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शनि शांति के लिए निम्न उपचार करना चाहिये

- शनि मंत्र का जाप करें। - शनि योगकारक हो तो साढे पांच रत्ती का नीलम पंचधातु मे शनिवार को मध्यमा उंगली मे धारण करें। - शनिवार के दिन काला चावल, उड़द की दाल, काले तिल का दान करें। - भैंस को चारा दें। तथा श्रमिकों को भोजन करायें। - हनुमान जी को चमेली के तेल मे सेंदूर मिला कर अर्पित करें। - शनिवार को या नित्य सूर्योदय के पूर्व पीपल पर पानी चढायें। - शनि देव पर सप्तधान्य चढायें। - हर शनिवार को छाया दान करें। किसी स्टील या लोहे की कटोरी में थोड़ा सा तेलव काले तिल डाल कर उसमे एक रूपया डालंे उस तेल मे अपना चेहरा देखकर तेल डकौत या जोषी पंडित को दान कों। या शनि देव पर चढायें। - हर शनिवार शाम को घर से पष्च्छिम दिषा मे स्थित पीपल के पेड़ के नीचे मट्टी के दिये मे सरसों के तेल का दिया जलायें। इस क्रिया को करते हुये रास्ते मे आते जाते हुये ना किसी से बोलें ना कही रूकें। - शुक्रवार को सवा पाव काले चने पानी मे भिगो कर शनिवार का निकाल कर उन्हें काले कपडे़ मे बांध लें साथ मे एक रूपया, एक कच्चे कोयले का टुकड़ा आध पाव काले तिल मिला कर बांध उें फिर 7 या 11 वार अपने सर से उतारें। और नदी मे प्रवाहित कर दें। - सु

भविष्यवाणी सच हुई

इण्डियन स्पीड ने 31 जनवरी, 2020 को आम आदमी पार्टी और अरविन्द केजरीवाल पर डी. आर. परिहार की ज्योतिषीय भविष्यवाणी की थी और भविष्यवाणी सच हुई। दिल्ली विधान सभा चुनाव में आम आदमी पार्टी की बंपर जीत हुई। 31 जवनरी की भविष्यवाणी  केजरीवाल दिल्ली के मुख्यमंत्री होंगे ज्योतिष डी.एस परिहार ने अपनी ज्योतिषीय गणना से दावा किया है कि दिल्ली विधान सभा चुनाव में अरविंद केजरीवाल की पार्टी की जीत होगी और अरविन्द केजरीवाल फिर दिल्ली के मुख्यमंत्री बनेंगे। श्री अरविन्द केजरीवाल जी का जन्म 16 अगस्त 1968 को रात्रि 11.46 बजे हिसार, हरियाणा मे वृष लग्न मे हुआ है। उनका जमांक इस प्रकार है। वृष लग्नरू 5.25 अंशं लग्न मे उच्च का चन्द्ररू 7.46 कर्क मे नीच का मंगल नीच भंगराज योग मेरू 13.42 सिंह मे स्वग्रही सूयर्रू 00.30, शुक्ररू 16.15, बुधरू 9.1 व गुरूरू 17.58  कन्या मे केतुरू16.55 मीन मे राहूरू 16.55 मेष मे नीच का शनि वक्रीरू 2.01 नीच भंगराज योग मे। लग्नेश चतर्थेश पंचमेश व भाग्येश की युति महाराज्य योग बना रही है। जाब व कर्म कारक शनि राज्यकारक रायल राशि मेष मे राज योग बना है। मेष मे सूर्य उच्च का होता है, त्रिकोण म

