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संपत्ति का ज्ञान कराये चतुर्थांश चक्र

जंमपत्री का चैथा वर्ग चतुर्थांश या पद्यमांश चक्र कहलाता है। चतुथांश चक्र चतुर्थ भाव का विस्तार और उपवर्ग है। पाराशर जी के अनुसार ‘तूर्यांशे भाग्य चिन्तनम’ जो भौतिक संपत्ति, जमीन, मकान, खेती, दुकान तथा शिक्षा व वाहन को छोड़ कर चैथे भाव की अंय सभी वस्तुओं दिमाग, माता, धन से प्राप्त सुख दुःख, विदेश या घरेलू यात्रा, ट्रान्सफर, हृदय, बचत, नकदी, सोना, पारिवारिक सुख, मानसिक शांति, वाहन दुर्घटना, गांव, निवास, भाग्य को बताता है। प्रत्येक राशि को 7.30 अंश के चार समान भागों मे बांटा जाता है। जो विभाग किसी राशि के चार केन्द्र होते हैं। चार केन्द्र चर्तुभुज विष्णु या भगवान विष्णु की चार भुजायें है, जो जीवन के चार पुरूषार्थों के प्रतीक हैं। लग्न धर्म, दशम कर्म या अर्थ, सप्तम पत्नी या काम, तथा चतुर्थ पारिवारिक, मानसिक सुख शान्ति या मोक्ष के प्रतीक है।   
स्वक्र्षदिकेन्द्रपत स्तुर्यांशेशा त्रियायितु। 
कोई ग्रह किसी राशि के प्रथम भाग (0-7.30) पर स्थित हो तो चतुर्थांश मे वह उसी राशि मे स्थित होगा यदि ग्रह राशि के द्वितीय भाग (7.30-15.00) पर स्थित हो तो चतुर्थांश मे वह उससे चतुर्थ राशि मे स्थित होगा यदि ग्रह राशि के तृतीय भाग (15.00-22.30) पर स्थित हो तो चतुर्थांश मे वह उससे 7 वीं राशि मे स्थित होगा यदि ग्रह राशि के चतुर्थ भाग (22.30-30.00) पर स्थित हो तो चतुर्थांश मे वह उससे 10 वीं राशि मे स्थित होगा। 
देवता- महर्षि पाराशर के अनुसार तूर्यांशे के चार देवता हैं। जो ब्रह्मा जीके चार पुत्र सनक, सन्दन, सनातन कुमार और सनातन।
 सनक पूर्व दिशा धर्म, जप, पूजा, दान द्वारा सम्मान का प्रतीक है। जो दान पाने या वसीयत आदि से किसी की सपंत्ति मिलने की को बताती है। इसके देवता सूर्य और उपदेवता इन्द्र व वाराह हैं। सनंदन जो वरदान, आर्शाीवाद, सुख, समृद्धि के प्रतीक हैं। जो उत्तर दिशा तथा देवता माता पार्वती, कारक ग्रह चन्द,उपदेवता, श्रीपति व कुबेर है। सनातन जो परिवर्तन, ट्रासन्सफर, चलायमान और अस्थाई धन, संपति, नकदी व जेवर व सदैव चरता के प्रतीक हैं। दिशा पश्छिम, कारक ग्रह शुक्र व देवता गोविंद, लक्षमी, सनातन कुमार स्थाई पैत्रिक संपत्ति के स्थाई लाभ, प्राचीन, मजबूत संपत्ति के सुख के प्रतीक है। कारक ग्रह शनि, देवता पद्यनाभ (विष्णु), क्षीर सागर मे शयया पर लेटे विष्णु। 
 चतुर्थांश के भाव फल
1. प्रथम भाव- धन का उपयोग, सुख दुःख में खर्च, सुख की प्राप्ति, धन द्वारा इच्छाओं की पूर्ति।
2. द्वितीय भाव-धन संबधी आदतें, दान, कंजूसी, सपंत्ति से सुख पाने की क्षमता।
3. तृृतीय भाव से सुख प्राप्ति जोखिम, आवास परिवर्तन, सुख पाने का साहस।
4. चतुर्थ भाव से चल, अचल संपत्ति, सुख का विषय, सुख का ज्ञान।
5. पंचम भाव से आजीवन संपत्तिवान, भाग्य व सुख संबधी पूर्व पुण्य।
6. षष्ठ भाव से धन, संपत्ति का बंटवारा, शत्रु द्वारा धन की हानि।
7. पत्नी द्वारा सुख, धनद्वारा सम्मान।
8. अष्ठम भाव में बुध उत्तम फल दे। अंय ग्रहों से स्थाई हानि मिले।
9. नवम भाव से धन द्वारा धार्मिक कार्य, दान, होम।
10. दशम भाव धन संबधी कर्म, पापी ग्रह हो तो स्वकर्मों से हानि हो।
11. एकादश भाव ज्ञान द्वारा धन प्राप्ति, सुगम संपत्ति।
