारत की नींव रखी जा सकती है? उम्मीद है जिलाधिकारी महोदय संज्ञान जरूर लेंगे।