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प्रेम से उचित कोई उपहार नहीं है

प्रेम एक शास्वत सत्य है। अगर प्रेम न हो, यह दुनियां ही न हो। अगर प्रेम नहीं है तो न यह घर बचेगा न ही दुनियां में कोई किसी के लिये कुछ करेगा। प्रेम के कई रूप है, प्रेमी-प्रेमिका का प्रेम जिनको सीमा का कुछ अन्दाजा ही नहीं है। पति-पत्नी का प्रेम जहां ठहराव होता है, त्याग और कत्र्तव्य के साथ रिश्तों को कायम रखने का जज्जबा होता है। माता-पिता का प्रेम अपने बच्चों पर बिना किसी स्वार्थ के होता है, भाई-बहन का प्रेम पवित्र होता है।
सच्चा देशभक्त अपनी मां से जितना प्यार करता है, उतना ही अपनी मातृभूमि से प्यार करता है। यदि ऐसा नहीं होता तो क्रांतिकारी आजादी के अमर शहीद देशभक्त भगत सिंह भी अपनी धरती के लिये फांसी पर क्यों चढ़ जाते। नेताजी सुभाष चन्द बोस ने अपनी अच्छी नौकरी क्यों छोड़कर देश के लिये स्वयं को समर्पित कर दिया। अपने देश के लोगों का अंग्रेजों द्वारा अपमान देखकर वे आहत होकर गांधी जी अहिंसा का आन्दोलन करके देश-दुनियाँ के लिये महात्मा ना बनते। यह गोरे लोग (अंग्रेज) हमारे देश के लोगो को अब भी हीन दृष्टि से देखते है और नौकरियों में पक्षपात करते है। कवि और लेखकों ने इस पर बहुत कुछ लिखा है। कालीदास और तुलसीदास के रचना में भी पायेंगे की प्रेम से बढ़कर कुछ नहीं है। प्रेम देना जानता है। प्रेम लेना नहीं जानता है, यह स्वार्थ नहीं है जैसा कि सुनने-देखने को मिलता है कि अगर तुम मेरी न हो पाई तो किसी और का भी नहीं होने दूंगा। यह स्वार्थ बोलता है, जहाँ यह भावनायें आ जाती है वह प्रेम नही है वहाँ इन्सान स्वार्थी हो जाता है, तो प्रेम समाप्त हो जाता है। प्रेम की कोई सीमा नहीं होती है। जैसा कि सच्चा प्रेम मीरा ने प्रभू से किया वे उन्हीं में लीन हो गई। प्रेम से ही कत्र्तव्य अधिकार सब अपने आप ही हो जाते हैं। राधा जी ने भी भगवान कृष्ण से जैसा प्रेम किया आज भी लोग राधा कृष्ण ही बोलते हैं। पहले उनका ही नाम ही आता है, कोई भी कृष्ण राधा नहीं कहता है। प्रेम के लिये मुंशी प्रेमचंद ने लिखा है कि प्रेम विहीन हृदय के लिये संसार काल कोठरी है।
जिसने प्रेम नही किया उसने स्वर्ग में रहकर भी नर्क का अनुभव किया, प्रेमहीन जीवन नरक की ज्वाला है, जिसकी आग से दूसरे भी जलने लगते हैं। प्रेम के लिये त्याग जरूरी है। त्याग में ही प्रेम है। प्रेम पाने के लिये सम्मान देना बहुत जरूरी है, कहा जाता है कि प्यार दोगे तो प्यार पाओगे, परन्तु अब बदलते जमाने में कुछ लोग ऐसे भी हैं जो अपने को ही सही समझते है। और किसी के प्यार को नहीं समझते उनके सामने किसी की भावनाओं की मीठे बोलों की, मीठे अहसासों की कोई कीमत नहीं होती है। बल्कि वह ऐसे लोगों को अपने अहम् के आगे मूर्ख समझते हैं, यह उनकी अज्ञानमयी सोच ही तो है। प्रेम ही एक ऐसी वस्तु है जो सारे विश्व को अपने आगोश में समेटे है। अगर किसी को कोई उपहार देना है तो प्रेम से उचित कोई उपहार नहीं है। इसको पाने वाला जीवनभर उसको याद रखता है।


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