केजरीवाल दिल्ली के मुख्यमंत्री होंगे

ज्योतिष डी.एस परिहार ने अपनी ज्योतिषीय गणना से दावा किया है कि दिल्ली विधान सभा चुनाव में अरविंद केजरीवाल की पार्टी की जीत होगी और अरविन्द केजरीवाल फिर दिल्ली के मुख्यमंत्री बनेंगे। श्री अरविन्द केजरीवाल जी का जन्म 16 अगस्त 1968 को रात्रि 11.46 बजे हिसार, हरियाणा मे वृष लग्न मे हुआ है। उनका जमांक इस प्रकार है। वृष लग्न: 5.25 अंशं लग्न मे उच्च का चन्द्र: 7.46 कर्क मे नीच का मंगल नीच भंगराज योग मे: 13.42 सिंह मे स्वग्रही सूर्य: 00.30, शुक्र: 16.15, बुध: 9.1 व गुरू: 17.58  कन्या मे केतु:16.55 मीन मे राहू: 16.55 मेष मे नीच का शनि वक्री: 2.01 नीच भंगराज योग मे। लग्नेश चतर्थेश पंचमेश व भाग्येश की युति महाराज्य योग बना रही है। जाब व कर्म कारक शनि राज्यकारक रायल राशि मेष मे राज योग बना है। मेष मे सूर्य उच्च का होता है, त्रिकोण मे राज्य कारक सूर्य पुण्य कारक व गुरू का योग धर्माधिकारी व राजप्रताप योग बना रहा है, शनि से त्रिकोण मे उसके दो मित्र ग्रह बुध शुक्र भी ज्योतिष का सबसे बड़ा राजयोग बना रहा है। शनि से द्वितीय स्थान पर राष्ट्रध्वज कारक केतु की दृष्टि है। यह भी राज्य मे उच्च पद देगा वर्तमान म

मेरे अनुभव सिद्ध ज्योतिष योग

1. मुहुर्त ग्रन्थों के अनुसार जब गुरू शुक्र पंचाग में परस्पर दृष्ट हो तो विवाह संबधी कार्य नही होते है। यदि योग कुण्डली में हो तो विवाह में पूर्व व बाद मे ंभारी बाधा आती है। तथा इन ग्रहों की दशा काल मे जातक को किसी स्त्री की शव यात्रा मे जाना पड़ता है। 2. यदि कोई मनुष्य एव वर्ष के अंदर कृतिका नक्षत्र में 6 बार व या रोहणी नक्षत्र मे 8 बार सर मुंँड़वाता है। तो उसकी मृत्यु हो जाती है। 3. मघा के सूर्य यदि कोई ब्याई गाय खरीदता है। तो गाय स्वामी की मृत्यु हो जाती है। 4. यदि किसी जमंाक मे चन्द्रमा शनि की राशि मंे गया हो तो उस पर कलंक लगता है। 5. मंगल यात्रा कारक है मंगल की दशा में जातक यात्रा अवश्य करता है। 6. मूल नक्षत्र में जंमे जातक या जातिका की नक्षत्र शंाति विवाह के समय भी करनी चाहिये अन्यथा विवाह के पूर्व और पश्चात दोनों पक्षों में किसी सदस्य की मृत्यु होने की संभावना होती है। 7. यदि जमांक में वृश्चिक राशि मे शनि हो तो मकान के निकट गढ्ढा होगा। 8. स्कंद पुराण की एक कथा के अनुसार एक राजा को एक विषकन्या पैदा हुयी राजा ने कन्या के भविष्य के बारे मे ज्योतिषियों से पूछा तो उन्होंने जवाब दिया य

प्लान्टेशन एस्ट्रोलाजी

प्लान्टेशन एस्ट्रोलाजी कोई नई विधा नही है। बल्कि संसार की अन्य प्राचीन सभ्यताओं और संस्कृतियों में ज्योतिष के आधार पर वृक्षारोपण और उनके ग्रहों के उपचारात्मक व तांत्रिक उपयोगों का वर्णन मिलता है। प्रस्तुत लेख मे विभिन्न लग्नों राशियों और कुछ विशेष ग्रह योगों में जंमे जातक के अनुकूल वृक्षों के वृक्षारोपण उनकी सेवा, उनके विभिन्न उपयोगों द्वारा जीवन की कुछ जटिल समस्याओं से मुक्ति पाने के उपायों का वर्णन किया गया है। वृहत्संहिता, वृहत्जातक, होरासार, नारद संहिता, भविष्य पुराण, गरूड़, स्कंद पुराण, जैमिनी गनन माला, जैमिनी गनन प्रदीपिका आदि ज्योतिष व धार्मिक ग्रन्थ में ग्रहों और वृक्षो के मध्य निम्न संबध दिखाया गया है। सूर्य:-सेब, गाजर, अनार,़ बेल, बादाम चैलाई, ,लौंग, अदरक, खजूर, जौ, गेहू, संतरे, मदार।  चन्द्रमा:- अंगूर, खरबूजा, लौकी, गन्ना, खीरा, ककड़ी, खिरनी, मंगल, बेर, झर बेरी, चावल मूली, नारियल, कद्दू, लौकी, टिण्डा,  दूधदार वृक्ष, अंगूर, सलाद, खरबूजा, बंदगोभी खीरा, अलसी, पलाष, चंदन, हरसिंगार, बेला। मंगल:- गेंहू, टमाटर, सेब, लाल मिर्च, मसूर, चैलाई, अजवाइन, चना, शलजम, एरंड, खैर, लाल चंदन, अजमो

