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जब चिड़िया चुग गई खेत

यह लेख उन नवयुवक और युवतियों के लिये लिखा जा रहा है। जिन्होने अपना कैरियर बनाने या लड़कियों मे ओर कमाऊ और स्टेटस वाला वर की तलाश मे 33, 34 या 35 साल मे शादी की फिर या तो वे कन्सीव ही नही हुयी या एक एर्बाशन के बाद वे गर्भाशय, हारमोनल और अन्य स्त्रियों से संबधित रोगों से घिर गई पांच छह साल एक के बाद गायकोनोलाॅजिस्ट का इलाज चला और फिर मेनापाज की स्टेज मे आकर संतानहीन रह गई उनमें कुछ को हाई स्टेटस वाला वर मिला पर अधिकांश को अति साधारण, दुहाजू, छंटे छटाये वरों के साथ विवाह करना पड़ा कुछ अविाहित रह गई हांलाकि कुछ प्रतिशत जोंडों को संतान सुख भी मिला परन्तु पचास फीसदी से अधिक जोड़े संतानहीनता के शिकार हुये इसका सीधा कारण यह है कि सप्तम भाव, सप्तमेश तथा शुक्र, मंगल, गुरू विवाह कराते है। इन पर जब प्रभाव पड़ता है। तो विवाह विलंब होता है। और तथा अनेक विवाह विलंब कराने वाले ग्रह योग संतान बाधा भी कराते है। चिकित्सा के अनुसार महिला पहले बूढी होती है। और पुरूष बाद मे बूढा होता है। सामान्य नियम यह है। कि 35 वर्ष की उम्र के बाद महिला अविवाहित हो या विवाहित, संतानहीन हो या संतानवान वह मासिक रोंगों और हारमोनल रोंगों का शिाकर हो ही जाती है। यह बढती उम्र की एक कड़वी सच्चाई है। प्रकृति अपना काम करती रहती है। वह यह तर्क नही मानती कि आपकी शादी विलंब से हुयी हम क्या करें। सप्तम भाव, सप्तमेश, अष्ठम भाव व अष्ठमेश तथा शुक्र, मंगल, गुरू विवाह कराते है। शुक्र, काल पुरूष की 7 वीं राशि तुला का कारक है और और मंगल कालपुरूष की 8 वीं राशि वृश्चिक का कारक है। मेडिकल एस्टोलाॅजी के अनुसार सप्तम भाव, सप्तमेश, तुला राशि और उसका स्वामी ग्रह शुक्र तथा अष्ठम भाव व अष्ठमेश, वृश्चिक और उसका स्वामी ग्रह मंगल यौनांगों, गर्भाशय तथा शरीर के संतानोत्पादक अंगों का कारक उपरोक्त ग्रहों और भावों और भावेशों पर पाप ना केवल विवाह मे विलंब कराता है। बल्कि संतानोत्पत्ति मे भी बाधा और यौनांगों मे रोग देता है।
 मंगल व चन्द्रमा गर्भाशय, और मंगल स्त्री यौनांगों और जननांगों का कारक ग्रह है। स्त्री का मासिक स्त्राव चन्द्र व मंगल की गतिकवधियों के कारण होता है। मंगल डिम्बाशय और डिम्बवाहिनी मे पुरानी कोशिकाओं को नष्ट करता है। और चन्द्रमा रक्तस्त्राव और उसकी अवधि निर्धारित करता है। स्त्री जातक मे लग्न या चन्द्र लग्न पर मंगल कर दृष्टि पड़ने से मासिकस्त्राव होता है। जबकि लग्न या चन्द्र लग्न पर मंगल का प्रभाव गंभीर मंगल दोष भी बनाता है। लग्न या 7 वें भाव का मंगल मासिकस्त्राव मे गड़बड़ी पैदा करता है।
 मंगल मासिकस्त्राव मे गड़बड़ी पैदा करता है। इसी तरह अष्ठम भाव का मंगल तथा चतुर्थ, अष्ठम भाव का मंगल भी सप्तम भाव पर दृष्टि डालकर मासिक धर्म मे असन्तुलन व रोग देता है। सप्तम भाव अष्ठम भाव यौनांगों, गर्भाशय तथा शरीर के संतानोत्पादक अंगों का कारक है इसी तरह सप्तम भाव, सप्तमेश, अष्ठम भाव व अष्ठमेश तथा शुक्र, मंगल, गुरू पर सूर्य, बुध, शनि, राहू, केतु का प्रभाव यौनांगों मे रोग और बांझपन देता है। उपरोक्त सभी योग चन्द्र कुण्डली से भी सप्तम व अष्ठम भाव पर लागू होते है। चन्द्रमा गर्भाशय, गर्भस्थ, शिशु का कारक है। मंगल संतानहानि, तथा गर्भपात का कारक है। अष्ठम भाव व वृश्चिक संमान सुख का भी भाव है। चन्द्र-राहू योग, चन्द्र शनि, चन्द्र-केतु, चन्द्र-मंगल युति या चन्द्रमा का इन ग्रहों से त्रिकोण का संबध गर्भाशय के रोग देता है। चन्द्रमा, आठवां भाव और वृश्चिक राशि स्त्री के शरीर मे हारमोन्स का भी कारक है। अतः चन्द्रमा, आठवां भाव और वृश्चिक राशि पर किसी प्रकार का पापी ग्रह का प्रभाव स्त्री जातक मे गंभीर होरमोनल डिस्टरबेंस देता है। गुरू पंचम भाव और संतान का कारक ग्रह है और कालपुरूष की नवमी राशि धनु का कारक ग्रह नवम भार्व और धनु राशि पौत्रों का भाव है। गुरू पाराशर ज्योतिष मे पति का कारक माना गया है। गुरू पर भी पाप प्रभाव विवाह के साथ संतान बांधा देता है। सप्तम भाव, सप्तमेश, ग्रह शुक्र तथा अष्ठम भाव व अष्ठमेश, चन्द्रमा, गुरू मंगल के पापगहों से सुत होने, 6, 8, 12 वें भाव मे जाने या नीच, अस्त या वक्री  होने पर विवाह विजंग होता है। और यौनांगों, गर्भाशय तथा शरीर के संतानोत्पादक अंगोंमे रोग देता है। 


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