12. द्वादश भाव निरर्थक व्यय, सुख का अंत, विलास मे धन खर्च, द्वादेश चतुर्थ मे हो तो किसी अंय के मकान मे निवास रहे। 
चतुर्थांश अध्ययन के सूत्र-
1. चतुर्थांश में त्रिक भाव मे गया गुरू धन से वंचित रखे।
2. यदि जमांक के धनेश या लाभेश चतुर्थांश में गुरू से युत हो ता भारी धन लाभ और सुख मिले।
3. चतुर्थांश में बली मंगल, दशम भाव का मंगल निजी  भूमि, भवन व संपत्ति देगा।
4. चतुर्थांश में केतु प्राकृतिक आपदा से संपत्ति का विनाश देगा।
5. यदि जमांक का दशमेश चतुर्थांश चक्र की लग्न या लग्नेश से संबधित हो तो संपत्ति भारी आय होगी।
6. चतुर्थांश के चर्तुथ भाव मे चर राशि हो तथा चर्तुथेश भी चर राशि मे हो तो कोई स्थाई निवास ना हो। सदैव  यात्रा करता रहे।
7. यदि चतुर्थांश चक्र की लग्न या लग्नेश गुरू से युति या दृष्टि हो या लग्न से गुरू केन्द्र मे हो तो सुखी जीवन हो।
8. यदि चतुर्थांश चक्र के लग्नेश व चतुर्थेश चर राषियों तो जातक यात्रा प्रेमी हो। यदि चतुर्थेश त्रिक मे हो तो यात्रा भारी कष्ट व संकट प्राप्त हो। 
9. यदि चतुर्थांश चक्र के लग्न या चतुर्थ भाव मे राहू हो तो जातक उपर से सज्जन और अंदर से धूर्त हो।
10. यदि चतुर्थांश चक्र में गुरू या चतुर्थ भाव पापग्रस्त हो या चतुर्थ भाव पापग्रस्त हो या निर्बल हो तो जीवन दुर्भाग्यग्रस्त हो। चतुर्थेश यदि उच्च का हो तो अनेक संपत्तियां हों।
11. यदि चतुर्थांश चक्र का चतुर्थेश नीच, त्रिक मे या शत्रु राशिगत हो तो संपत्ति नष्ट हो। यदि उस पर दशमेश, सूर्य, मंगल का भी प्रभाव हो तो सरकारी आदेश से संपत्ति नष्ट या जब्त हो।
12. यदि चतुर्थांश चक्र का चतुर्थेश यदि पापग्रस्त होकर  द्वितीय भाव मे हो तो संपत्ति बिके।
13.यदि चतुर्थांश चक्र के लग्न या चतुर्थ भाव व 12 वें भाव मे पापग्रह हो तो जातक सपरिवार या वंश सहित नष्ट हो।
 संजय राठ की पुस्तक वर्ग चक्र में विस्ती लार्सेन के लेख ‘ तूर्यांश ’ मे चतुर्थांश अध्ययन के निम्न सूत्र बताये हैं।
1. यदि चतुर्थांश चक्र का द्वितीय भाव चतुर्थ भाव से 11 वां है। जो संपत्ति विक्रय या किराये पर देने से या अंय  जैसे खेत की बंटाई आदि से आय देता है।
2. यदि चतुर्थांश चक्र के धनेश व द्वादेश का परस्पर संबध हो तो संपत्ति बिक जायेगी।
3. द्वितीय भाव से प्राप्त होने वाली आय को षष्ठ भाव  रोकता है। जो शत्रुता, प्रतियोगिता का भाव है। पंचम भाव संतान या सेवकों द्वारा संपत्ति का उपभोग बताता है। पंचम भाव के शुभ ग्रह संतान द्वारा संपत्ति के सुखपूर्वक उपभोेग व पाप ग्रह संपत्ति के दुरूपयोग को बताता है। द्वितीय व तृतीय भाव संपत्ति किराये पर देने से लाभ बताता है। 7 वां भाव संपत्ति की संविदा या  व्यापारिक प्रयोग से मिले लाभ को बताता है। दशम भाव संपत्ति मे बाधा देता है। जातक का व्यर्थ भटकाव और गृहत्याग देता है। 
4. चतुर्थांश चक्र का चतुर्थ पद भी संपत्ति के बारे मे बताता है।
5. चतुर्थ भाव से मारक भाव पंचम और दशम व इनकी अरूधा संपत्ति का विनाश देती है।
 भूमि कारक मंगल व भवन कारक केतु है। यदि मंगल, केतु का शत्रु शनि से या चतुर्थ भाव से संबध हो तो भूमि, व भवन का विनाश होगा। कुछ ग्रन्थों में मंगल, भूमि, खेत, केतु बंजर भूमि, शुक्र मकान बुघ प्लाट व लद्यु घर और राहू खंडहर को बताता है। 


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