परिवर्तन योग से करें भविष्यवाणी

भारतीय ज्योतिशशास्त्र में भविष्यकथन के सैकड़ों सूत्रो का वर्णन है। इन्ही सूत्रों मे से एक है परिवर्तन योग जिसका वर्णन पाराशरीय और नाड़ी ग्रन्थों दोंनों मे पाया जाता है। हाँलाकि दोनो प्रकार के ग्रन्थों में इन सूत्रों को विभिन्न तरीको से प्रयोग किया गया है ज्योतिष मे परिवर्तन योग के तीन रूप पाये जाते हैं। 1. भाव परिवर्तन 2. राशि परिवर्तन 3. नक्षत्र परिवर्तन  भाव परिवर्तन पाराशरीय व कुछ नाड़ी ग्रन्थों जैसे षुक्र नाड़ी मे इसके सूत्रो का वर्णन पाया जाता है। जो भावा के स्वामियो के बीच स्थान परिवर्तन से बनता है। जैसे चतुर्थेश षष्ठ भाव मे जाय और षष्ठेश चतुर्थ भाव मे जाय। इसके भी तीन भेद हैं। 1. दो शुभ भावों के स्वामियों का परस्पर परिवर्तन जैसे लग्न व पंचम भाव का परिवर्तन या दो केन्द्रेशों का परिवर्तन या केन्द्र और त्रिकोण भाव मे परस्पर परिवर्तन। 2. दो त्रिकेशांे का परिवर्तन जो विपरीत राजयोग बनाता है। 3. किसी केन्द्रेश या त्रिकोणेश का त्रिकेश से परिवर्तन। जैसे दशमेश का द्वादेश से परिवर्तन या पंचमेश या द्वादेश के बीच परिवर्तन। 2. ग्रह या राशि परिवर्तन  इसका वर्णन स्व. आर. जी. राव द्वारा अनुवादित और

विवाह में अनावश्यक विलम्ब

विवाह मानव जीवन की एक महत्वपूर्ण घटना है। जन्म, विवाह, मृत्यु इन तीन महत्वपूर्ण घटनाओं की धूरी पर मनुष्य का जीवन घूमता है। विवाह स्त्री-पुरुषों की समाजिक, शारीरिक, मानसिक तथा व्यवहारिक आवश्यकताओं की पूर्ति करता है। यह संसार की सर्जनात्मक शक्ति का अंग है। संसार के सभी देषों, जातियों में, धर्मो में विवाह को अनिवार्य संस्था माना गया है।  आज बदलते आर्थिक समाजिक परिवेश में विवाह संबन्ध स्थापित करना एक समस्या बन गया है। उत्तम, शिक्षित, धनी और प्रतिष्ठित वर की तलाश और सुन्दर धनी, शिक्षित, बुद्धिमान, कार्यकुशल पत्नी प्राप्त करना सहज नहीं है। दोनो पक्षों की महत्वाकांक्षाओं तथा उत्तम व सम्पूर्ण व्यक्ति की तलाश ने इस समस्या को गहरा कर दिया है।  ज्योतिष शास्त्रों में विवाह विलम्ब का प्रमुख कारक ग्रह षनि माना गया है, जो स्त्री-पुरुष दोनों को कुप्रभावित करता है। वैसे पुरुष की कुण्डली में शुक्र पत्नी का कारक है, तथा स्त्री की कुण्डली में मंगल पतिकारक है। कुछ ग्रन्थों में गुरू को भी पति कारक माना गया है। किन्तु दोनों में एक भेद है। अविवाहित कन्या हेतु मंगल पति का कारक है। और विवाहोपरान्त स्त्री के लिय

