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गुलशन नंदा धड़कनों व जजबातों को बड़ी कुशलता से अपनी कलम मे कैद करते थे

छठे और सातवें दशक में भारतीय फिल्म और लोकप्रिय हिन्दी साहित्य जगत मे एक ऐसा सितारा प्रकृट हुआ जिसने तेजी से बदलते भारत के जवां दिलों की धड़कनों व जजबातों को बड़ी कुशलता से अपनी कलम मे कैद कर बड़ी खूबसूरती से समाज के सामने पेश किया कि लोग उनके लेखन के दीवाने हो गये उनके पहले कोई अन्य उपन्यासकार ऐसा नही कर सका। कुछ ही समय में बड़ी भारी तादाद मे ना केवल भारत के युवा पाठक उनसे जुड़ गये बल्कि तत्कालीन विख्यात फिल्मकारों ने भी उन्हें हाथों हाथ लिया उन्होंने उस दौर के युवाओं के रोमांस, उत्साह, निराषा, संघर्ष, समस्याओं जिस सच्चे रूप मे उन्होंने पेश किया, वह बेमिसाल था। गुलशन नंदा वो नाम था जिसके उपन्यासों का लोग बुक स्टालों पर महीनों पहले से इंतजार करते थे। उन्होंने लोकप्रियता में अपने दौर के अन्य सभी उपन्यासकारों को पीछे छोड़ दिया था पर उनके दिल के छू लेने वाले उपन्यासों पर दर्जनों हिट फिल्मे बनाई गयीं जिनकी फेहरिश्त बड़ी लम्बी है। फूलों की सेज 1964, काजल (माधवी) 1965 ,नीलकमल (नीलकमल) 1968, झील के उस पार (झील के उस पार), भंवर, दाग, महबूबा 1976 (सिसकते साज), पाले खान, शर्मीली, कटी पतंग (कटी पतंग) 1970, खिलौना 1970 (पत्थर के होंठ), अजनबी, जुगनू, जोशीला, सावन की घटा, अनोखा बंधन, नया जमाना (नया जमाना) 1971, दो रास्ते, पत्थर के सनम। नजराना, बादल, आजाद, बिंदिया चमकेगी, बड़े दिल वाला, उनके कुछ उपन्यासों की लिस्ट इस प्रकार है। शगुन, कांच की चूड़ियां, बंद होंठ, अनोखा बंधन, नीलकमल, डरपोक, गेलार्ड, सूखे पेड़ सब्ज पत्ते, नीलकंठ, सिसकते साज, शर्मीली, कटी पतंग, नया जमाना, माधवी, पत्थर के होंठ, झील के उस पार, एक नदी दो पाट, पाले खान, उनके उपल्यास के विषयों का दायरा बहुत बड़ा था, उनके उपन्यास रोमांस, ज्वलन्त समाजिक समस्याआ, एक्शन, थ्रिलर से भरपूर होते थे। उन्हें फिल्मों मे बेहतरीन पटकथा लेखन हेतुु छह बार बेस्ट फिल्म स्टोरी के जिये फिल्म फेयर एवाड हेतु नामित किया गया था, यह फिल्में थी। काजल 1965, लीलकमल 1968, खिलौना 11970, कटी पतंग 1970, नया जमाना 1971, महबूबा 1976 में। 1920 मे दिल्ली के रंगीन शहर के एक पंजाबी परिवार मे जन्मे गुलशन नंदा की अधिकांश शिक्षा दिल्ली में हुयी। विद्यार्थी जीवन से ही उनके अद्भुद लेखन क्षमता उभरने लगी थी काम और कुछ नया करने की चाह मे वह दिल्ली छोड़ कर सपनों के शहर बम्बई चले आये। शुरूआत में उन्हें कामयाबी नही हासिल हुयी लेकिन 1964 में उनके उपन्यास पर बनी फिल्म फूलों की सेज ने उन्हें कामयाबी के उँचे पायदान पर पहुँचा दिया फिर उन्होंने लेखन की दुनिया मे एक नया मुकाम हासिल कर किया 6 नवम्बर 1985 को उनका पेट के कैंसर से देहान्त हुआ उनकी पत्नी और दो बेटे है। गुलशन नंदा मशहूर फिल्मी खलनायक प्रेम चोपडा़ के समधी हैं। प्रेम चोपडा़ की बेटी रितिका के ससुर है, उनके बेटे राहुल व अक्षय बालीवुड में पब्लिकसिटी डिजाइनर हैं।


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