सत्संग सर्वथा श्रेयस्कर है

यथा उषा काल में कमल, पुष्प विकसित होने से सरोवर का सौंदर्य अप्रतिम प्रतीत होता है, तथापि सत्संग-स्वाध्याय और सन्त-सत्पुरुषों की सन्निधि से ही जीवन की श्रेष्ठतम संभावनाएं उजागर व चैतन्य होती हैं। अतः जीवन सिद्धि के लिए स्वाध्याय-सत्संग सर्वथा श्रेयस्कर है ..! संस्कारों का जीवन में महत्व सबसे अधिक है। सत्संग-स्वाध्याय, सकारात्मक चिंतन और भगवान के प्रति शरणागति-भाव जैसी साधन-सामर्थ्य एवं दिव्य, आध्यात्मिक ऊर्जा ही मनुष्य को प्रतिकूल परिस्थितियों में संबल प्रदान करती है। सत्संग,  स्वाध्याय द्वारा सद्विचारों का प्रस्फुटन होता है। सद्विचारों से पवित्र अंतःकरण एवं आध्यात्मिक मनःस्थिति का निर्माण होता है, और साधन चतुष्ट्य की सिद्धि होती है। भगवान को प्रसन्न करने के लिए सुंदर भावों की ही प्रधानता है। कथा-संकीर्तन, पूजा-पाठ व भजन-सत्संग व्यक्ति के भावों को महान बना देता है। इसलिए जीवन में स्वाध्याय, भजन एवं सत्संग करते रहना चाहिए। मनुष्य का उद्धार और प्रकृति में सुधार सत्संग के माध्यम से ही आता है। जिस तरह की विचारधारा वाले लोगों का साथ होगा, आपका व्यवहार भी उसी तरह से हो जाएगा। उन्होंने युवाओं से कहा कि वे महापुरुषों व संतों से शिक्षा व प्रेरणा लें तथा स्वयं के भीतर जो प्रतिभा है, उसे ही संवारे, निखारें। अपने मौलिक स्वरूप में आगे बढ़े। खूब पढ़े, स्वाध्याय करें। उन्होंने कहा कि अपने आत्म बल को बढायें। इसके लिए सत्संग करना आवश्यक है। पूजा-पाठ का समय न मिले तो कोई बात नहीं। केवल भगवान का नाम ही जपें। इससे भी आत्मबल बढ़ता है। नौकरी और व्यवसाय को जीवन का लक्ष्य मत समझो। नौकरी और व्यवसाय राजमार्ग नहीं। राजमार्ग तो सत्य, प्रेम व करूणा का मार्ग है। इसलिए हमारा लक्ष्य आनंद और प्रसन्नता होना चाहिए। मनुष्य जीवन में स्वभावतरू अनन्त-संभावनाएँ, अतुल्य-तेज, अपूर्व-सामर्थ्य एवं चिंतन-अभिव्यक्ति की स्वायत्तता सहज उपलब्ध हैं। विद्या-विचार एवं अभ्यास से मनुष्य आधिदैविक, आधिभौतिक और आध्यात्मिक ताप निर्मूल कर परमानंद को प्राप्त कर लेता है। अतः स्वाध्याय-सत्संग सर्वथा हितकर है। आत्म सुख और परम शान्ति के लिये वेदों का अध्यन, साधु-महात्माओं एवं संतों का सत्संग परमावश्यक है। इसके बिना जीवन का कोई आस्वादन नहीं। इस सत्संग के पुण्य लाभ के निमित्त ही नर देही धारण करने के लिये देवगण भी लालायित रहते हैं। सत्संग का अर्थ है “किसी सच्चरित्र का साथ अथवा संत-महात्माओं की गोष्ठी में बैठकर मनोयोग से उनकी अमरवाणी से निकले सदुपदेशों का श्रवण और अनुकूल आचरण करना”। इस छोटे से वाक्य में अलौकिक सुख सौंदर्य के अनेकानेक भाव अन्तर्निहित है।'सत्संग' वास्तव में उस अविरल गति से कल-कल स्वर करती हुई प्रवाहित दुग्ध धवल पुण्य सलिला पतित पावनी भागीरथी माँ गंगा की भाँति है जिसमें एक बार एकाकी भाव से स्नान कर लेने से जन्म-जन्मान्तरों के पाप पुंजों का विनाश हो जाता है और आत्मा निर्मल होकर आह्लादित हो उठती है ...।


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