गंजेपन और ज्योतिषीय

आयुर्वेद के अनुसार गंजापन वात, पित्त व वायु विकार के कारण होता है, पहले पित्त शरीर मे गर्मी बढ़ाकर केश गिरा देता है। फिर कफ की एक पर्त आकर रोम छिद्रों को बंद कर देती है। ज्योतिष में सूर्य, मंगल व केतु पित्त विकार को तथा शुक्र और चन्द्रमा कफ को बताता है। ज्योतिषी अभयराज सोमवंशी ने कादम्बिनी, नवम्बर 1993 मे छपे लेख मे गंजेपन के कुछ जयोतिषीय सूत्र बताये हैं, जो निम्न है:-  1. गंजेपन का प्रमुख कारक ग्रह चन्द्रमा है। सूर्य, गुरू,  शुक्र व गुरू गंजेपन के लिये जिम्मेदार है। 2. भरणी, कृतिका, रोहणी, पुर्नवसु, पुष्य, आश्लेषा, मघा, पूर्वा फाल्गुनी, हस्त, स्वाति, विशाखा, ज्येष्ठा, मूल, पूर्वाषाढा, श्रवण और पूर्वाभाद्रपद व रेवती कम बाल वाले होते है। भरणी, पुर्नवसु, मघा, पूर्वा फाल्गुनी, हस्त, श्रवण और पूर्वाभाद्रपद कम गंजे तथा कृतिका, रोहणी, पुष्य, आश्लेषा, स्वाति, विशाखा, ज्येष्ठा, रेवती अधिक गंजापन देते है। 3. कर्क, सिंह, तुला, धनु व मीन राशि कम बाल देते है। 4. रोग, मृत्यु ज्योतिष और ज्योतिष ग्रन्थ के अनुसार यदि गुरू लग्न मे हो तो गौर वर्ण, सुडौल शरीर, कम उम्र मे बूढा लगे, सर के बाल जल्दी सफेद हो

मंत्र शक्ति से महामारी का नाश

यह घटना संवत् 2017 सन् 1958 की है राजस्थान के भासू ग्राम जिला टोंक मे चैत्र शुक्ल नवमी से पूर्णिमा तक विष्णु याग (यज्ञ) का आयोजन किया गया था जिसे सम्पन्न कराने वाराणसी के प्रसिद्ध वैदिक विद्वान प. वेणीराम जी गौड़ आये जो यज्ञ से तीन दिन पूर्व ही आ गये हम लोगों ने उनसे प्रार्थना की यहाँ 20-25 मील के आस पास अनेकों गाँव मे चेचक की भयंकर महामारी फैल गई है। अकेले भासू ग्राम मे ही छह माह से लेकर 14 साल के करीब 50 बच्चे रोज मर रहें है। जिससे हमारा यज्ञ के प्रति उत्साह नष्ट हो गया है पण्डित जी ने कहा कि आप लोग चिन्ता ना करें आज रात मंैं एक अनुष्ठान करूँगा जिससे आप सबको इस महामारी से छुटकारा मिल जायेगा। उन्होंने रात को 9 बजे गाँव के चैराहे पर नवग्रह आदि का पूजन करके दो ब्राह्मणों को अलग-अलग रात भर मंत्र जाप करने का निर्देश दिया और कहा कि जप पूरा होने तक आप लोग आसन नही छोड़े। रात भर दीपक ना बुझ पाय इसकी भी व्यवस्था की गई जप सम्पन्न हुआ तो प्रातः उन्होंने यज्ञ किया दूसरे दिन चमत्कार हो गया जहाँ 50 बच्चे रोज मरते थे वहाँ केवल एक बच्चे की मौत हुयी और अगले दिन से आस-पास के सभी गाँव से ना केवल महामारी ख

राहू मंगल के साथ

राहू और वैवाहिक सुख सुनने मे बड़ा अजीब सा लगता है, पर यह सच है। कि कैसे कालपुरूष का दुःखकारक और पूर्व जंम के पापों का कारक ग्रह विवाह जैसा महान सुख दे सकता है। तमिल ज्योतिष में एक कहावत है। कि राहू से अधिक कोई वरदान नही देता और केतु से अधिक कोई शाप नहीं देता है, ज्योतिष मे कई ग्रन्थों मे वर्णन आता है। कि विवाह समय के ज्ञान के लिये गुरू, शनि व राहू के संयुक्त गोचर को देखें। प्रस्तुत लेख मे राहू से जुड़े कई ऐसे सूत्रों का वर्णन किया जायेगा जो वैवाहिक सुख प्रदान करते हैंः-   1. भृगु बिंदू-भृगु बिंदू का वर्णन भृगु नंदी नाड़ी में मिलता है, जिसकी सर्वप्रथम खोज स्व चदंलाल पटेल ने की थी और 1997 में आई अपनी पुस्तक प्रैडिक्टिंग थू्र नवांश एंड नाड़ी एस्ट्रोलाजी में उसका वर्णन किया था यह चन्द्रमा और राहू की जंमस्थ स्थितियों का मध्य बिंदू होता है। जिससें त्रिकोण में शुभ ग्रहों का गोचर शुभ फल और अशुभ ग्रहों का गोचर अशुभ फल देता है। राहू और चन्द्रमा के राशि अंशों को जोड़ो योगफल का 2 से भाग दो जो राशि अंश आये उसी राशि अंश पर भृगु बिंदू होगा लेखक गोयल के अनुसार भृगु बिंदू से द्वितीय भाव पर गुरू का वक्री या

जन्म कुंडली में वेश्यावृति के योग

हमारे समाज का बेहद कड़वा सच है वैश्यावृत्ति। कानून के प्रतिबंध के बावजूद भी वैश्यावृत्ति का व्घ्यापार सभी जगह खूब फलता-फूलता है। ग्रहों की दशा का प्रभाव भी महिलाओं के देह मंगल और शुक्र ऐसे दो ग्रह है, जब इनकी युति बनती है तो वैवाहिक जीवन तो डिस्टर्ब होता ही है, साथ ही गैर महिला के प्रति पुरूषों का आकर्षण बढ़ता है। ज्योतिष शास्त्र के मुताबिक, कुंडली में ग्रहों का खास योग किसी महिला को वेश्यावृत्ति की ओर धकेल सकता है। यही नहीं, ऐसे ज्यादातर मामलों में महिला को उसके प्रेमी द्वारा बहला-फुसलाकर देह व्यापार के गंदे धंधे में धकेल दिया जाता है। यदि कुंडली में प्रेम प्रसंग और धोखेबाज प्रेमी का योग हो, महिलाओं के व्यापार में फंसने का ज्योतिषीय कारण होता है। ग्रहों की निम्न विशेष स्थिति में महिलाएं देह व्घ्यापार करने पर मजबूर हो जाती हैं। 1. जिस युवक युवती की कुंडली में चैथे भाव में शुक्र तथा मंगल इकट्ठे होंगे , तो वह अत्यधिक कामुक होगा । किसी नजदीकी सम्बन्धी से सेक्स सम्बन्ध होने के कारण उसका अपना ग्रहस्थ जीवन डंावाडोल होता है। चतुर्थ भाव सुख स्थान का है । 2.-जिसकी कुंडली में चैथे भाव में पाप ग्रह

प्रेम में असफलता के योग

वैदिक ज्योतिष एवं प्राच्य विद्या शोध संस्थान अलीगंज, लखनऊ के तत्वाधान मे 132 वीं मासिक सेमिनार का आयोजन वाराह वाणी ज्योतिष पत्रिका के कार्यालय में किया गया। सेमिनार का विषय ज्योतिष में प्रेम में असफलता के योग था, जिसमे डा. डी.एस. परिहार के अलावा आचार्य राजेश, पं. शिव शंकर त्रिवेदी, पं. के.के. तिवारी, इंजीनियर एस. पी. शर्मा, उदयराज कनौजिया, डां. पी.के. निगम. अनिल कुमार बाजपेई एडवोकेट तथा पं. आनंद त्रिवेदी आदि ज्योतिषियोें एवं श्रोताओं ने भाग लिया गोष्ठी में डी.एस. परिहार, पं. के.के. तिवारी, श्री उदयराज कनौजिया, इंजीनियर एस.पी. शर्मा तथा पं. आनंद त्रिवेदी ने अपने अनुभव और व्यक्तव्य प्रस्तुत किये। पं. आनंद त्रिवेदी ने बताया कि यदि जमांक मे यदि पंचमेश चतुर्थ भाव में जाये तो जातक एक तरफा प्रेम करता है, यदि पंचमेश 8, 8, या 12 वें भाव मे जाये तो भी एक तरफा प्रेम होगा यदि उपरोक्त योगों के साथ पंचमेश नवांश मे नीच का हो तो उपरोक्त फल सौ फीसदी फलित होगा के.के. तिवारी ने 1986 मे जंमे एक जातक के जमांक के आधार पर बताया कि इस कुण्डली मे पाराशर पद्धति के सू़त्र घटित नही हो रहे हैं। नाड़ी ज्योतिष के सूत

शरीर मे राशियों व नक्षत्रों का स्थान

 नक्षत्र संख्या       शरीर के अंग     1.  अश्वनी      भ्रू मध्यग्रह        2.  भरणी        बांया गाल 3.  कृतिका       दांया गाल 4. रोहणी          बांया कान 5.  मृगशिरा     दांया कान 6. आर्द्रा         बांया नथुना 7. पुर्नवसु       दांया नथुना 8. पुष्य          कंठ 9 आश्लेषा    बांया कंधा बोन 10 मधा     दांया कंधा बोन 11. पूर्वा फा         बांयी कोहनी 12. उ0 फा   दांयी कोहनी 13. हस्त           बांयी कलाई 14. स्वाति  दांयी कलाई 15. चित्रा          दांया निचला सीना 16. विशाखा दांया  उपरी सीना 17. अनु         नाभि 18.  ज्येष्ठा बांयी बगल 19.  मूल    दांयी बगल 20. पूर्वाषाढा बांयी उपरी जांघ 21. उ0 षाढा दांयी उपरी जांघ 22. श्रवण बांया घुटना  23. घनिष्ठा दांया घुटना 24. शतभिषा बांयी भौंह 25. पूर्वा भा दांयी भौंह 26. उ0 भा बांया पैर का पंजा  27. रेवती दांया पैर का पंजा लेखक- साईरस डी अभ्यंकू जनवरी 1962 एस्ट्रो  मैगजीनसाईंस आॅफ प्लेटनरी प्रौपपिएशन राशि     व   अंग मेष  बांया पैर का पंजा वृष  मूलाधार मिथुन  बांयी कमर कर्क             मध्य सीना सिंह  बांया कंधा ृकन्या  उपरी सिर तुला  दांया सिर वृ

राहू का ग्रहों पर प्रभाव

मनुष्य के जीवन में राहू का भी महत्व रहता है, ज्योतिष के अनुसार ग्रहों के अनुसार ही किसी भी व्यक्ति की किस्मत बनती है और बिगड़ती भी है। ज्योतिष में कुल 9 ग्रह होते हैं। ज्योतिष में कुंडली में इन सभी ग्रहों की स्थिति से व्यक्ति का भाग्य पर अपना प्रभाव दिखता है। 9 ग्रहों में दो ग्रह राहु और केतु ऐसे ग्रह है जिसे अशुभ माना जाता है। लेकिन राहू का ऐसा भी प्रभाव होता है। जाने कि राहू की अन्य ग्रहों से युति से व्यक्ति को कैसा फल प्राप्त होता है।  ऐसी मान्यता है कि असुर स्वरभानु का कटा हुआ सिर है, जो ग्रहण के समय सूर्य और चंद्रमा का ग्रहण करता है। इसे कलात्मक रूप में बिना धड़ वाले सर्प के रूप में दिखाया जाता है, जो रथ पर आरूढ़ है और रथ आठ याम वर्णी कुत्तों द्वारा खींचा जा रहा है। वैदिक ज्योतिष के अनुसार राहु को नवग्रह में एक स्थान दिया गया है। दिन में राहुकाल नामक मुहूर्त 24 मिनट की अवधि होती है जो अशुभ मानी जाती है। समुद्र मंथन के समय स्वरभानु नामक एक असुर ने धोखे से दिव्य अमृत की कुछ बूंदें पी ली थीं। सूर्य और चंद्र ने उसे पहचान लिया और मोहिनी अवतार में भगवान विष्णु को इसकी जानकारी दी थी। इससे प

केतु ग्रह ख्याति पाने में सहायक

केतु एक रूप में स्वरभानु नामक असुर के सिर का धड़ है, यह सिर समुद्र मन्थन के समय मोहिनी अवतार रूपी भगवान विष्णु ने काट दिया था। यह एक छाया ग्रह है। ऐसा माना जाता है कि इसका मानव जीवन एवं पूरी सृष्टि पर अत्यधिक प्रभाव रहता है। कुछ मनुष्यों के लिये ये ग्रह ख्याति पाने का अत्यंत सहायक रहता है। केतु को प्रायः सिर पर कोई रत्न या तारा लिये हुए दिखाया जाता है, जिससे रहस्यमयी प्रकाश निकल रहा होता है। ज्योतिष के अनुसार राहु और केतु, सूर्य एवं चंद्र के परिक्रमा पथों के आपस में काटने के दो बिन्दुओं के द्योतक हैं जो पृथ्वी के सापेक्ष एक दुसरे के उलटी दिशा में (180 डिग्री पर) स्थित रहते हैं। चुकी ये ग्रह कोई खगोलीय पिंड नहीं हैं, इन्हें छाया ग्रह कहा जाता है। सूर्य और चंद्र के ब्रह्मांड में अपने-अपने पथ पर चलने के कारण ही राहु और केतु की स्थिति भी साथ-साथ बदलती रहती है। तभी, पूर्णिमा के समय यदि चाँद केतु अथवा राहू बिंदु पर भी रहे तो पृथ्वी की छाया परने से चंद्र ग्रहण लगता है, क्योंकि पूर्णिमा के समय चंद्रमा और सूर्य एक दूसरे के उलटी दिशा में होते हैं। ये तथ्य इस कथा का जन्मदाता बना कि वक्र चंद्रमा ग्

शनि सच्चा, विश्वसनीय और ईमानदार बनाता

ग्रहों में शनि ग्रह का अपना अलग महत्व है, शनि को शनि या शनैश्चर कहा जाता है, क्योंकि उन्हें लगभग ढाई साल लगते हैं और नक्षत्र राशि के प्रत्येक नक्षत्र से गुजरने के लिए। शनि का जन्म सौर देवता रूद्र से हुआ था। शनि अपनी पत्नी चय (छाया) द्वारा सूर्य देव के पुत्र हैं। शनि ठंडा और सूखा, तामसिक (सुस्त) और एक बुजुर्ग ग्रह है। उसकी दृष्टि खराब है, और शनि उस घर को नष्ट कर देता है, जिस पर वह रहता है (सातवें घर में तैनात होने पर, जहां उसे दिशात्मक बल प्राप्त होता है) को छोड़कर और किसी भी घर में वह पहलू या कोई भी ग्रह सम्मिलित या पहलुओं पर निर्भर करता है। अच्छी तरह से रखे जाने पर वह अपने मूल निवासी को अखंडता प्रदान करता है ज्ञान, आध्यात्मिकता, प्रसिद्धि, धैर्य, नेतृत्व करने की क्षमता, अधिकार, लंबे जीवन, संगठनात्मक क्षमता, ईमानदारी, ईमानदारी, न्याय का प्यार और सही और गलत के बारे में जागरूकता। जब यह गलत हो जाता है तो दुख, दुःख, विलंब, बाधा, निराशा, विवाद, आपत्ति, कठिनाइयाँ। शनि के मूल निवासी रक्षात्मक, घबराए हुए और गुप्त होते हैं। शनि पश्चिम दिशा में शासन करता है, शनिवार उसका दिन है, काला उसका रंग है औ